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Union Budget 2017: सरकार ने माना- नोटबंदी का पड़ा असर, ज्यादा से ज्यादा लोगों को आयकर दायरे में लाने पर जोर

union budget 2017: केंद्र सरकार ने साल 2016-17 की आर्थिक समीक्षा में नोटबंदी का असर पड़ने की बात मानी है। इसकी वजह से चालू वित्त वर्ष की आर्थिक वृद्धि दर में 0.5 फीसद का नुकसान होने की आशंका है।
Author February 1, 2017 07:02 am
संसद भवन में केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली। (PTI File Photo by Manvender Vashist/30 Jan, 2017)

केंद्र सरकार ने साल 2016-17 की आर्थिक समीक्षा में नोटबंदी का असर पड़ने की बात मानी है।  इसकी वजह से चालू वित्त वर्ष की आर्थिक वृद्धि दर में 0.5 फीसद का नुकसान होने की आशंका है। मगर इससे निपटने के लिए मंगलवार को पेश आर्थिक समीक्षा में सरकार ने जो कदम उठाने की बात कही है, उन पर अमल हुआ तो आम बजट में व्यक्तिगत आयकर दरों में कुछ राहत मिल सकती है। समीक्षा में सभी तरह की ऊंची कमाई करने वालों को आयकर दायरे में लाने पर जोर दिया गया है। साथ ही कंपनी कर की दरों में कटौती की दिशा में भी ठोस पहल हो सकती है। वर्ष 2016-17 की आर्थिक समीक्षा में नोटबंदी से प्रभावित अर्थव्यवस्था में आर्थिक गतिविधियों को गति देने के लिए न केवल व्यक्तिगत आयकर दरों में कटौती की जरूरत बल्कि कंपनी कर में कमी लाने की योजना को तेजी से लागू करने की सिफारिश भी की गई है।  वित्त मंत्री अरुण जेटली द्वारा संसद में मंगलवार को पेश 2016-17 की आर्थिक समीक्षा में नोटबंदी के प्रभावस्वरूप चालू वित्त वर्ष की आर्थिक वृद्धि दर बाकी में 0.5 फीसद का नुकसान होने की आशंका को स्वीकार किया गया है। समीक्षा में इस प्रभाव का आकलन करते हुए सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर के 6.5 फीसद रहने का अनुमान जताया गया है। इससे पहले केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (सीएसओ) ने वर्ष के दौरान जीडीपी वृद्धि दर 7.1 फीसद रहने का अग्रिम अनुमान जताया था। तब सीएसओ ने कहा था कि इसमें नोटबंदी के प्रभाव को शामिल नहीं किया गया है।

हालांकि समीक्षा में कहा गया है कि अगले वित्त वर्ष में सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर उछल कर 6.75 से लेकर 7.5 फीसद के दायरे में पहुंच सकती है, पर इसके लिए उसने आर्थिक गतिविधियों को बढ़ाने के उपाय करने पर जोर दिया है। समीक्षा में हालांकि, उच्च आय वर्ग के बारे में साफ खुलासा नहीं किया गया है। पर संभव है कि संकेत बड़े किसानों की खेती से होने वाली भारी-भरकम आमदनी की तरफ हो। इस समय समूची कृषि आय आयकर के दायरे से बाहर है।
समीक्षा में महात्मा गांधी की ‘हर आंख से आंसू पोंछने’ की सोच का जिक्र करते हुए सर्वजनीन बुनियादी आय (यूबीआइ) योजना को लागू करने पर जोर दिया गया है। योजना के तहत गरीब को कुछ आय उपलब्ध करा कर देश से गरीबी समाप्त करने की बात भी की गई है। समीक्षा में कहा गया है-नोटबंदी के बाद व्याप्त अनिश्चितता को देखते हुए हमने वर्ममान मूल्य पर आधारित सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर में 0.25 फीसद से लेकर एक फीसद तक के दायरे में कमी आने का अनुमान लगा रखा है। यह इस मान्यता पर आधारित है कि वर्तमान मूल्य आधार पर यह वृद्धि दर 11.25 फीसद रहेगी। दूसरी तरफ अनुमानित सात फीसद की वास्तविक वृद्धि को आधार मानते हुए वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर में 0.25 फीसद से लेकर 0.5 फीसद की कमी आने का अनुमान लगाया गया है।
समीक्षा के अनुसार नोटबंदी के बाद आने वाले कुछ समय में वस्तु एवं सेवाकर के क्रियान्वयन और दूसरे संरचनात्मक सुधारों से अर्थव्यवस्था को इसकी क्षमता के अनुरूप 8 से 10 फीसद की तीव्र वृद्धि के स्तर पर पहुंचाया जा सकेगा।

