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स्‍टंट भी हो सकता है ‘पद्मावती’ पर विवाद: कहानी कुछ भी हो, पर इतिहास से खिलवाड़ तो कर ही रहे हैं संजय लीला भंसाली

सोचने वाली बात यह भी है कि अगर फिल्म में रणवीर और दीपिका नाचेंगे या गाएंगे नहीं तो फिल्म कैसे हिट होगी? फिल्म कैसे मसालेदार बनेगी?
पद्मिनी महल चितौड़गढ़ किले में ही जल के बीच में है। यह रानी पद्मावती के सौंदर्य, साहस और शान की कहानी बताता है।

हाल ही में फिल्म पद्मावती की शूटिंग के दौरान फिल्म निर्माता संजय लीला भंसाली के साथ हुई बदसलूकी की खबर पूरे देश में चर्चा का विषय बनी। करणी सेना का आरोप है कि फिल्म में इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश किया जा रहा है। इस बात को लेकर कई जगह विरोध के स्वर फूटे हैं। विवाद अभी भी कायम है। इस बीच मुझे राजस्थान का गौरव कहा जाने वाला शहर चितौड़गढ़ जाने का मौका मिला। वहां का पद्मिनी महल भी मैंने देखा जो जल के बीच में है। यह महल चितौड़गढ़ किले में ही है। यह रानी पद्मावती के साहस और शान की कहानी बताता है। महल के पास सुंदर कमल का तालाब है। ऐसा माना जाता है कि यही वह स्थान है जहां सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने रानी पद्मावती के प्रतिबिम्ब की झलक देखी थी। रानी के शास्वत सौंदर्य से अलाउद्दीन खिलजी मोहित हो गया और रानी को पाने की इच्छा की वजह से अंततः अंजाम युद्ध तक जा पहुंचा। युद्ध 28 जनवरी 1303 को हुआ था जिसमें दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी को 26 अगस्त को किले पर फतह हासिल हुई थी।

मलिक मोहम्मद जायसी की रचना “पद्मावत” के मुताबिक राजा रावल रत्न सिंह वीरगति को प्राप्त हुए थे। रानी पद्मावती ने और रानियों के साथ जौहर किया था। बाद में अलाउद्दीन ने चितौड़गढ़ किले को अपने बेटे सिवज्र खाँ को दे दिया था। इस दुर्ग में सात रथ मार्ग और सात दरवाजे हैं। अंदर काली मां का मंदिर है। हरेक काली मां की प्रतिमा जीभ निकली दिखी। चितौड़गढ़ किले में ही अद्भुत माँ काली के दर्शन का सौभाग्य मिला। जहां माता की जीभ नहीं निकली है। शाम आरती में शरीक हुए। यह किला अरावली पर्वतमाला के एक विशाल शिखर पर बना है जहां जाने का रास्ता अत्यंत सुगम है।

रात में चित्तौड़गढ़ शहर का एक नजारा।

यहां जौहर का मतलब बताना जरूरी है। मध्य युग में राजपूत स्त्रियों की एक प्रथा थी जिसमें गढ़ या नगर के दुश्मनों से घिर जाने और अपने पक्ष की हार हो जाने पर वे एक साथ इस उद्देश्य से जलती चिता में कूद पड़ती थीं कि दुश्मन उनका अपमान या अत्याचार न कर पाए। संजय लीला भंसाली इसे अपनी फिल्म में पद्मावती और अलाउद्दीन की प्रेम कहानी के रूप में फिल्माना चाहते थे। शायद विरोध इसी बात का करणी सेना या किसी राजपूत समुदाय का हुआ। मगर विरोध हिंसक नहीं होना चाहिए। यह ठीक नहीं। हालांकि, इतिहास के पन्नों में यह कहीं से भी प्रेम कहानी नहीं है। इससे सहमत कतई नहीं हुआ जा सकता। वरना पद्मावती को जौहर होने को विवश क्यों होना पड़ता?

Padmavati issue, Sanjay leela bhansali संजय लीला भंसाली हाथ में लगी चोट दिखाते (दाएं) और फिल्म के सेट पर तोड़फोड़ करते करणी सेना के लोग।

पुस्तकों, कहानियों में भी अलाउद्दीन खिलजी की क्रूरता, काम पिपासा और पद्मिनी के जौहर की कथा पढ़ी है। उसमें कभी कल्पना में भी यह सीन नहीं उभरा और न ही सोचा कि कभी कोई फिल्मकार ऐसा द्दश्य फिल्माएगा जिसमें अलाउद्दीन खिलजी और पद्मिनी सपनों में ही सही एक-दूसरे से प्रेम करते मिलेंगे। मतलब वासना, काम पिपासा की क्रूरता की ऐतिहासिक दास्तां एक प्रेम कहानी बनेगी। पता नहीं फिल्म की स्क्रिप्ट किस-किस ने देखी या पढ़ी, जो इतना बबेला खड़ा हुआ। जाहिर है स्क्रिप्ट पढ़ कर ही हकीकत मालूम हो सकती है कि अलाउद्दीन खिलजी और पद्मावती को भंसाली किस तरह दिखला रहे हैं? बावजूद, इसके यह मोटी समझ तो बनती है कि फिल्म हीरो-हिरोइन केंद्रित है। फिल्म में अलाउद्दीन खिलजी जहां रणवीर सिंह बने हैं वहीं दीपिका पादुकोण पद्मिनी यानी पद्मावती। लिहाजा, माना जा सकता है कि यह फिल्म वीर रस, शौर्य, बलिदान वाली तो नहीं ही होगी। न ही रणवीर को भंसाली बतौर अलाउद्दीन काम पिपासु, खलनायक, क्रूर, बलात्कारी दिखा रहे होंगे। पहले जैसा हुआ है और होता रहा है उससे सर्वविदित है कि बॉलीवुड के फिल्मकार एक मसाला, मनभावक, भव्य लव स्टोरी वाली फिल्म बनाने के लिए इतिहास की कहानियों के तथ्यों का इस्तेमाल करते हैं। इतिहास के तथ्य फिल्म के कथानक बनते रहे हैं। ऐसे में भला भंसाली नायक-नायिका को क्यों न प्रेमालाप में दिखाएं? चाहे अलाउद्दीन खिलजी की वासना, काम पिपासा उसके सपने में प्रेम के रूप में ही झलके।

