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बिहार का पाठ

भाजपा नेताओं ने यह मान लिया है कि उनकी पार्टी की पराजय का मूल कारण ‘गणित’ है। देश का केवल चौबीस प्रतिशत मतदाता मोदीजी का अंध समर्थक और छिहत्तर..
Author नई दिल्ली | November 17, 2015 21:41 pm
पटना के एक मतदान केंद्र पर वोट देने के लिए लाइन में खड़ी महिलाएं। (पीटीआई फाइल फोटो)

भाजपा नेताओं ने यह मान लिया है कि उनकी पार्टी की पराजय का मूल कारण ‘गणित’ है। देश का केवल चौबीस प्रतिशत मतदाता मोदीजी का अंध समर्थक और छिहत्तर प्रतिशत उनकी नीतियों का विरोधी है। लोकसभा चुनाव में विपक्षी पार्टियां अलग-अलग लड़ी थीं। इस कारण मोदीजी के विरोधी मत विभाजित हो गए थे, और भाजपा विजय के रथ पर आरूढ़ हो गई थी। बिहार चुनावों के पहले भाजपा ने अपने कट््टरपंथी नेताओं को सांप्रदायिक वातावरण बनाने के लिए खुली छूट दे दी थी। भाजपा नेताओं ने देश के राष्ट्रीय मिजाज को पहचानने में भूल की और यह मान लिया कि जिस प्रकार गुजरात में और मुजफ्फरनगर में हिंदू वोटों की लामबंदी करने में समर्थ हुए थे, वैसे ही हम बिहार के चुनावों में सफलता अर्जित कर लेंगे।

यही कारण है कि विकास का खेल खेलना छोड़, ये लोग ‘बीफ-बीफ’ चिल्लाने लगे। ‘अब्दुल कलाम एक मुसलिम होते हुए भी राष्ट्रवादी थे’, ‘शाहरुख खान रहते भारत में हैं, मगर उनका दिल पाकिस्तान में रहता है’, ‘अगर गलती से भी भाजपा बिहार में हार गई तो पटाखें पाकिस्तान में छूटेंगे’, ‘लेखकों का पुरस्कार लौटाना गढ़ा हुआ विरोध है’ आदि वक्तव्य इसके प्रमाण हैं। इससे देश का जो नौजवान विकास और नौकरी प्राप्त करना चाहता है, वह इस बार भाजपा विरोधी हो गया।

लोकसभा में भाजपा को जीत मिलने की स्थिति में महंगाई छूमंतर हो जाने का दावा करने वाली भाजपा के शासन काल में घर का खर्चा चलाना कठिन हो गया। इस कारण बिहार के चुनाव में महिलाओं ने बढ़-चढ़ कर मतदान किया और भाजपा की पराजय में योगदान किया।

चुनाव के दौरान स्थानीय नेताओं की घोर उपेक्षा की गई। सारा चुनाव मोदी-अमित शाह की जोड़ी के चतुर्दिक होकर सिमट गया। मोदीजी ने ऐसी भाषा का प्रयोग किया जो प्रधानमंत्री पद की गरिमा के अनुरूप नहीं थी। भाजपा की भारी पराजय के बाद वे अब महात्मा गांधी की स्तुति कर रहे हैं। अब उस संस्था के प्रवक्ता मुसलमानों को अपना भाई मान रहे हैं। जवाहरलाल नेहरू का अवमूल्यन होना बंद हो गया है और उनको आधुनिक भारत के निर्माता कहना आरंभ हो गया है। फिल्म जगत के जिस अभिनेता के नेतृत्व में सुनियोजित मार्च दिल्ली की सड़कों पर निकाला गया था और जिसमें पुरस्कार लौटाने वाले लेखकों, कलाकारों और वैज्ञानिकों को ‘देशद्रोही’ की उपाधि से नवाजा गया था, उसने भाजपा के कट््टरवादी नेताओं के खिलाफ बोलना शुरू कर दिया है और उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई करने के लिए प्रधानमंत्री को पत्र लिखने का देश की जनता को आश्वासन दिया है।
मोदीजी विदेश में भारत को महात्मा गांधी और गौतम बुद्ध का देश बता रहे हैं। काश! वे चुनावों में भी इसी तरह की भाषा बोल पाते। (महावीर सरन जैन, बुलंदशहर)

