दुनिया मेरे आगे

  • मौत और मान्यताएं

    बीनू पिताजी की मामी को हम दादी कह कर बुलाते थे। कुछ समय पहले उनका निधन हो गया। महीने भर की बीमारी के दौरान उनके...

  • बेटी का समाज

    अलका कौशिक टिंबा ने मेरे शहरी दर्प को उस रोज चकनाचूर कर दिया था। नगालैंड के आदिवासी समाज की नुमाइंदगी करने वाला टिंबा अपनी ‘बोलेरो’...

  • दिखावे का रोग

    अंजलि सिन्हा अपनी जिंदगी के कोई पल यादगार बन पाएं, इसके लिए कुछ लोग न जाने क्या-क्या जतन करने लगते हैं। कोई खतरों से खेलता...

  • नाम की भूल

    शरद तिवारी बात बहुत पुरानी नहीं हुई है। कुछ समय पहले दूरदर्शन की एक अस्थायी समाचार वाचिका ने जब चीन के राष्ट्रपति का नाम गलत...

  • धर्मांतरण के पहलू

    उमाशंकर सिंह धर्मांतरण पर मचे शोरगुल के बीच सत्तारूढ़ भाजपा जोर देकर कह रही है कि वह धर्मांतरण रोकने लिए कानून बनाने के पक्ष में...

  • चेहरे और रंग

    निखिल आनंद गिरि संपादन या एडिटिंग एक कमाल का कौशल है। ऐसा कह सकते हैं कि संपादन कला के माध्यम से अखबारी लेखन हो या...

  • आहार का चुनाव

    विष्णु नागर हाल ही में शाकाहार के लाभों के बारे में श्रीश्री रविशंकर की एक टिप्पणी एक अखबार में छपी। रविशंकरजी का रुझान साफतौर पर...

  • रिश्तों की डोर

    शिबन कृष्ण रैणा जब यह तय हो गया कि तबादला निरस्त होने वाला नहीं है और दूसरी जगह जाना ही पड़ेगा तो हम पति-पत्नी सामान...

  • अनुशासन में शासन

    प्रेमपाल शर्मा दर्द है कि हर रोज रिसने के बावजूद कम नहीं हो रहा। दफ्तर खुलते ही दिल्ली स्थित केंद्र के सरकारी कर्मचारी आह भर...

  • विषमता का पाठ

    अरमान आमना बारह साल की बच्ची है। उसने पिछले दो सालों से दिन-रात एक करके नवोदय विद्यालय की परीक्षा की तैयारी की। तैयारी कराने वाले...