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‘कॉलेज ऑन वील्स’ के लिए नहीं खरीदी जा सकी ट्रेन, परियोजना खटाई में

इंडियन रेलवे कैटरिंग एंड टूरिज्म कारपोरेशन और दिल्ली विश्वविद्यालय की साझा पहल ‘ज्ञानोदय’ के लिए विश्वविद्यालय की ओर से ट्रेन खरीदने की घोषणा खटाई में पड़ती दिख रही है क्योंकि ट्रेन खरीदने के लिए अभी तक कोई पहल नहीं हो पाई है।
Author नई दिल्ली | November 9, 2015 20:51 pm

इंडियन रेलवे कैटरिंग एंड टूरिज्म कारपोरेशन और दिल्ली विश्वविद्यालय की साझा पहल ‘ज्ञानोदय’ के लिए विश्वविद्यालय की ओर से ट्रेन खरीदने की घोषणा खटाई में पड़ती दिख रही है क्योंकि ट्रेन खरीदने के लिए अभी तक कोई पहल नहीं हो पाई है। दरअसल 2013 में विश्वविद्यालय के कुलपति ने दिल्ली विश्वविद्यालय के 91वें स्थापना दिवस समारोह के दौरान घोषणा की थी कि विश्वविद्यालय भारतीय रेलवे से एक ट्रेन खरीदने की प्रक्रिया में है ताकि छात्रों को कक्षा से बाहर ले जाकर सिखाया जा सके। हालांकि अभी तक ट्रेन खरीदने संबंधी कोई पहल नहीं हो पाई है। विश्वविद्यालय में चर्चा है कि डीयू की ‘कॉलेज ऑन वील्स’ परियोजना ‘ज्ञानोदय एक्सप्रेस’ के लिए कोष संबंधी विकल्पों की तलाश की जा रहा है।

बता दें कि ज्ञानोदय एक्सप्रेस के प्रत्येक दौरे के लिए विश्वविद्यालय ने परियोजना और अनुसंधान संबंधी विचार पेश किए जाने के आधार पर करीब 1,000 छात्रों का चयन किया और उन्हें दौरे पर भेजा। इसका भुगतान खुद संस्थान को करना है। पिछले तीन साल में कार्यक्रम के तहत 4,500 से ज्यादा छात्रों ने देश भर का दौरा किया। 2013 में लंदन स्थित एडिनबर्ग यूनिवर्सिटी और किंग्स कॉलेज के 200 छात्रों ने भी दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों के साथ पंजाब का दौरा किया था।

एक्सप्रेस के एक डिब्बे को कक्षा में तब्दील कर दिया जाता था। विश्वविद्यालय के सामुदायिक रेडियो का उपयोग ट्रेन से कार्यक्रमों के सीधे प्रसारण के लिए किया जाता था। दौरे के समापन के बाद छात्र अपने प्रोजेक्ट के दस्तावेज तैयार करते थे। अब तक यह गुजरात, मुंबई, गोवा, बंगलुरु, राजस्थान और पंजाब आदि को कवर करते हुए पांच दौरे संपन्न कर चुकी है।यह परियोजना पूर्व कुलपति दिनेश सिंह ने 2012 में शुरू की थी। विवादित कार्यकाल पूरा होने के बाद सिंह पिछले महीने ही सेवानिवृत्त हुए हैं।

2015 में अब तक विश्वविद्यालय ने ऐसा कोई दौरा आयोजित नहीं किया है। 2012 में सिंह के विचार की विश्वविद्यालय के शिक्षक संघ (डूटा) ने आलोचना की थी। शिक्षक संघ ने इसे गैरकानूनी बताते हुए दावा किया था कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने इसके लिए कोई कोष स्वीकृत नहीं किया है। दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ (दिल्ली विश्वविद्यालयटीए) ने जब सिंह को हटाने की मांग करते हुए उनके खिलाफ ‘श्वेत पत्र’ जारी किया था तो उसमें भी इस मुद्दे का जिक्र था।

इस परियोजना की शुरुआत विश्वविद्यालय के कोषों का इस्तेमाल करते हुए हुई थी और मौजूदा प्रशासन के लिए ऐसा करना बहुत मुश्किल है। विश्वविद्यालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम जाहिर न करने के अनुरोध के साथ बताया कि ऐसी किसी यात्रा के लिए करीब दो करोड़ रुपए की जरुरत होती है। विश्वविद्यालय के सालाना बजट की नियम पुस्तिका में हालांकि ऐसे किसी कोष के आबंटन का कोई जिक्र नहीं है। एक अधिकारी ने कहा कि वे आश्वस्त नहीं हैं कि परियोजना चलती रहेगी या बंद हो जाएगी।

 

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