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चेतने का समय

जिस आतंकवाद को पाकिस्तान ने दूसरों के लिए पाला-पोसा और खड़ा किया, आज वही उसके गले की फांस बन गया है।
Author नई दिल्ली | January 27, 2016 01:01 am
तालिबानी हमले के बाद बाचा खान विश्वविद्यालय परिसर में बिखरा खून। (photo: Agency)

कहा जाता है कि जो दूसरों के लिए गड्ढा खोदते हैं, वे एक दिन खुद उसमें जा गिरते हैं। आज कुछ इसी प्रकार की स्थिति पड़ोसी देश पाकिस्तान की है। जिस आतंकवाद को उसने दूसरों के लिए पाला-पोसा और खड़ा किया, आज वही उसके गले की फांस बन गया है। ताजा मामला पेशावर के बाचा खान विश्वविद्यालय में हुए आतंकी हमले का है, जिसकी जिम्मेदारी तहरीक-ए-तालिबान ने ली है। इस हमले में करीब दो दर्जन लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया और लगभग पचास लोग जख्मी हुए। इस दुर्घटना से आर्मी स्कूल पर हुए हमले की भी याद ताजा हो गई, जो साल भर पहले हुआ था, जिसमें 130 स्कूली बच्चों समेत 140 लोग मारे गए थे।

इन हमलों से लगातार साबित हो रहा है कि आतंकवाद किसी का सगा नहीं होता, चाहे वह पाकिस्तान जैसा मुल्क क्यों न हो, जो इन आतंकियों को फलने-फूलने का भरपूर मौका देता है। पाकिस्तान आज तक आतंकवाद को ‘गुड’ और ‘बैड’ की श्रेणी में रखता रहा है, लेकिन अब उसे समझना होगा कि आतंक में गुड या बैड जैसी कोई चीज नहीं होती। आतंकवाद सिर्फ आतंकवाद होता है, जो किसी का भी हित नहीं कर सकता। न तो उसका किसी देश से कोई वास्ता होता है, न किसी सांप्रदाय से। वह सिर्फ बंदूक के बल पर दुनिया को अपने नजरिए से हांकना चाहता है। अगर कोई भी उसके रास्ते में आएगा, तो उसके साथ वह वही करेगा जो पेशावर में किया और जिसका परिणाम हम सब देख रहे हैं। इसलिए पाकिस्तान को नींद से जागना चाहिए। (विमल विमर्या, देवघर, झारखंड)
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राजनीति से परे

हैदराबाद विश्वविद्यालय में एक छात्र द्वारा आत्महत्या की घटना अत्यंत दुखदाई प्रसंग है। पर इस घटना के बाद जो घटित हो रहा है वह और दुर्भाग्यपूर्ण तथा खतरनाक है। इस मुद्दे को एक राजनीतिक अवसर के रूप में लपकने को तैयार राजनेता और अपनी बाइट के रूप में देखने वाले न्यूज चैनल जिस प्रकार इसका प्रस्तुतीकरण कर रहे हैं उसका समाज के ताने-बाने पर कितना बुरा असर पड़ेगा, उसकी जरा भी उन्हें चिंता नहीं है। जहां इन लोकतंत्र के प्रथम और चतुर्थ स्तंभों का काम समाज में पैदा हुई खाई को पाटने और समस्त प्रकरण की न्यायोचित जांच और दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई के लिए दबाव डालने का होना चाहिए, उसके विपरीत ये सभी अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए आग भड़काने का काम करते नजर आते हैं। शिक्षा के मंदिरों में जाति, धर्म, संप्रदाय आधारित संकीर्ण मानसिकता का कोई स्थान नहीं होना चाहिए। इस मामले की जांच निष्पक्षता और समग्र रूप से की जानी चाहिए।

