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कुप्रथाओं के विरुद्ध

बाल विवाह के पीछे अभिभावक गरीबी और एक झंझट से मुक्ति का तर्क देते हैं। दहेज प्रथा अगर खत्म हो जाए तो निश्चय ही लोग बाल विवाह नहीं करेंगे।
Author October 5, 2017 01:27 am
पटना में प्रेस कॉन्‍फ्रेंस के दौरान बिहार के मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार। (Source: PTI)

कुप्रथाओं के विरुद्ध
बिहार में शराबबंदी के बाद बाल विवाह और दहेज प्रथा के निषेध के लिए बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पहल अगर कारगर हो गई तो बहुत ही बेहतर सामाजिक वातावरण का निर्माण होगा। शराब का सेवन दहेज लेने वालों की अपेक्षा बहुत कम लोग करते हैं। ज्यादातर लोग दहेज के लोभ में फंसे होते हैं। इसलिए इसकी सफलता समाज और सरकार के लिए बहुत बड़ी चुनौती साबित होगी। खासतौर पर इसलिए भी कि बाल विवाह के विरुद्ध अभी भी कानून है, इसके बावजूद बाल विवाह होता है। इसी तरह दहेज लेने-देने के विरुद्ध भी कानून है, लेकिन लोग दहेज का लेन-देन सरेआम करते हैं। शायद ही किसी लड़की की शादी बिना दहेज के हो पाती है। बाल विवाह के पीछे अभिभावक गरीबी और एक झंझट से मुक्ति का तर्क देते हैं। दहेज प्रथा अगर खत्म हो जाए तो निश्चय ही लोग बाल विवाह नहीं करेंगे।
दरअसल, इन दोनों कुरीतियों से निपटने के लिए सरकार और समाज को अन्य कार्यक्रम की भी व्यवस्था करनी पड़ेगी। इस मसले पर बने पहले के ही कानूनों को अगर ठीक से अमल में लाया जाए तो बड़ा बदलाव लाया जा सकता है।
’मिथिलेश कुमार, भागलपुर, बिहार

न्याय की गति
भारत में न्याय मिलने की गति इतनी धीमी है कि कई बार इंसाफ कराहता दिखता है। यह प्रकिया आजादी के बाद भी पहले की तरह ही चली आ रही है, चाहे वह राष्ट्रीय मुद्दा हो या फिर लोगों को इंसाफ दिलाने की बात। इसके कारण विकास भी ठीक से नहीं हो पाता। यह कहना अनुचित नहीं होगा कि भारत की न्याय व्यवस्था आलसी है। लोगों को इंसाफ मिलते-मिलते इतना वक्त हो जाता है, इतने झंझावात झेलने होते हैं, पैसे खर्च करने पड़ते हैं कि वह इंसान अपने हक में आए फैसले का जश्न भी नहीं मना पाता।
’किरण मौर्य, दिल्ली

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