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जीत के पीछे

बिहार विधानसभा चुनाव में राजद, जद (एकीकृत) और कांग्रेस के महागठबंधन की शानदार जीत ने साबित किया कि बिहार के लोग सहिष्णु हैं और असहिष्णुता रखने वाले..
Author नई दिल्ली | November 13, 2015 22:21 pm
राजद कार्यालय में महागठबंधन की ऐतिहासिक जीत के बाद एक-दूसरे से गले मिलते लालू प्रसाद और नीतीश कुमार। (पीटीआई फोटो)

बिहार विधानसभा चुनाव में राजद, जद (एकीकृत) और कांग्रेस के महागठबंधन की शानदार जीत ने साबित किया कि बिहार के लोग सहिष्णु हैं और असहिष्णुता रखने वाले लोगों को यहां जगह नहीं मिलने वाली है। हालांकि चुनाव के पहले और बाद में यह खूब उछाला गया कि यहां जाति पर आधारित चुनाव होते हैं लेकिन बिहार की जनता ने इन बातों पर ध्यान दिए बिना महागठबंधन को न केवल जीत दिलाई बल्कि राजग और उसके नेताओं को यह बताया कि केवल भाषण और ध्रुवीकरण की राजनीति करने से बात नहीं बनती। भाजपा नेताओं के बेसुरे बोल और घृणित तरीके से ध्रुवीकरण के विरोध में बिहार के लोगों ने यह माना कि लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार ही ऐसी ताकत हैं जो भाजपा को रोक सकते हैं। चुनाव में महिलाओं की दमदार भागीदारी इस बात की तरफ साफ संकेत था कि महंगी दाल, प्याज से उनके घर का बजट गड़बड़ा रहा है। इसके बाद नीतीश कुमार ने जो विकास की नींव रखी थी उसे लेकर ही लोग मतदान केंद्र पर पहुंचे।

यदि जातिवाद के आधार पर लोग वोट देते तो रामविलास पासवान, जीतनराम मांझी, पप्पू यादव, ओवैसी ये सभी जातिवाद का सहारा लेकर चुनाव मैदान में थे तो लोगों ने इन्हें भी क्यों नकार दिया? प्रधानमंत्री ने जिस तरह से बिहार की अस्मिता का मजाक उड़ाया या अमित शाह जैसे नेताओं ने पाकिस्तान को मोहरा बना कर बिहार में पैठ जमाने का प्रयास किया, बिहार की जनता में इससे आक्रोश और बढ़ा जो पूरे मतदान में मौन धारण किए हुए महागठबंधन की जीत के लिए अग्रसर दिखा। बिहार चुनाव के बाद भाजपा के नेताओं को आत्ममंथन करना होगा कि मुल्क में केवल उग्र हिंदुओं के बल पर सत्ता प्राप्त नहीं की जा सकती है। यहां सत्ता के लिए सभी धर्मों, सभी समुदायों को साथ लेकर चलना होगा। भारत में सदियों से आपसी प्रेम और सहिष्णुता रही है। इसे किसी भी उग्र विचार से खत्म नहीं किया जा सकता। (अशोक कुमार, तेघड़ा, बेगूसराय)

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गुम होता बचपन:

सोने, खेलने-खाने की उम्र में बच्चों को स्कूल भेजने की होड़ और उनसे बड़ों जैसी अपेक्षाएं बच्चों पर होने वाली सबसे बड़ी हिंसा, अत्याचार और अपराध है। सूचनाओं के प्रवाह की तेजी, ओढ़ी हुई व्यस्तता और मोबाइल के इस युग में हमारे पास सोचने के लिए समय ही नहीं है वरना प्रतिस्पर्धा और कृत्रिम बुद्धिमता की इस अंधी दौड़ में हम अपने बच्चों के बचपन के गुम होने की प्रक्रिया में भागीदार नहीं बन रहे होते। प्ले-ग्रुप या नर्सरी के बच्चों को करीब से देखने पर सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि अनजाने में ही सही, बच्चों पर होने वाली इस हिंसा में कहीं न कहीं हम सब शामिल हैं।

