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जुमले का बजट

मोदी सरकार ने मनरेगा को ‘कांग्रेस की विफलता का स्मारक’ बताया था, लेकिन जन-प्रतिरोध के दबाव में इस योजना को बंद करने की हिम्मत सरकार नहीं जुटा पाई।
Author नई दिल्ली | March 3, 2016 01:40 am
29 फरवरी को बजट 2016 पेश करने के लिए जाते वित्त मंत्री अरुण जेटली।

मोदी सरकार का तीसरा बजट भी आमजन पर राहत कम, बोझ ज्यादा बन कर सामने आया है। सेवाकर 0.5 प्रतिशत और बढ़ने से पहले से सिर चढ़ी महंगाई और ज्यादा बढ़ कर सामने आएगी। इस बजट में न महंगाई पर कोई कसावट के उपाय हैं और न रोजगार का कोई खाका। न शिक्षा की कोई चिंता न स्वास्थ्य का खयाल। आमजन का स्वास्थ्य हो या किसान, अब रहेंगे बीमा के भरोसे और फसल अब होगी शत-प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेश निवेश के हवाले। यानी फसल खरीदने के लिए विदेशी कंपनियों को न्योता। जब विदेशी कंपनियां आएंगी फसल खरीदने तो अपनी पसंद की, जिसमें ज्यादा मुनाफा होगा, वहीं उगवाएंगी और खरीदेंगी। इस मुनाफे की होड़ में खाद्य सुरक्षा का खतरे में आना निश्चित है। गांव, गरीब का बजट भुलावे और भ्रम से ज्यादा कुछ नहीं है। एक लाख तक स्वास्थ्य बीमा कवर देकर सरकार ने जहां सार्वजनिक और सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों को दुरुस्त करने और उनका विकास करने तौबा कर स्वास्थ्य के क्षेत्र में उतरे निजी कॉरपोरेट के हवाले करने की मंशा दिखाई है, वहीं खेती की समस्या फसल बीमा के हवाले कर खत्म मान ली गई है।

मनरेगा पर 38,500 रुपए करोड़ के बजट का बहुत प्रचार किया जा रहा है। जबकि यूपीए सरकार के काल में 40,000 करोड़ रुपए का बजट कई साल पहले आबंटित किया जा चुका है। मोदी सरकार ने मनरेगा को ‘कांग्रेस की विफलता का स्मारक’ बताया था, लेकिन जन-प्रतिरोध के दबाव में इस योजना को बंद करने की हिम्मत सरकार नहीं जुटा पाई। पिछले साल इसमें बजट आबंटन एकदम से घटा दिया था। गत वर्ष रबी की फसल कहीं ओलावृष्टि और कहीं अतिवृष्टि से बर्बाद हो गई थी और खरीफ की फसल की देश के उत्तरी हिस्से के बड़े भाग में बरसात न होने के चलते बुआई ही नहीं हो पाई थी, ग्रामीण क्षेत्र में मनरेगा ही किसानों और मजदूरों की आजीविका का एकमात्र सहारा रह गया था। इन परिस्थितियों में इस मद में बजटीय आबंटन बढ़ाना सरकार की मजबूरी बन गई थी।

मुखौटा लगाने से असलियत नहीं बदलती है। हां, कुछ भ्रम जरूर फैलाया जा सकता है। जिस सरकार ने योजना आयोग और पंचवर्षीय योजनाएं खत्म कर दी, वही अब जनता को भरमाने के लिए एक साल के बजट में पांच साल की योजना प्रस्तुत कर रही है। जहां रेल बजट में वर्ष 2020 तक कन्फर्म टिकट मिलने की योजना बता दी गई वहीं आम बजट में वर्ष 2022 में किसानों की आय दुगनी होनी की बात कही दी गई। जबकि वे इनके पुख्ता आधार बताने में नाकाम रहे हैं और बजटीय आबंटन भी एक साल के लिए तो हैं।

मुद्रास्फीति और महंगाई के बने रहने के बाद भी आयकर दरों में कोई बदलाव नहीं हुआ। विदेशी निवेश में बावली सरकार ने बचत को जबर्दस्त हतोत्साहित किया है। यहां तक कर्मचारी भविष्य निधि को भी निशाना बना लिया गया, जो अभी तक पूरी तरह से करमुक्त थी। यह सरकार मालिकों के हित में श्रम कानूनों में बदलाव कर न केवल शोषण से बचाव के अधिकारों से श्रमिकों को वंचित कर रही है, बल्कि उनके बचत के आर्थिक स्रोतों पर भी लंगड़ी मार उनके बुढ़ापे के लिए संचित राशि भी लूट ले जाने का इंतजाम कर रही है। कैसा बजट, किसके ‘अच्छे दिन’? अब तो मोदी के हर जुमले जले पर नमक का असर करते हैं। (रामचंद्र शर्मा, तरूछाया नगर, जयपुर)