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तब और अब
आज भारत का जितनी तेजी से भूमंडलीकरण करने का प्रयास चल रहा है, उतना पिछले पचीस सालों में नहीं हुआ। क्या सच में अर्थव्यवस्था पिछले एक दशक में इतनी चरमरा गई है कि उसमें क्रांतिकारी परिवर्तन लाने की जरूरत आ पड़ी है? पिछले सालों में रुपए की कीमत में भारी गिरावट आई है, महंगाई अपने चरम पर है। अरहर, मूंग, मसूर, उड़द, चना आदि दालों और सरसों का तेल के दाम आसमान छू रहा है। देश की विकास दर काफी नीचे आ गई और तो और बेरोजगारों की संख्या अपने चरम पर है, कुल मिला कर जनता महंगाई से परेशान है। केंद्र सरकार और राज्यों की सरकारों को चाहिए कि महंगाई पर काबू पाने के लिए ठोस उपाय करें, जिससे आम आदमी को महंगाई से राहत मिल सके।
दूसरी तरफ भूमंडलीकरण, उदारीकरण और सारी समस्याओं का हल उसी तर्ज पर किया जा सकता है जिस तरह का 1990 के दौर में करने की कोशिश की गई थी? लेकिन पचीस वर्षों बाद हुआ क्या? मगर सरकारी तंत्र इन नीतियों के लागू होने के परिणामों का सही अध्ययन करने की जगह फिर से कुछ वैसा करने का प्रयास कर रहा है, जैसा पचीस वर्षों पूर्व हुआ था।
पहले के और अब हो रहे प्रयासों में फर्क बस इतना है कि तब केंद्र में गठबंधन की सरकार थी और अब एक पूर्ण बहुमत की स्थायी सरकार है। क्या महंगाई, बेरोजगारी और तमाम समस्याओं से हम इसी तरह छुटकारा पा सकते हैं? या हमारी सारी समस्याओं का समाधान इसी तरह से होता रहेगा?(अंतरिक्ष कर सिंह, भोपाल)

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किसका बाल दिवस
हमारे देश में शहरी, ग्रामीण और अमीर-गरीब की विभाजक रेखा ने मासूम बच्चों के भी दो हिस्से कर दिए हैं। पहली श्रेणी में वे आते हैं, जो सुबह तैयार होकर, टिफिन लेकर स्कूल के लिए रवाना होते हैं, तो दूसरी कतार में वे हैं, जिनको सुबह से दोपहर तक एक अदद रोटी की तलाश में निकलना होता है। जाहिर है, बाल दिवस का दूसरी कतार के बच्चों के लिए कोई महत्त्व नहीं है। बाल दिवस का महत्त्व सिर्फ उनके लिए है, जो अपने लंच बॉक्स में फॉस्ट फूड भर कर ले जाते हैं। महानगरों के मोटियाते बच्चों के लिए बाल दिवस पर चाचा नेहरू के विचारों को रटना अब एक फैशन-सा बनता जा रहा है। यानी वे इसको अपना स्टेट्स सिंबल मानते हैं। इन सब बातों से जाहिर होता है कि बाल दिवस इन्हीं बच्चों के लिए मायने रखता है। (अतुल कुमार, दिल्ली विवि, दिल्ली)

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कथनी और करनी
देश के जाबाज सैनिक जिन्होंने वीरता का परिचय देते हुए देश की सीमाओं की रक्षा ही नहीं की, बल्कि अनेक सैनिकों ने अपने प्राण तक न्योछावर किए, उनके उस अमूल्य कार्य के लिए देश ने उनको विभिन्न तगमे देकर समय-समय पर सम्मानित भी किया, यह उन पर कोई उपकार नहीं रहा। इस तरह के सम्मान को वापस करना या नष्ट करना अपना और देशवासियों का अपमान है, सरकारों और राजनीतिक दलों को इन सबकी कम ही परवाह होती है। अच्छा होगा पूर्व सैनिक अपनी पेंशन राशि को इन अमूल्य सम्मानों से तुलना न करें। विरोध के और अनेक तरीके भी हैं। हम देशवासियों का दुर्भाग्य ही है कि जो भी दल सत्ता में आता है वह अपनी बात बिल्कुल भूल जाता है, जो उसने विपक्ष में रहते हुए कही, यही सबसे बड़ा कारण होता है किसी भी विषय पर असंतोष का।
(यश वीर आर्य, दिल्ली)

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