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मूकदर्शक मंडल

भाजपा की तीन धरोहर, अटल, आडवाणी, मुरली मनोहर! एक समय था जब यह नारा भाजपा के सशक्त और लोकप्रिय नेतृत्व की पहचान था। जनसंघ के दिनों से जनता पार्टी बनने और उसके बाद 1980 में भाजपा के रूप में जन्म लेने के समय से ही अटल, आडवाणी और जोशी की तिकड़ी पार्टी का चेहरा हुआ करती थी। भाजपा का चाल-चरित्र भी इन्हीं नेताओं के विमर्श से तय होता था।
Author May 29, 2015 18:02 pm

भाजपा की तीन धरोहर, अटल, आडवाणी, मुरली मनोहर! एक समय था जब यह नारा भाजपा के सशक्त और लोकप्रिय नेतृत्व की पहचान था। जनसंघ के दिनों से जनता पार्टी बनने और उसके बाद 1980 में भाजपा के रूप में जन्म लेने के समय से ही अटल, आडवाणी और जोशी की तिकड़ी पार्टी का चेहरा हुआ करती थी। भाजपा का चाल-चरित्र भी इन्हीं नेताओं के विमर्श से तय होता था।

यह इन्हीं नेताओं के अथक और दीर्घकालीन परिश्रम का परिणाम था जिसने पार्टी को दो सीटों से 1996 में सत्ता के शिखर तक पहुंचा दिया। उस वक्त के तमाम राजनीतिक विश्लेषकों के लिए यह शोध का विषय था कि सिर्फ स्थापना के सोलह साल बाद अपनी किशोरावस्था में ही कैसे एक पार्टी सत्ता के शिखर तक पहुंच गई?

मगर 2014 लोकसभा चुनाव में प्रचंड जनादेश की आंधी ने इतिहास के उन नायकों को परे सरका दिया जिन्होंने पार्टी को एक विशाल वट वृक्ष का आकार दिया था। चुनावी जीत के बाद जिस तेजी से भाजपा का चेहरा बदला उसका अंदाजा शायद किसी को नहीं था। पीढ़ी परिवर्तन के नाम पर बड़ी तेजी से पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को विश्राम दे दिया गया।

इसकी शुरुआत संसदीय बोर्ड से हुई जिसके पुनर्गठन के नाम पर उन्हीं नेताओं को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया जो उस बोर्ड के संस्थापक सदस्य थे। हद तो तब हो गई जब मार्गदर्शक मंडल नामक नई समिति बना कर इन वरिष्ठ नेताओं का राजनीतिक विस्थापन कर दिया गया।

प्रश्न है कि क्या यह मार्गदर्शक मंडल एक सांत्वना पुरस्कार की तरह नहीं है? क्या नए लोगों को शामिल करने के लिए इन ‘धरोहरों’ को निर्वासित करना जरूरी था? क्या बिना किसी को बाहर किए नए लोगों को शामिल नहीं किया जा सकता था? अगर ऐसा होता तो नई पीढ़ी का सम्मान बढ़ जाता और अभिभावक तुल्य मार्गदर्शकों का सम्मान बरकरार रह जाता।

खैर, किसी समिति में रहना-न रहना इन नेताओं के सम्मान और प्रतिष्ठा का पैमाना नहीं हो सकता। मगर सवाल है कि मार्गदर्शक मंडल नामक जिस समिति का का गठन किया गया जिसमें स्वयं प्रधानमंत्री भी हैं, उसकी कोई बैठक क्यों नहीं हुई? बड़ा प्रश्न यह है कि क्या इस मंडल ने गंभीर मुद्दों पर अपना मार्गदर्शन दिया और अगर दिया तो पार्टी ने उस पर कितना अमल किया?

विडंबना है कि सरकार के एक साल पूरा होने के प्रचार, उपलब्धियों और जश्न में मार्गदर्शक मंडल कहीं शामिल नहीं दिखता। सरकार के एक वर्ष के कामकाज की समीक्षा और प्रशंसा में मार्गदर्शकों का एक भी बयान नहीं आया। अटलजी तो स्वास्थ्य कारणों से सक्रिय राजनीति से दूर हैं मगर पार्टी की बंगलुरु में हुई राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के वक्ताओं की सूची में उस नेता का नाम न हो जो पहली कार्यकारिणी बैठक का अध्यक्ष था, तो प्रश्न तो उठेंगे।

सवाल किसी पद का नहीं है क्योंकि इन विभूतियों का व्यक्तित्व पद का मोहताज नहीं है। मगर सबक वर्तमान पीढ़ी के लिए है कि हार और जीत होते रहते हैं मगर जो चीज साथ रह जाती है वह है विरासत। अगर ऐसे में चाल, चेहरा और चरित्र का दंभ भरने वाली पार्टी अपनी गौरवशाली विरासत को न सहेज सकी तो पार्टी के करोड़ों कार्यकर्ताओं का वह प्रेरणा पुंज खो जाएगा जिसकी चमक ने उन्हें भाजपा की तरफ आकर्षित किया था।

शशांक शेखर, नालंदा

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