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ब्लॉगः …ताकत हम हैं

निया का नौवां हिस्सा जिस भाषा को बोलता हो, और सातवां हिस्सा जिस लिपि का इस्तेमाल करता हो, उसके अस्तित्व का डर अवास्तविक है। हिंदी की सबसे बड़ी शक्ति है वैश्विक स्तर पर हिंदी भाषियों का संख्या बल।
Author November 5, 2016 01:41 am

बालेंदु शर्मा दाधीच
दुनिया का नौवां हिस्सा जिस भाषा को बोलता हो, और सातवां हिस्सा जिस लिपि का इस्तेमाल करता हो, उसके अस्तित्व का डर अवास्तविक है। हिंदी की सबसे बड़ी शक्ति है वैश्विक स्तर पर हिंदी भाषियों का संख्या बल। हम हिंदी भाषी दुनिया का सबसे तेजी से बढ़ता बाजार हैं। ऐसे समय पर, जबकि अमेरिका से लेकर चीन तक किसी न किसी तरह की मंदी के प्रभाव में हैं, एक बाजार के रूप में भारत के उदय की प्रक्रिया जारी है। भारतीयों की लगातार बेहतर होती क्रय शक्ति पर सबकी निगाहें हैं। सन 2000 में भारतीयों की जो प्रति व्यक्ति सालाना आय 16,688 रुपए थी वह आज 93,293 रुपए पर आ गई है। यानी हर भारतीय नागरिक औसतन करीब एक लाख रुपए सालाना कमा रहा है। इसका असर कारोबार के कई क्षेत्रों में दिख रहा है, लेकिन तकनीक खास तौर पर ध्यान खींचती है। क्या आपने इस बात पर ध्यान दिया है कि जिस समय भारत में आर्थिक उदारीकरण, वैश्वीकरण और सुधारों का दौर शुरू हुआ लगभग तभी से दूरसंचार और सूचना तकनीकें हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाओं को ताकत देने में जुटी हैं। दिलचस्प रूप से इस प्रक्रिया का दारोमदार ज्यादातर बहुराष्टÑीय कंपनियों के हाथों में है – खासकर माइक्रोसॉफ्ट, गूगल, फेसबुक के हाथ में।

