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नीयत का सवाल

प्रधानमंत्री कई बार केंद्र और राज्यों के चुनाव साथ-साथ कराने की बात कह चुके हैं। अब गणतंत्र दिवस पर राष्ट्रपतिजी ने भी राष्ट्र के नाम अपने संदेश में यह बात दुहरा दी।
Author January 31, 2017 04:32 am
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (फाइल फोटो)

हाल के कुछ दिनों में प्रधानमंत्री कई बार केंद्र और राज्यों के चुनाव साथ-साथ कराने की बात कह चुके हैं। अब गणतंत्र दिवस पर राष्ट्रपतिजी ने भी राष्ट्र के नाम अपने संदेश में यह बात दुहरा दी। ये दोनों महानुभाव अनुभवी राजनीतिक हैं, जिम्मेदार पदों पर हैं और निश्चय ही इस बात की जटिलता भी समझते होंगे कि बिना संविधान में संशोधन के यह संभव नहीं है। दरअसल, इस मत में बदनीयती छिपी है। प्रधानमंत्री या तो संसदीय ढांचे में परिवर्तन चाहते हैं या संघीय ढांचे में या दोनों में। राज्यों और संघ के एक साथ चुनाव एक व्यक्ति के दो जगहों से चुनाव लड़ने जैसा सरल मामला नहीं है और न किसी व्यक्ति की इच्छा या सनक से ऐसा हो रहा है। ऐसा केवल परिस्थितियों के कारण हो रहा है। अब आइए, इसकी जटिलता समझें। अगर 2019 के लोकसभा चुनाव के साथ राज्यों के भी चुनाव कराने का फैसला किया जाए तो लगभग सभी राज्यों की विधानसभाएं समय-पूर्व भंग करनी पड़ेंगी।

अब अगर किसी राज्य में विधानसभा किसी कारणवश समय-पूर्व भंग हो जाए तो क्या उसे अगले लोकसभा चुनाव तक भंग रखना पड़ेगा? अगर हां, तो क्या यह लोकतंत्र की भावना के अनुकूल होगा? और क्या यह संघात्मकता के अनुकूल होगा? और अगर किसी कारणवश लोकसभा समय से पहले भंग हो जाए तो क्या सारे राज्यों की विधानसभाएं भी एक साथ भंग करनी पड़ेंगी? क्या ऐसा विचार शेखचिल्ली की उड़ान नहीं है? और दो शीर्षस्थ पदाधिकारी, जिन्होंने संविधान की रक्षा की शपथ ली है, ऐसा कह रहे हैं यह एक बड़ी विडंबना है! दरअसल, प्रधानमंत्री जिस दल से हैं वह संसदीय प्रणाली और संघात्मक ढांचे का विरोधी है। लेकिन हमारे संविधान निर्माता यह मानते थे और बिलकुल सही मानते थे कि भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश के लिए संघात्मक और संसदीय प्रणाली ही उपयुक्त है क्योंकि यह अधिक लोकतांत्रिक और प्रतिनिमूलक है।
’आनंद मालवीय, इलाहाबाद

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