December 03, 2016

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करण जौहर के नाम खुला पत्र- दुख है कि आपने अपनी अभिव्यक्ति की आजादी को गिरवी रख दिया

इससे भी ज्यादा दुख की बात ये है कि गांधी, नेहरू, लोहिया और जेपी की इस धरती पर बहुत कम लोग बोलने की हिम्मत दिखा पा रहे हैं।

फिल्‍म निर्माता-निर्देशक करण जौहर।

प्रिय करण जौहर,

आप मुझे नहीं जानते। फौरी परिचय के तौर पर आपको बताना चाहूंगा कि मैं वही व्यक्ति हूं जिसने कई महीने पहले लिखा था, “आमिर खान पर राजद्रोह का मामला दर्ज करने से पहले उज्जल दोसांज को राष्ट्रद्रोह के लिए फांसी दो।”  मैंने वो लेख आमिर खान पर किए जा रहे हमलों के जवाब में लिखा था। आमिर की केवल इतनी गलती थी कि उन्होंने उस समय देश में पनप रहे धार्मिक उन्माद के प्रति अपनी पत्नी की चिंता को सार्वजनिक रूप से जाहिर कर दिया था। आज वो धार्मिक उन्माद एक चक्रवात सरीखा बन चुका है।

मैं 1964 से ही देश से बाहर हूं। जब मैंने देश छोड़ा तब मैं कमोबेश वंचित परिवेश में पला बढ़ा एक 18 साल का नौजवान था। मैंने भारत छोड़ दिया और बाद के सालों में कनाडा का नागरिक बन गया। मैंने अपना “घर चलाने के लिए” कानून का पेशा चुना। उम्मीद है आप इस बात को समझेंगे कि मेरी बात में कोई धार्मिक अंतर्ध्वनि नहीं है। इसका केवल इतना मतलब है कि हर माता-पिता की जिम्मेदारी है कि वो अपने बच्चो के पेट भरने के लिए आहार (शाकाहारी या मांसाहारी) की व्यवस्था करें।

वीडियो: फिल्म निर्देशक करण जौहर ने तोड़ी चुप्पी-

इसलिए मैं समझ सकता हूं कि आपने अपनी फिल्म को बगैर किसी हिंसा के रिलीज कराने के लिए शैतानी धार्मिक उन्माद के साथ समझौता क्यों कर लिया। मैं समझ सकता हूं कि आपको उन्मादी ठगों द्वारा सिनेमाहाल जलाए जाने और पाकिस्तानी आतंकवादियों के प्रति उपजे गुस्से का शिकार भारती दर्शकों के बनने की चिंता रही होगी। पाकिस्तानी आतंकवाद को वहां की आतंकी सेना की सरपरस्ती हासिल है। पाकिस्तान एक ऐसा देश है जिसे एक अवैध शरीफ सरकार चला रही है।

हम और आप दोनों जानते हैं कि पाकिस्तानी मदरसे और पाकिस्तानी सेना हजारों धार्मिक उन्मादी पैदा करने का कारोबार चला रहे हैं जिनका मकसद सऊदी के पैसे पर पल रहे वहाबी इस्लाम आतंक के नाम पर ‘काफिर’ भारत पर हमला करना है। भारत अभी तक वहाबी आतंक के जहर से काफी हद्द तक बचा रहा है। इससे अप्रत्याशित सैन्य या सांस्कृतिक झटकों को बरदाश्त करने की भारत की अतुलनीय क्षमता का पता चलता है। हमारा इतिहास हमें यही सीख देता है।

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एक अप्रवासी भारतीय होने के नाते मैंने उरी हमले के बाद की गई भारत की सर्जिकल स्ट्राइक का समर्थन किया था। लेकिन मुझे उम्मीद है कि आप भी मेरी तरह जानते होंगे कि भारतीयों की तरह बहुत से पाकिस्तानी भी दोनों देशों की सीमाओं पर शांति चाहते हैं। अगर “ऐ दिल है मुश्किल” में काम करने वाले पाकिस्तानी कलाकार भारत के खिलाफ नफरत फैलाने वाले धार्मिक उन्मादी होते या भारत से नफरत करने वाली सेना और उनके द्वारा प्रशिक्षित आतंकवादियों का उन्हें डर होता तो आपको फिल्म में काम करने का साहस नहीं करते। आपको उनकी हिम्मत की तारीफ करनी चाहिए।

वीडियो: गायक अभिजीत ने करण जौहर पर लगाया आरोप-

मैं आपको अपने निजी अनुभव से बता सकता हूं कि धार्मिक उन्माद के चक्रवात का सामना करना आसान नहीं है। बहुत साल पहले कनाडा में खालिस्तानियों का विरोध करने के कारण मुझे असीमित गाली-गलौज और सिर पर लोहे की रॉड से हमला झेलना पड़ा था। मेरे सिर पर पड़ने वाली रॉड की हर चोट से उनसे लड़ने का मेरा इरादा और मजबूत होता गया था। मेरे अंदर का भारतीय और ‘अभिव्यक्ति की आजादी का प्रेमी’ यही सोचता रहा कि “उनकी हिम्मत कैसी हुई?”

मैं आपसे बताना चाहूंगा कि मैं आपकी उन तमाम आर्थिक मजबूरियों को समझता हूं जिनकी वजह से आपको कहना पड़ा कि आप भविष्य में कभी पाकिस्तानी कलाकारों को अपनी फिल्मों में नहीं लेंगे। अपनी फिल्मों को भारतीय सिनेमाघरों में रिलीज करवाने के लिए आपने अपनी और मेरी आजादी को भारतीय राष्ट्रवाद के स्वघोषित झंडाबरदार एनएनएस के कुछ गुंडो और उन्मादियों के आगे गिरवी रख दिया। और आप तो जानते ही हैं कि राष्ट्रवाद अक्सर दुष्टों का आखिरी ढाल होता है।

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मुझे इस बात का दुख है कि आपने अपनी अभिव्यक्ति की आजादी को गिरवी रख दिया। मुझे यकीन है कि आपको प्रसिद्ध प्रोटेस्टैंट पैस्टोर और एडोल्फ हिटलर के विरोधी मार्टिन निमोलर के शब्द याद होंगे। यहां मैं उन्हें आपको और हम सबको याद दिलाने के लिए दे रहा हूं-

पहले वो साम्यवादियों के लिए आए, लेकिन मैं चुप रहा

क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था

फिर वो ट्रेड यूनियनवालों के लिए आए, लेकिन मैं चुप रहा

क्योंकि मैं ट्रेड यूनियनवाला नहीं था

फिर वो यहूदियों के लिए आए, लेकिन मैं चुप रहा

क्योंकि मैं यहूदी नहीं था

फिर वो मेरे लिए आए- और तब तक कोई नहीं बचा था

जो मेरे लिए आवाज उठा सके

मैं दुखी हूं कि आपने अंधकार और निरकुंशता की ताकत के आगे हथियार डाल दिए लेकिन इससे भी ज्यादा दुख की बात ये है कि गांधी, नेहरू, लोहिया और जेपी की इस धरती पर बहुत कम लोग बोलने की हिम्मत दिखा पा रहे हैं।

(ये लेखक के निजी विचार हैं। संस्थान की इनसे सहमति आवश्यक नहीं है।)

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First Published on October 19, 2016 5:19 pm

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