 
आज स्मार्टफोन के रूप में हर हाथ में एक तकनीकी डिवाइस मौजूद है और हर तकनीकी डिवाइस में हमारी भाषा। एंड्रोइड, आइओएस, विंडोज या ब्लैकबेरी आॅपरेटिंग सिस्टमों में हिंदी में संदेश भेजना, हिंदी की सामग्री को पढ़ना, सुनना या देखना लगभग उतना ही आसान है जितना अंग्रेजी की सामग्री को। हालांकि कंप्यूटरों पर भी हिंदी का व्यापक प्रयोग हो रहा है और इंटरनेट पर भी, लेकिन मोबाइल ने हिंदी के प्रयोग को अचानक जो गति दे दी है, उसकी कल्पना अभी पांच साल पहले तक भी किसी ने नहीं की थी।
97 करोड़ भारतीय टेलीफोन उपभोक्ताओं में से 42 करोड़ गांवों के उपभोक्ता हैं। उनके लिए अंग्रेजीदां दिखना उतना जरूरी नहीं जितना अपनी बात को ढंग से कह पाना। इसका असर सामने है। फेसबुक और वाट्सऐप जैसे सोशल मीडिया माध्यमों पर भारतीय भाषाएं तेजी से पांव पसार रही हैं। हिंदी में एसएमएस, चैट और पोस्ट करना आम बात है। अगर देवनागरी में नहीं लिख पाते तो रोमन ही सही, लेकिन बहुत बड़ी संख्या में संदेश हिंदी में भेजे जा रहे हैं। इंटरनेट पर भारतीय भाषाओं की सामग्री की वृद्धि दर प्रभावशाली है। अंग्रेजी के 19 फीसद सालाना के मुकाबले हमारी भाषाओं की सामग्री 90 फीसद की रफ्तार से बढ़ रही है। इस सामग्री का कोई तो उपभोग कर रहा होगा? कौन हैं वे लोग? हम भारतीय ही ना, हम हिंदी भाषी और भारतीय भाषा-भाषी ही ना? क्या यह वृद्धि दर आने वाले वर्षों की तस्वीर स्पष्ट नहीं कर देती?
आइएमएआइ और आइएमआरबी का ताजा अध्ययन बताता है कि 30 करोड़ से ज्यादा भारतीय इंटरनेट उपभोक्ताओं में से 12.7 करोड़ भारतीय भाषाओं में इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहे हैं। नासकॉम की ताजा रिपोर्ट कहती है कि सन 2020 तक ग्रामीण इंटरनेट उपभोक्ताओं की संख्या 73 करोड़ हो जाएगी। इनमें से ज्यादातर भारतीय भाषाओं में काम करने वाले उपभोक्ता होंगे। क्या आप समझते हैं कि बहुराष्टÑीय कंपनियां इतने बड़े बाजार को हाथ से जाने देंगी? याद रखिए, इन कंपनियों के लिए अंग्रेजी कोई वरीयता नहीं है, वरीयता है कारोबार।
हिंदी की आर्थिक-सामाजिक-सांस्कृतिक शक्ति लाजवाब है। स्टार प्लस की मिसाल लीजिए जो 90 के दशक में एक अंग्रेजी टेलीविजन चैनल हुआ करता था। जब उसने प्रयोग के तौर पर इक्का-दुक्का हिंदी कार्यक्रम शुरू किए तो वही हिट हो गए। टीआरपी और विज्ञापनों में अंग्रेजी के कार्यक्रम पिछड़ गए। चैनल को हिंदी की ताकत समझ में आ गई और थोड़ा-थोड़ा करते-करते उसने अपना रंगरूप पूरी तरह बदलकर हिंदुस्तानी कर लिया और भाषा सौ फीसद हिंदी। आज वह सबसे कमाऊ टीवी चैनल है।
विज्ञापनों की भाषा क्या अनायास ही बदली है? यह कैसे अंग्रेजी से क्रमिक ढंग से बदलते हुए हिंदी तक आ पहुंची है, वह शोधार्थियों की दिलचस्पी का विषय है- ‘ठंडा मतलब कोका कोला’, ‘यही है राइट चॉइस बेबी’ (पेप्सी), ‘दाग अच्छे हैं’ (सर्फ), ‘टेस्ट भी, हेल्थ भी’ (मैगी) और ‘थोड़ी सी पेट पूजा’ (पर्क चॉकलेट)..। मैकडोनाल्ड्स और केएफसी को अपने भोजन का भारतीयकरण करना पड़ा है क्योंकि वे हमारे अनुरूप बदलने पर मजबूर हैं। यही बात भाषा पर लागू होती है। बाजार में खरीदार की चलती है। मांग कर तो देखिए।
माना कि कुछ लोग अंग्रेजी की ओर झुक रहे हैं। नई दक्षताएं प्राप्त करना सबका हक है। ऐसे एकाध फीसद नागरिकों से कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता क्योंकि जिस तरह हिंदी से अंग्रेजी की तरफ संक्रमण की एक धारा बह रही है, उसी तरह भारतीय भाषाओं और बोलियों से एक धारा हिंदी की तरफ भी आ रही है। वह यूं ही थोड़े संपर्क भाषा बन गई है। पब्लिक लैंग्वेज सर्वे आॅफ इंडिया के ताजा सर्वेक्षण के आंकड़े बताते हैं कि वृद्धि की मौजूदा रफ्तार से हिंदी 50 साल में अंग्रेजी को पीछे छोड़ देगी। यहां पीछे छोड़ना अप्रासंगिक है। अहम यह है कि हिंदी आगे बढ़ रही है।

