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लेखकों-पाठकों की नहीं दरकार, मेला बना किताबों का कारोबार

प्र्रगति मैदान में नौ दिन के लिए लगा विश्व पुस्तक मेला आखिर किसके लिए है? पाठकों और लेखकों के लिए या सिर्फ किताबों के कारोबार के लिए..
Author नई दिल्ली | January 13, 2016 02:45 am
बुक फेयर में पहुंचे आगंतुक किताब देखते हुए।

प्र्रगति मैदान में नौ दिन के लिए लगा विश्व पुस्तक मेला आखिर किसके लिए है? पाठकों और लेखकों के लिए या सिर्फ किताबों के कारोबार के लिए। अगर किसी पुस्तक मेले में स्टालों पर किताबें तो सजी हों, मगर उसमें लेखकों और पाठकों की उपस्थिति शोचनीय हो तो सवाल उठना लाजमी है कि पुस्तक मेला पाठकों और लेखकों के लिए होता है या किताबों के कारोबार के लिए। असहिष्णुता का मुद्दा उठानेवाले लेखकों की पुस्तकें तो थीं, मगर लेखक मेले से गायब थे।

एक पुस्तक प्रेमी या पाठक की हैसियत से ऐसे लेखकों के आने पर कोई रोक-टोक नहीं हैं। लेकिन मेले के साथ छह अलग-अलग मंडपों में लेखक मंच के चल रहे विभिन्न कार्यक्रमों में उनकी भागीदारी कहीं नहीं दिख रही है। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि अब ऐसे लेखक मेले में खुद नहीं आना चाह रहे हैं या आयोजकों ने ही उन्हें इस बार आमंत्रित नहीं किया।

वैसे देखें तो लेखक मंच के पहले दिन से लेकर आखिरी दिन तक के कार्यक्रमों में एक-दो नामचीन के साथ ज्यादातर युवा और अनजान लेखकों की ही भरमार है। आयोजकों की ओर से जारी कार्यक्रम पुस्तिका में मंगलेश डबराल को छोड़कर ज्यादातर सम्मान लौटाने वाले लेखकों के नाम कार्यक्रमों की सूची में शामिल ही नहीं हैं। ज्यादातर कार्यक्रमों में चुने हुए चार-पांच लेखकों की ही ज्यादा से ज्यादा भागीदारी दिखाई पड़ रही है। यही लेखक हैं, जो लेखक मंच के कार्यक्रमों में भी अपने हिसाब से अपने चहेते समकालीन लेखकों और चेलों को मनचाहा मौका दिलाने में कामयाब हो गए हैं। हालांकि लेखक मंच के कार्यक्रमों के आयोजकों की सूची में नेशनल बुक ट्रस्ट के अलावा उन संस्थाओं और संगठनों के नाम भी शामिल नहीं हैं, जो पिछले कई सालों से अपनी भागीदारी से पुस्तक मेले को लेखकों और पाठकों के उत्सव में बदलते रहे हैं।

यह जरूर है कि जिन संस्थाओं और संगठनों को अभी तक मौका नहीं मिला था, उनके मुखिया इस बार अपनी भागीदारी सुनिश्चित होने से काफी मगन दिखाई पड़े। पिछले सालों के मेले में प्रकाशक जिस तरह से बढ़-चढ़कर अपने ही स्टाल में लोकार्पण और विचार गोष्ठियां करते थे, वे भी कुछ वजहों से अपने हाथ-पांव समेटे हुए दिखे। मेले में यूनिफार्म में आने वाले स्कूली बच्चों और बुजुर्ग नागरिकों के निशुल्क प्रवेश के कारण पहले ही दिन से लोगों के आने का सिलसिला चल पड़ा है। भीड़ तो बढ़ रही है, पर पहले के विश्व पुस्तक मेले में जिस तरह से देश भर से लेखक आते थे और अपने पाठकों से सीधे मिलते थे, वैसा इस बार नहीं दिख रहा।

सूत्र बताते हैं कि इस बार जब लेखक मंच के कार्यक्रमों में भागीदारी के लिए प्रविष्टियां आईं तो उसकी बाकायदा सोच-समझ कर छंटाई की गई और मनमाने तरीके से जिन्हें चाहा मौका दिया और जिन्हें नहीं चाहा उनकी प्रविष्टयां रद्द कीं। प्रविष्टियों की छंटाई करने के आधार के बारे मेंपूछे गए सवालों पर मेले में सक्रिय अधिकारी का केवल यही जवाब था कि इस बार लेखक मंच पर डेढ़ घंटे के कार्यक्रम के लिए तीन हजार रुपए शुल्क रखा गया है, इसलिए मुफ्त वाले यहां सक्रिय नहीं हैं।
हालांकि मेले के एक कार्यक्रम में भाग लेने आईं हिंदी अकादमी की उपाध्यक्ष मैत्रेयी पुष्पा इस बात से अनजान दिखीं कि इस बार के मेले के कार्यक्रमों से सम्मान लौटाने वाले लेखकों को अलग रखा गया है। उन्होंने एक सवाल के जवाब में कहा कि यहां लेखकों के आने-जाने पर मुझे तो कोई बंदिश नहीं दिखाई देती है।

पिछले कई सालों से पंचकूला से विश्व पुस्तक मेले में अपने आधार प्रकाशन की पुस्तकों को लेकर आने वाले देश निर्मोही ने एक सवाल के जवाब में कहा कि अब यह पुस्तक मेला वास्तव में पुस्तक मेला नहीं रह गया है। यह केवल बाजार-सा दिखने लगा है। उनका कहना था कि आयोजकों का नजरिया बदल गया है। सभी चीजों के शुल्क बढ़ा दिए गए हैं। राजकमल प्रकाशन समूह के मुखिया अशोक माहेश्वरी का कहना है कि सम्मान लौटाने वाले लेखक हमारे मित्र हैं इसलिए विश्व पुस्तक मेले में उनकी भी पुस्तकें हमारे स्टालों पर हैं।

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