हंगामा होने के बाद संजय लीला भंसाली ने कहा कि अलाउद्दीन खिलजी और रानी पद्मावती के रिश्तों में सपनों का कोई सिक्वेंस और आपत्तिजनक सीन नहीं फिल्माया गया है। बावजूद इसके यह तो अपने आप में कमाल की बात है कि स्क्रिप्ट अलाउद्दीन खिलजी और पद्मावती पर आधारित है जिसे रणवीर-दीपिका की जोड़ी में ढाला गया है। अब सोचने वाली बात यह भी है कि अगर फिल्म में रणवीर और दीपिका नाचेंगे या गाएंगे नहीं तो फिल्म कैसे हिट होगी? फिल्म कैसे मसालेदार बनेगी? यानी जब तक अलाउद्दीन खिलजी और पद्मावती नहीं नाचेंगे तब तक न तो मल्टीप्लेक्सों में मनोरंजक शोर-शराबा होगा और न ही बॉक्स ऑफिस पर कलेक्शन होगा। लिहाजा, रणवीर-दीपिका की जोड़ी यानी खिलजी-पद्मावती को नाचते-गाते दिखाना संजय लीला भंसाली के लिए जितना जरूरी है, उतना ही बॉलीवुड और बॉलीवुड के सिनेप्रेमियों के लिए भी है।

अब भंसाली कह रहे हैं कि वे फिल्म ऐसी बना रहे हैं जिसे देख मेवाड़ के लोग अपनी रानी की याद में गौरवान्वित होंगे। उस नाते तब एक शक यह भी बनता है कि भंसाली ने कहीं झूठा हल्ला करवा कर अपनी फिल्म के प्रचार के लिए तो यह हथकंडेबाजी नहीं की? बॉलीवुड के फिल्मकार प्रचार के लिए कुछ भी कर सकते हैं, यह आम धारणा है। बहरहाल, जो हो चित्तौड़गढ़ का किला, रानी पद्मावती का जौहर और अलाउद्दीन खिलजी की चितौड़ किले पर चढ़ाई और उसमें बाल योद्धाओं के शौर्य के तथ्य और मध्यकाल के हिंदूओं की इतिहासजन्य गौरवपूर्ण दास्तां है। चितौड़ के किले का कण-कण उसकी जीवंत याद लिए हुए है। उसे रोमांस, नायक-नायिका के प्रेम मायनों में दर्शाना न केवल इतिहास को तोड़ना-मरोड़ना होगा बल्कि कौम की दृष्टि से वह खिलवाड़ भी होगा। चितौड़गढ़ आज भी मेवाड़ की शान है जिसे बार-बार देखने का दिल करता है। तभी तो सैलानियों का तांता यहां सालभर लगा रहता है। चितौड़गढ़ किले के अंदर और आसपास कोई घोड़े पर तो कोई ऊंट पर बैठ अपनी फोटो खिंचवाने में शान महसूस करता है।

चित्तौड़गढ़ किले में घोड़ा पर सवार होकर फोटो खिंचाती सैलानी।

वीडियो देखिए- संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘पद्मावती’ को लेकर विरोध प्रदर्शन जारी; फिल्म के नाम को बदलने की मांग

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  1. K
    Kapil Gautam
    Feb 13, 2017 at 6:23 pm
    मुझे तो राजपूतों ने ठोका , गैरों में कहाँ दम था ।मेने भी इतिहास उनका छेड़ा ; जिनके बाजुओं में दम था । बिन लाइट , बिन कैमरे ; ऐसे चली शूटिंग ; सर पे जूते ; पीछे लाते ..खाते हुवे ; शूट हुवे कई सीन आगे आगे भं ; पीछे करणी सेना भं की कलम से...
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    1. R
      raj kumar
      Feb 14, 2017 at 5:04 am
      औरंगजेब अब्दाली और खिलजी ऐसे चरित्र रहे हैं जिनके जिक्र भर से दिलो दिमाग गुस्से से भर जाता है फिल्मकारों को ऐसे चरित्रों को बॉलीवुड स्टाइल में फिल्म बनाने से बचना चाहिए था, दूसरा इस देश में हिन्दू परम्पराओं का आस्थाओं का लगभग मजाक बनाने और उनपर सरे पंथ निरपेछता के नियम लागु करने की कोशिश होती है वही माा अगर मुसलमानो का आ जाता है तो सारे नियम पंथ निरपेछता हवा हो जाती है कश्मीरी पंडित की वापसी और तस्लीमा नसरीन का हिंदुओं के लिए लिखना और उस पर मचे बवाल पर मुह सी लेना क्या दिखाता है
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