सरकार को महंगाई के मुद्दे पर सतर्क करते हुए कहा गया है कि उसे दाल के अलावा दूसरे कृषि उत्पादों पर भी नजर रखनी चाहिए। पिछले साल दाल के दाम काफी चढ़ गए थे। ऐसा ही दूसरे कृषि उत्पादों के मामले में नहीं हो इस पर नजर रखनी होगी। मुद्रा की तंगी से दूसरे कृषि उत्पादों की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। विशेष तौर से दूध (जहां खरीद कम रही है), दक्षिणी राज्यों में जहां सूखा पड़ा है और गन्ने की उपलब्धता कम रहने से उत्पादन कम रह सकता है। उनमें चीनी पर नजर रखने की जरूरत है। आलू और प्याज के मामले में जिन राज्यों में बुआई कम हुई है, नजर रखने की जरूरत बताई है।
समीक्षा में वैश्विक बाजार में कच्चे तेल के दाम बढ़ने के खतरे की तरफ भी इशारा किया गया है। इसके अलावा प्रमुख देशों के बीच व्यापार क्षेत्र में तनाव पैदा होने के बारे में भी सरकार का ध्यान खींचा गया है। मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमणियन द्वारा तैयार की गई आर्थिक समीक्षा में दावा किया गया है कि नए नोटों के जरूरत के मुताबिक अर्थव्यवस्था में आने के बाद आर्थिक वृद्धि की रफ्तार सामान्य हो जाएगी।

नोटबंदी के तरीके को इसमें असामान्य बताया गया है। मौद्रिक प्रभाव के लिहाज से यह असामान्य रही है। इसमें कहा गया है-नोटबंदी में एक तरह की मुद्रा-नकदी की आपूर्ति में भारी कमी आ गई। जबकि दूसरी तरफ मांग जमा (बैंक जमा) के रूप में इतनी ही मुद्रा में वृद्धि हो गई। ऐसा इसलिए हुआ कि जिस मुद्रा को बंद किया गया उसे बैंकों में जमा कराने के लिए कहा गया। बहरहाल, समीक्षा में नोटबंदी के प्रभाव को कम करने के लिए प्रोत्साहन उपायों पर जोर दिया गया है। इसमें कहा गया है-विमुद्रीकरण एक ताकतवर डंडे के समान था। जिसके उपहार स्वरूप अब कुछ प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। इसके लिए पांच सूत्री रणनीति का उल्लेख किया गया है। इसमें वस्तु एवं सेवाकर (जीएसटी) को व्यापक कवरेज के साथ अमल में लाने पर जोर दिया गया है। इसमें कहा गया है कि ऐसे क्षेत्र जहां कालेधन का सृजन होता है उन्हें इसके दायरे में लाया जाना चाहिए। इस मामले में भूमि और दूसरी अचल संपत्तियों का विशेषतौर पर जिक्र किया गया है।

समीक्षा में कहा गया है कि नोटबंदी से अल्पकाल में लागत भुगतनी पड़ी है, लेकिन इसमें दीर्घकालिक लाभ की संभावनाएं छुपी हैं। इसके असर को कम करने और फायदा बढ़ाने के लिए मांग आधारित मौद्रीकरण, भूमि और रीयल एस्टेट क्षेत्र को जीएसटी के दायरे में लाकर सुधारों को बढ़ाना होगा। व्यक्तिगत आयकर दर और भू-संपत्ति के मामले में स्टांप शुल्क को कम करने व कंपनी कर में कटौती के लिए निश्चित कार्यक्रम घोषित करने को कहा गया है। कर प्रशासन को बेहतर बनाने, विसंगति दूर करने और जवाबदेही में सुधार पर जोर दिया गया है। समीक्षा कहती है कि कच्चे तेल के दाम 60-65 डालर प्रति बैरल तक पहुंच जाने की स्थिति में देश में खपत कम हो सकती है, सार्वजनिक निवेश घट सकता है और कंपनियों के मार्जिन में कमी आ सकती है। अंतत: निजी निवेश पर इसका प्रभाव पड़ सकता है। ऊंचे तेल मूल्यों से मुद्रास्फीति बढ़ने की सूरत में मौद्रिक नीति को उदार बनाने की गुंजाइश भी कम हो सकती है।

 

 

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