इतना करने के बाद ऐसे बच्चों के भावनात्मक और संवेदनशील होने की बात सोचना बबूल का पेड़ लगा कर आम के पेड़ की अपेक्षा करने जैसा है। भले ही कैलाश सत्यार्थी और मलाला यूसुफजई को बाल अधिकारों की लड़ाई के लिए नोबेल पुस्कार मिल गया हो, लेकिन कम उम्र में बच्चों को स्कूल भेजने से बच्चे मानवीय गुणों और मूल्यों से दूर होते जा रहे हैं और उनका पूरी तरह से शारीरिक और मानसिक विकास भी नहीं हो पा रहा है। सफलता और कामयाबी के बदले हुए पैमाने के कारण शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ रोजगार प्राप्त करना रह गया है, यह बहुत खतरनाक और दुर्भाग्यपूर्ण है। रोजगार के लिए देश से पलायन करने वालों में भारत पहले स्थान पर है। निस्संदेह यह बहस का विषय होना चाहिए। इन बदली हुई परिस्थितियों में बच्चों के बचपन को बचाना हम सबकी जिम्मेदारी है और यह तभी संभव होगा जब हम बचपन से बचपन जैसी अपेक्षाएं रखेंगे न कि पचपन की। (एसके सिंह, जीवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर)

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यह सबक: 

दिल्ली के बाद अब बिहार में भाजपा की करारी हार उसकी अनेक कमियों को दर्शाती है। स्वयं पर नियंत्रण करते हुए मोदीजी और अन्य नेताओं को पार्टी में अनुशासन लाना होगा। कहीं बहुत ज्यादा बोलना और कहीं बिलकुल चुप ही रहना बहुत घातक रहा है। जुमलों की राजनीति छोड़ वास्तविकता पर ही कदम रखने होंगे। भूल सुधार करते हुए जनता दरबारों के माध्यम से जनता से जुड़ना होगा। दो दिन का काम सौ दिन में न करें, इसे जल्द निपटाना होगा।

बिहार की तरह पूरा लाव-लश्कर अन्य कहीं भी नहीं ले जाना होगा। चुनाव महज प्रबंधन से नहीं, जनता के साथ जुड़ाव से ही जीते जाते हैं। एक निश्चित वर्ग की पाटी होने की जो छवि बनी हुई है उसे व्यापक जनमंथन से बदलना होगा। समय और समाज के बदलाव को देखकर उसके अनुसार ही चलना होगा।
(वेद मामूरपुर, नरेला, दिल्ली)

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बड़ा खतरा:

एक अध्ययन के अनुसार पाकिस्तान परमाणु हथियार के लिहाज से दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी ताकत बनने की राह पर है। अगले दस साल में पाकिस्तान के एटमी हथियार जखीरे में दोगुना इजाफा होने के साथ ही उसके एटमी हथियारों की संख्या ढाई सौ तक पहुंच सकती है। यह खबर सारी दुनिया के लिए चिंताजनक है। भारत के लिए तो और भी क्योंकि पाकिस्तान उसका पड़ोसी देश है। इतना ही नहीं, पाकिस्तान की तरफ से परमाणु हथियार के इस्तेमाल को लेकर निहायत गैर-जिम्मेदाराना बयान जब-तब आते रहे हैं। मसलन, पिछले दिनों पाकिस्तान के विदेश सचिव एजाज चौधरी ने कहा कि उनके देश ने ‘भारत के संभावित हमले को रोकने’ के लिए कम क्षमता के सामरिक परमाणु हथियारों का विकास किया है। यह भी गौरतलब है कि एजाज ने यह बात वाशिंगटन में कही। इस तरह के और भी बयान याद किए जा सकते हैं।

परमाणु हथियारों के पक्ष में एक दलील यह दी जाती है कि वे ‘युद्ध प्रतिरोधक’ का काम करते हैं, यानी अगर किसी देश के पास एटमी हथियार मौजूद हो, तो कोई उस पर हमला करने की हिम्मत नहीं करेगा। लेकिन एटमी हथियारों की मौजूदगी ही दुनिया के लिए एक बड़ा खतरा है। उनकी सुरक्षा एक बहुत जिम्मेदारी भरा काम है। अगर पाकिस्तान को लेकर अक्सर अंदेशा जाहिर किया जाता है तो इसीलिए कि वहां निर्वाचित राजनीतिक नेतृत्व कमजोर है। सुरक्षा संबंधी सारे फैसले सेना ही करती है। फिर, वहां कई तरह के कट्टरपंथी संगठन सक्रिय हैं और सेना के भीतर भी वे सेंध लगाते रहते हैं। आतंकवादी गुट जाने कब से ताक में हैं कि एटमी हथियार उनके हाथ लग जाए। अगर ऐसा कभी हुआ तो वह दुनिया के लिए बहुत ही भयावह होगा। (अनिल धीमान, नंदनगरी, दिल्ली)

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