हिंदी की भाषायी सामर्थ्य, समृद्धि, विविधता, विस्तार, जीवंतता, वैज्ञानिकता आदि में आस्था रखिए। माना कि अंग्रेजी में अब दस लाख शब्द हो गए हैं। समग्र हिंदी भाषा परिवार में भी इतने शब्द होंगे। ग्लोबल लैंग्वेज मॉनीटर के अनुसार फ्रेंच में लगभग एक लाख, स्पैनिश में सवा दो लाख और रूसी में सवा लाख शब्द बताए जाते हैं। क्या हिंदी उनसे कम है? श्रेष्ठतम लिपि, सुपरिभाषित व्याकरण, समृद्ध साहित्यिक परंपरा.. सब कुछ तो है। यदि शब्दावली में कहीं कोई कमी है तो वह हमारी वजह से है, भाषा की सीमा के कारण नहीं। यदि तकनीक, विधि, चिकित्सा, विज्ञान, वाणिज्य आदि में उन्नत श्रेणी की पढ़ाई हिंदी के जरिए नहीं हो रही तो वह हमारी कमजोरी है। इसमें भाषा का क्या गुनाह है? विदेशी खतरे को भूल जाइए। वहां फिर भी हिंदी का सम्मान है। दर्जनों विदेशी विश्वविद्यालय हिंदी पढ़ाते हैं। संयुक्त राष्टÑ महासचिव बान की मून हिंदी में बोलते हैं तो गूगल के चेयरमैन एरिक श्मिट को यह कहने में संकोच नहीं होता कि इंटरनेट की दुनिया में भविष्य हिंदी और मंदारिन का है। समस्या बाहरी कम, भीतरी अधिक है। विदेशी हिंदी प्रेमी तो इस बात से परेशान रहते हैं कि जब वे भारत में हिंदी बोलते हैं तो जवाब अंग्रेजी में क्यों दिए जाते हैं? शायद हमें अपनी भाषा की शक्ति का अंदाजा नहीं। उसके प्रति आत्मविश्वास नहीं है। हिंदी को रोमन लिपि में लिखने जैसी मांगें हमीं उठाते हैं, विदेशी तो नहीं।

बेहतर हो, हम हिंदी के महत्त्व, उसके दमखम को समझें। उसके विकास की चुनौतियों के समाधान खोजें। देखें कि क्या हम भी किसी तरह उसके विकास में हाथ बंटा सकते हैं? नए शब्द गढ़कर, विविध क्षेत्रों की शब्दावली का हिंदीकरण करके, ग्रंथों, पाठ्यपुस्तकों के अनुवाद करके, हिंदी पढ़ाकर, साहित्य रचकर, सॉफ्टवेयर-वेबसाइट बनाकर, दफ्तर में हिंदी का इस्तेमाल करके, हिंदी बोलकर, ब्लॉग बनाकर, फेसबुक पर हिंदी में लिखकर, वाट्सऐप पर हिंदी संदेश भेजकर, किताबें रचकर, जानकारियां बांटकर, हिंदी उत्पाद खरीदकर और जरूरत पड़ने पर अपनी भाषा के लिए आवाज उठाकर भी। सकारात्मकता ही हिंदी को हमारी ताकत बनाएगी और हमें हिंदी की।
(लेखक माइक्रोसॉफ्ट में भारतीय भाषाओं के प्रभारी (लोकलाइजेशन लीड) के पद पर कार्यरत तकनीकविद हैं)।

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  1. प्रखर श्रीवास्तव
    Nov 5, 2016 at 5:14 am
    बदहाल भारतीय भाषाए आज हमारी राजभाषा को जो हाल है उसके लिए जिम्मेदार भारत की राजनीति व् यहाँ की सरकार की प्रशाषनिक अव्यवस्था है जो राजभाषा ित भारतीय भाषाओ को हाशिये पर ला खड़ा कर दिया है मैं इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में हिंदी से एम् ए कर रहा हूं जहाँ हिंदी के साथ साथ आठ भारतीय भाषाओ को पढ़ाने का नियम है पर १९९६ से कोई नई नियुक्ति न होने के कारण आज हिंदी विभाग में ४२ शिछको में सिर्फ ९ शिछक बचे है जिसमे से ५ शिछक २०१८ में सेवनिवित्त हो जाएंगे।
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  2. प्रखर श्रीवास्तव
    Nov 5, 2016 at 5:17 am
    भारतीय भाषाओ पर निकला लेख हमे बेहद अच्छा लगा इसके पहुँच सरकार तक होनी चाहिए
    Reply
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