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शिक्षा का छद्म
यह अत्यंत चिंता का विषय है कि हमारे देश में समान स्कूली शिक्षा के सवाल को प्रशासन ने कभी गंभीरता से नहीं लिया है। और अब शायद यह भी कड़वा सच है कि समान स्कूली शिक्षा एक सपना ही बन कर रह जाएगी। शिक्षा आयोग भी आखिरकार इसे कारगर ढंग से लागू न कर सका। आयोग ने भी इसकी विफलता के पीछे आर्थिक और सामाजिक विषमताओं का कारण बताया। सवाल है कि आखिर क्यों प्रशासन इसे बेहतर बुनियादी ढांचा देने में असफल रहा। खाए-अघाए लोगों को इससे कोई सरोकार नहीं है कि समाज के एक बड़े वर्ग के गरीब बच्चों को बुनियादी शिक्षा भी बड़ी कठिनाई से मिल रही है। एक ओर निजी स्कूलों के बच्चे तरक्की की होड़ में लगे हैं तो दूसरी ओर साधारण स्कूलों के बच्चे पास-फेल की मशक्कत में लगे हुए हैं। साधारण स्कूलों में खुद सरकार भी निवेश नहीं करना चाहती है, इसलिए उनमें संसाधनों की कमी है। शायद इसी कारण शिक्षा आयोग की सिफारिशें भी कभी हकीकत न बन सकीं। (रमेश शर्मा, केशवपुरम, दिल्ली)

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स्त्री का हक
हर वर्ष देश में महिला दिवस पूरे जोर-शोर से मनाया जाता है। लेकिन महिलाओं के मानसिक-शारीरिक उत्पीड़न का सिलसिला बदस्तूर जारी है। बलात्कार, कन्या भ्रूणहत्या, छेड़छाड़ और दहेज जैसी घिनौनी समस्याएं कुछ भी कम नहीं हो रही हैं। सरकार द्वारा योजनाएं बना दी जाती हैं, मगर वह धरातल से कोसों दूर होती है। गांवों में आज भी महिलाओं को परदे में रखा जाता है। आजादी के बाद देश में शिक्षा का ग्राफ बढ़ा है, मगर अब भी महिलाएं बहुत पीछे हैं। महिला दिवस मनाने की सार्थकता तभी सिद्ध होगी अगर उन्हें सही मायने में उनका हक मिले। समाज को अपनी सोच में बदलाव लाना होगा। लड़के की चाहत में लड़कियों की गर्भ में हत्या न हो, महिलाओं को भी एकजुट होकर अपने अधिकारों के लिए लड़ाई लड़नी होगी। महिला सशक्तीकरण का नारा तभी बुलंद होगा, जब महिला सही मायने में पुरुषों के बराबर आ जाएगी।
(सलोनी मंढाण, यमुनानगर)

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गांव की सुध
बजट से स्मार्ट सिटी गायब रहा। जिस स्मार्ट इंडिया की बात हमेशा प्रधानमंत्री करते रहे, ऐन वक्त पर उसकी कोई सुध नहीं ली गई। बजट में सरकार की बाजीगरी आगामी चुनावों को देखते हुए सन्न कर देने वाली है। सरकार का बजट ‘ग्रामीण भारत’ का बजट कहा जा रहा है। इस साल चार राज्यों में चुनाव होने हैं और उनमें वोट डालने यही ग्रामीण भारत जाएगा। इस बजट में सरकार ने अमीरों से लेकर गरीबों को देने की कोशिश की है। ज्यादा आमदनी और महंगी गाड़ियों पर अतिरिक्त सरचार्ज से वसूल कर गरीबों को गैस कनेक्शन दिए जाएंगे। इस लेन-देन में सरकार अपना चुनावी फायदा उठा ले जाएगी। ग्रामीण क्षेत्र पर खर्च सरकार तो करेगी, लेकिन कैसे इसका कोई प्रारूप नहीं बताया गया। देखना होगा कि चुनावों को देखते हुए वित्तमंत्री ने जो दांव खेला है वह कितना फायदेमंद रहेगा। (विनय कुमार, आइआइएमसी, नई दिल्ली)

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