May 25, 2017

ताज़ा खबर

 

Blog: जब तक होती रहेगी रट्टा मार पढ़ाई तब तक रहेगा भारत में नोबेल का टोटा

कोलंबिया के राष्ट्रपति ह्वान मानुएल सांतोस को शांति का नोबल पुरस्कार दिए जाने की घोषणा की गई है।

ब्रिटेन के तीन वैज्ञानिकों को भौतिक शास्त्र में टोपोलॉजी विषय पर खोज के लिए नोबल पुरस्कार दिया गया (PHOTO: nobelprize.org)

डॉ. शुभ्रता मिश्रा

अक्टूबर का प्रथम सप्ताह 2016 के नोबेल पुरस्कारों की घोषणाओं में बीता है। चिकित्सा का जापानी जीव वैज्ञानिक योशिनरी ओशुमी, भौतिकी का ब्रिटेन के तीन वैज्ञानिकों डेविड थॉलेस, डंकटन हैल्डेन और माइकल कोस्तरलित्ज, रसायन विज्ञान का फ्रांस के ज्यां-पियरे सोवेज, ब्रिटेन के जे फ्रैसर स्टाडर्ट और नीदरलैंड के बर्नार्ड फेरिंगा को और कोलंबिया के राष्ट्रपति ह्वान मानुएल सांतोस को शांति का नोबल पुरस्कार दिए जाने की घोषणाओं के साथ इस बार के नोबल पुरस्कारों के नाम लोगों के सामने उनके अपने विशिष्ट वैज्ञानिक एवम् शांतिस्थापना हेतु किए जाने वाले मौलिक कार्यों के साथ प्रकट हुए हैं। अर्थशास्त्र और साहित्य के नोबेल पुरस्कारों की घोषणा अगले सप्ताह होगी। जब भी नोबल पुरस्कारों की घोषणाएं होती हैं, तो कहीं न कहीं टीस सी उठ जाती है, कि हम भारतीय विरले ही क्यों इन नामों में आ पाते हैं।

हमारे यहाँ सामान्यज्ञान के प्रश्नपत्रों के लिए तैयार उत्तरों में भारतीय नागरिकता वाले नोबेल पुरस्कार विजेताओं में रबीन्द्रनाथ ठाकुर, चन्द्रशेखर वेङ्कट रमण, मदर टेरेसा, अमर्त्य सेन और कैलाश सत्यार्थी और भारतीय मूल के नोबेल पुरस्कार विजेताओं में हरगोविन्द खुराना, सुब्रह्मण्यन् चन्द्रशेखर और वेंकटरमण रामकृष्णन के नाम कण्ठस्थ कर लिए जाते हैं। ये जो हमारे अंदर कण्ठस्थ कर लेने का दुर्लभ गुण है, इसने हमारी मौलिक प्रवृत्ति को उभरने से बुरी तरह निषिद्ध किया है। कण्ठस्थ कौशल के कारण हम भौतिक, रसायन और जीवविज्ञान को बरसों से किताबों में पढ़ते आ रहे हैं और पश्चिम में खोजे अविष्कारों को दोहराते आ रहे हैं। इसी बल पर हम अंतरिक्ष में अमेरिका जैसे देशों की बराबरी भी कर लेते हैं, लेकिन अंतरिक्षविज्ञान में प्रयुक्त होने वाले भौतिकशास्त्र की मौलिकता पर कभी ध्यान नहीं दे पाते। हम नोबल विजेताओं के मौलिक अनुसंधानों को आगे बढ़ाकर बेहद निपुण व पारंगत होने का परिचय देते हुए चिकित्सा के क्षेत्र में शल्यता की सफलता के दाँतों तले उंगली दबाने वाले कारनामे भी कर डालते हैं और उनकी मौलिक भौतिकी और रसायन के प्रयोग अपनी तकनीकियों में बड़ी ही निपुणता के साथ प्रयुक्त कर लेते हैं। पर कहीं न कहीं हम उस मौलिक विज्ञान तक नहीं पहुंच पा रहे हैं, जो भारत को विज्ञान का नोबल दिला सके।

वीडियो: रिलायंस जियो का सिम ऐसे खरीदें-

Read Also: जापान के ओहसुमी को नोबेल चिकित्सा पुरस्कार, कोशिकाओं के ‘रीसाइकल’ के लिए मिला सम्मान