नीति निर्माताओं और शिक्षाविदों को यह भी देखना होगा कि शिक्षा के मंदिर जैसे पवित्र स्थान पर एक आतंकी के समर्थन में (जिसे न्याय पालिका ने समुचित जांच विचार के बाद मृत्युदंड दिया) विद्यार्थी क्यों उतर आए। इस समूचे शोर-शराबे और राजनीति के बीच यह गंभीर मुद्दा दब-सा गया है। (जितेंद्र सिंह राठौड़, गिलांकोर)
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अंधी क्रांति का दौर
आज समाज या देश में कुछ घटित होता है, तो उसकी प्रतिक्रिया सबसे पहले मीडिया में देखने को मिलती है। फिर हम अपने विचारों को बिना नापे-तोले वाट्सऐप और फेसबुक आदि पर उसका प्रचार करने में जुट जाते हैं। उसे जो भी पढ़ता है, टीका-टिप्पणी करने लगता है! यानी प्रतिक्रियाओं की एक और कड़ी, फिर उन टिप्पणियों पर टिप्पणियां। इस प्रकार प्रतिक्रियाओं की एक अजीब-सी कड़ी बन जाती है और एक बेमतलब की बहस जन्म ले लेती है। नतीजतन असल मुद्दा और उस घटना से जुड़े तथ्य अंधेरे मे धकेल दिए जाते हैं!

इसमें हमारे जनतंत्र के प्रतिनिधि, नायक, मीडिया सभी भागीदार हैं! हम कुछ भी देखने, पढ़ने और सुनने के बाद बिना तथ्यों को खंगाले, बिना किसी प्रमाणिकता के और बिना अपने विवेक से उसका आकलन किए चल पड़ते हैं। ऐसे समय में जरूरत है अपने विवेक से काम करने की, फालतू के जुमलों को दरकिनार करने और एक-दूसरे की बात को समझने और परखने की, जिससे आपसी सौहार्द और रिश्ता कायम रहे। (हर्ष चेतीवाल, बहादुरगढ़)
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आतंकवाद का धर्म
दुनिया भर में आतंकवाद जिस तरह अपने पैर पसार रहा है, वह चिंता का विषय है। मानवता को नष्ट करने और दुनिया में अपना वर्चस्व कायम करने के इरादे से यह आगे बढ़ रहा है। जब बात आती है आतंकवाद के धर्म की, तो समस्त दुनिया से एक स्वर में यही आवाज निकलती है कि न आतंकवाद और न इसके नुमाइंदों का कोई धर्म होता है। मगर जब बारी आती है मारे गए आतंकी के अंतिम संस्कार की, तो उसके नाम के अनुसार ही किया जाता है। मानवता के दुश्मनों को पूरे सम्मान के साथ अंतिम विदाई क्यों दी जाती है? (सुनील चौरसिया, हरकेश नगर, नई दिल्ली)
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मतदान का महत्त्व
हर साल 25 जनवरी को मतदाता दिवस के रूप में मनाया जाता है। निर्वाचन आयोग की स्थापना 25 जनवरी, 1950 को हुई थी, इसलिए इस दिन को मतदाता दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिन कई जागरूकता अभियान चलाए जाते हैं। इस दिवस का मुख्य उद्देश्य नए मतदाताओं को पंजीकृत करने के साथ-साथ मतदान की अनिवार्यता के प्रति लोगों को जागरूक करना है। जानकारी के आभाव में आज भी एक बड़ा तबका मतदान का महत्त्व नहीं समझ पा रहा है। कुछ लोग दुष्प्रचार कर मतदाताओं को दिग्भ्रमित करने में सफल हो रहे हैं। चुनाव में मतों की खरीद-बिक्री खुलेआम देखी जा सकती है। मतदाताओं को जाति, भाषा, धर्म आदि के नाम पर तोड़ कर कुछ लोग सत्ता की सीढ़ी चढ़ रहे हैं। कुछ बाहुबली मतदाता को डरा कर मत लेने में सफल हो रहे हैं।

मतदाता लोकतंत्र की रीढ़ माना जाता है, लेकिन अपने बहुमूल्य मत की ताकत को नहीं जानने के कारण वह स्वतंत्र मतदान नहीं कर पा रहा है। इस साल छठवां मतदाता दिवस मनाया गया। इसके पूर्व के सालों में इस दिन लाखों नए लोगों का नाम मतदाता सूची में जोड़ा गया। मतदाता दिवस जैसे कार्यक्रम से लोगों में थोड़ी जागरूकता जरूर आई है। पिछले लोकसभा और विभिन्न राज्यों में संपन्न विधानसभा चुनावों में मतदान प्रतिशत को देख कर इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। जरूरत है और अधिक लोगों को जागरूक करने की। (प्रताप तिवारी, सारठ, झारखंड)

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