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राजनीति के परिसर

हमारे छोटे से लेकर बड़े विश्वविद्यालय तक राजनीति के अखाड़े बना दिए गए जहां विचारों से ज्यादा विवाद पनपते हैं और देशद्रोही नारे तक लगने लगे हैं।
Author August 30, 2017 05:42 am
एबीवीपी की महिला कार्यकर्ता नारेबाजी करती हुईं। ( Photo Source: PTI)

राजनीति के परिसर
अगस्त का महीना आते ही विश्वविद्यालयों में छात्रसंघ चुनाव की सरगर्मी सातवें आसमान पर पहुंच जाती है। कॉलेज परिसर से लेकर पूरे शहर में छात्रसंघ चुनाव के पोस्टरों से लेकर बड़े-बड़े होर्डिंग लगे नजर आने लगते हैं। पानी की तरह पैसा बहाया जाता है। नियमों को ताक पर रख कर खुलेआम अपराध को अंजाम दिया जाता है। छात्रनेता सिर्फ अपना रुतबा दिखाने के चक्कर में तमाम गलत हथकंडे अपनाते हैं। ऐसे में महत्त्वपूर्ण सवाल है कि आखिर छात्रसंघ चुनाव की प्रासंगिकता क्या है?  दरअसल, छात्रसंघ चुनाव की आड़ में राजनीतिक पार्टियां अपनी सियासी रोटियां सेंकने का काम करती आ रही हैं। कांग्रेस- एनएसयूआई, सीपीआई- एआईएसएफ, सीपीआईएम- एसएफआई और डीएसयू और आम आदमी पार्टी- सीवाईएसएस को जहां घोषित रूप से चुनाव मैदान में उतरती हैं, वहीं भाजपा अघोषित रूप से एबीवीपी का समर्थन करती है। तमाम छात्र संगठन इन राजनीतिक दलों के लिए शिक्षण संस्थानों में युवा वोटबैंक की राजनीति करने का माध्यम हैं। आज इस व्यवस्था की समीक्षा व विश्लेषण करने की आवश्यकता है। क्या बिना छात्रसंघ चुनाव के भविष्य निर्माण की शिक्षा देने वाले विश्वविद्यालयों को राजनीतिक गतिविधियों से अछूता नहीं रखा जा सकता है? क्या आज विश्व के लोकप्रिय विश्वविद्यालयों में भारत का एक भी विश्वविद्यालय नजर आता है? शायद नहीं! क्योंकि हमारे छोटे से लेकर बड़े विश्वविद्यालय तक राजनीति के अखाड़े बना दिए गए जहां विचारों से ज्यादा विवाद पनपते हैं और देशद्रोही नारे तक लगने लगे हैं। कई शैक्षणिक संस्थान ऐसे भी हैं जहां अच्छा कार्य हो रहा है और खास बात है कि वहां कोई छात्रसंघ नहीं है। वर्षों से बगैर किसी आंदोलन और हिंसक घटनाओं के इन शिक्षण संस्थाओं की ‘रेटिंग’ अन्य की तुलना में गुणवत्तापरक शिक्षा के स्तर पर अधिक बेहतर है।

गौरतलब है कि कुछ वर्ष पहले छात्रसंघ चुनावों में लिंग्दोह कमेटी की सिफारिशें लागू की गई थीं। पूर्ववर्ती चुनाव प्रक्रिया को बदल कर ठोस नीति बनाई गई। आचार संहिता का निर्माण भी किया गया लेकिन पालन सुनिश्चित नहीं किया जा सका। इस नीति के बाद ही एक लंबे समय से छात्रसंघ चुनाव पर लगी रोक हटी थी। इसलिए यही वह समय है जब हमारे नीति-नियंताओं को तय कर लेना चाहिए कि वे शिक्षण संस्थाओं को आबाद करना चाहते हैं या बरबाद? विश्वविद्यालय में विद्यार्थी कुछ सीखें या न सीखें पर राजनीतिक चालबाजियां जरूर सीख जाते हैं। आज यह अवसर है सरकार के पास कि उच्च शैक्षणिक संस्थाओं में शिक्षा का स्तर सुधारने, गुणवत्ता कौशल युक्त शिक्षा प्रदान करने के लिए, राष्ट्र विरोधी आंदोलनकारियों के एवज में राष्ट्रभक्त नागरिक तैयार करने के लिए विशेष प्रयास किए जाएं। विभिन्न संस्थानों में नियमित अध्ययन, उपस्थिति, शिक्षण-प्रशिक्षण की बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराने के साथ छात्रों के नाम पर विश्वविद्यालय में होने वाली राजनीति को बंद करने के लिए सख्त कदम उठाने की आवश्यकता है।
’देवेंद्रराज सुथार, जेएनवीयू, जोधपुर
चहेतों का पूंजीवाद
‘घर का सपना और बाजार’ (29 अगस्त) लेख में सतीश सिंह ने शोषित फ्लैट खरीदारों की व्यथा को मुखरता से उठाया है। अपने घर के सपने को लेकर खरीदारों को कई दारुण अनुभवों से दो-चार होना पड़ता है। हाल ही में दिल्ली के जंतर-मंतर पर भी ऐसे ठगे गए खरीदारों ने एक विशाल प्रदर्शन किया था। सवाल है कि रेरा (रीयल एस्टेट रेगुलेटरी एक्ट) के बावजूद ऐसी स्थिति अभी तक क्यों बनी हुई है कि खरीदार अपनी मेहनत से कमाए हुए धन को ही पाने के लिए प्रदर्शन आदि का सहारा लेने पर मजबूर हो रहे हैं?
क्या इसे क्रोनी कैपिटलिज्म (चहेतों का पूंजीवाद) का ही उदाहरण नहीं मान लिया जाएगा, जिससे बिल्डरों को लाभ पहुंचाया जा रहा है?
’विकास कुमार, जनसंचार संस्थान, दिल्ली

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