नोबल पुरस्कारों में मौलिकता ही सबसे बड़ा केंद्र होती है, जो साहित्य में यदि टैगोर में थी, तो निःसंदेह शांति में टेरेसा और सत्यार्थी में भी थी। विज्ञान में चंद्रशेखर वेंटकरमन जब प्रकाश के आणविक विकिरण और प्रकीर्णन पर अपनी मौलिक वैज्ञानिकता विश्व के समक्ष रखते हैं तो 1930 का भौतिकी का नोबेल पुरस्कार भारत को मिल जाता है, लेकिन उसके बाद फिर वही कण्ठस्थता सी.वी. रमन की बदौलत भारत को विक्रम साराभाई, होमी जहांगीर भाभा और के.आर. रामनाथन जैसे महान वैज्ञानिक तो दे देती है, परन्तु मौलिकता फिर कहीं छूट जाती है। लेकिन फिर भारतीय मूल के सुब्रह्मण्यन् चन्द्रशेखर जब ब्लैक होल के बनने के लिए अपनी मौलिक वैज्ञानिक अवधारणा देकर व्हाइट ड्वार्फ तारे के एक निश्चित द्रव्यमान और वृद्धि न कर पाने का तर्क देकर नोबेल सोसायटी को संतुष्ट करते हैं, तो फिर एक बार भौतिकी के क्षेत्र में वर्ष 1983 का नोबेल पुरस्कार डॉ॰ विलियम फाऊलर के साथ संयुक्त रूप से चन्द्रशेखर के नाम पर भारत को मिल जाता है।

Read Also: मूर्खों की मदद करता और आतंकी गतिविधियों को बढ़ाता है Internet: नोबेल पुरस्कार विजेता

नोबेल पुरस्कारों में विश्व के कुछ चंद संस्थान, उनके वैज्ञानिक दल और उनके वैज्ञानिक वंशज बड़ी ही वैज्ञानिक साधना के साथ मौलिकता की परम्पराओं को आगे बढ़ाते जाते हैं, तभी तो मेडम क्यूरी का परिवार विश्व का एक मात्र ऐसा परिवार बनने का गौरव हासिल करता है, जिसके सभी सदस्यों को नोबल पुरस्कार प्राप्त हुआ है। भारत की शिक्षाप्रणाली ने पाठ्यक्रमों में विज्ञान के विषयों की पढ़ाई में मौलिकता को जैसे स्थान ही नहीं दे रखा है, जो भी पढ़ा जाता है और प्रयोग किया जाता है, वो सिर्फ और सिर्फ दोहराने और आगे बढ़ाने के अलावा और कुछ नहीं होता है। उत्तीर्णता और पात्रता की बाध्यताओं एवम् उत्कृष्ट वैज्ञानिक सुविधाओं के अभावों, और कहीं न कहीं प्रशासकीय अंतर्वेधनाओं ने भी भारतीय वैज्ञानिकों को मौलिकता का जोखिम लेने से निषिद्ध सा कर रखा है। कितने ही भारतीय वैज्ञानिक संस्थान या तो उनके संस्थापकों के अवसान के साथ स्वयं भी निस्तेज होते चले जाते हैं या फिर विषय विशेषज्ञों के बाद उनकी वैज्ञानिक साधना को आगे ले जाने वाले तक नहीं होते हैं। ऐसा नहीं है कि हमारे वैज्ञानिकों में अब कोई प्रकाश प्रकीर्णन और ब्लेकहोल जैसे नवीन वैज्ञानिक तथ्यों को खोज निकालने की सामर्थ्य न हो, परन्तु हमारी सामाजिक व राजनीतिक प्रक्रियाओं ने जहां हमसे शून्य, कणाद और गुरुत्व की प्रथम मौलिक व्याख्या के प्रमाण छीन लिए, वहीं विषय की कण्ठस्थता और शिक्षाप्रणाली मौलिकता में बाधक बनकर हर साल नोबेल भी छीने जा रही है। इस ओर गम्भीरता से सोचने की महती आवश्यकता है।

Read Also: दुनिया की सबसे छोटी मशीनें बनाने वाले तीन वैज्ञानिकों को मिला केमिस्‍ट्री का नोबेल पुरस्‍कार

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

First Published on October 7, 2016 6:56 pm

  1. No Comments.

सबरंग