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तीरंदाजः श्रेष्ठता के दंभ में भटकता समाज

सर्वोत्तम श्रेष्ठ आज भी हमारे लिए एक लक्ष्य हो सकता है, पर उसके लिए भूमि तैयार करनी होगी। आर्थिक उन्नति उसकी पहली सीढ़ी है। संपन्नता के बिना किसी भी सृजन की कल्पना नहीं की जा सकती। गरीबी बुद्धि को पंगु कर देती है। पिछले दो हजार सालों से हम इसके चंगुल में हैं। कुछ नया सोच नहीं पा रहे। कुछ नया कर नहीं पा रहे हैं।
प्रतीकात्मक तस्वीर

‘‘सर्वोत्तम श्रेष्ठता हासिल की जा चुकी है।’’ गुप्तकालीन जूनागढ़ शिलालेख पूरे आत्मविश्वास से घोषणा करता है। घोषणा में थोड़ी अतिशयोक्ति जरूर है, पर वह तथ्यों से परे नहीं है। गुप्त साम्राज्य वास्तव में भारत के इतिहास का स्वर्णिम अध्याय है। यह लगभग डेढ़ सौ साल चला, पर इसका प्रभाव एक हजार साल रहा और इस दौरान कला से लेकर साहित्य तक, कृषि से लेकर वाणिज्य तक अभूतपूर्व तरक्की हुई। दुनिया के हर कोने में- रोम से लेकर दक्षिण पूर्व एशिया तक- गुप्त साम्राज्य का बोलबाला था। स्कंध गुप्त के राज्य काल में लिखे गए शिलालेख के पीछे उस समय के तेज का प्रताप है। खुशहाली हर तरफ व्याप्त थी। कृषि के नए तरीके प्रचलित हो चुके थे और गांव देहातों में खाद्यान्न से गोदाम भरे हुए थे। इसका मतलब था कि राजस्व भरपूर मिल रहा था। नए इलाके जुताई-बुआई के लिए इस्तेमाल किए जा रहे थे और तरह-तरह की फसलें बोई और काटी जा रही थीं। दूसरी तरफ आंतरिक व्यापार फल-फूल रहा था। इस व्यापार की वजह से भारतीय व्यापारी समुद्र पार के देशों में अपना सिक्का जमाए हुए थे। देश वास्तव में सोने की चिड़िया था।

आर्थिक उन्नति गुप्तकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि थी। उसी के जरिए भारत के इतिहास में शायद पहली बार बड़े स्तर पर शहरीकरण हुआ और समृद्ध शहरी वर्ग का विकास हुआ। इस वर्ग को रोज की दाल रोटी की चिंता नहीं थी और इसलिए उसका ध्यान साहित्य और कला तथा अन्य बौद्धिक चेष्टाओं की ओर लग गया। राजाओं ने, सेठों और साहूकारों ने कलाकारों और बुद्धिजीवियों को खुल कर प्रोत्साहन दिया। देश बदल रहा था, तेजी से बदल रहा था और गुप्तकालीन राजाओं ने वे सब नीतियां अपनार्इं, जिनसे एक तरफ तो आम मेहनतकश का जीवन सरल और खुशहाल हो तो दूसरी तरफ नई सोच पूरी तरह पनपे। गुप्तकाल के दैरान और उसके आगे-पीछे हिंदुस्तान के सबसे अच्छे वैज्ञानिक, चिंतक, कवि और लेखक हुए। कालिदास एक नाम है, आर्यभट्ट दूसरा, अश्वघोष तीसरा। क्लासिकल भारत में गुप्तकाल के दौरान बौद्ध धर्म प्रचलित था। हम लोग अक्सर ऐसा मानते हैं कि उस समय हिंदू वैष्णव धर्म का प्रभाव था, पर वास्तव में ऐसा नहीं था। बौद्ध धर्म के उदार भाव, तर्कसंगत विचार और शहरीकरण की वजह से सृजन को नई दिशा और स्फूर्ति मिली। हिंदू सोच संस्कृत साहित्य तक सीमित रह गई थी। इसमें भी अश्वघोष, जो बौद्ध थे, सबसे बड़े विद्वान थे। इस एक हजार साल के दौर में हिंदुओं की उपलब्धि बौद्धों की तुलना में कम रही थी, पर देश के स्फूर्ति भरे माहौल की वजह से वे मानने लगे थे कि जो भी ज्ञान हो सकता है, वह उन्होंने अर्जित कर लिया है और अब कुछ करने की जरूरत ही नहीं है।

ब्राह्मणवादी समाज का अटूट विश्वास था कि वेद ही ज्ञान का प्रथम और अंतिम स्रोत है। मैत्री उपनिषद में घोषणा की गई कि जो वेदों में लिखा गया है वही एकमात्र सत्य है। रूढ़िवादी वेदवादी समाज हर नए विचार को हिकारत की नजर से देखने लगा और हालात ऐसे हो गए की वेदों का मतलब हर वह ग्रंथ हो गया, जो अतीत में रचा गया था, चाहे उसका धर्म से कोई मतलब हो या न हो। तथाकथित परंपरा सर्वमान्य हो गई। जो भी इस पर असहमति व्यक्त करता था, उसको अधर्मी घोषित कर दिया जाने लगा। आर्यभट्ट को भी इसका सामना करना पड़ा था, जब उन्होंने ग्रहण के कारणों की वैज्ञानिक विवेचना की और राहु-केतु की कहानी को कपोल कल्पना बताया।

भारत के स्वर्णकाल में विचारों से लेकर बाहरी लोगों की आवजाही तक पर कोई रोकटोक नहीं थी। सबका स्वागत था और लोग खुद दूसरी संस्कृति से परहेज नहीं करते थे। जहाजी बेड़े लेकर वे हर दिशा में निकलते थे और कुछ सीख कर ही आते थे। पर धीरे-धीरे दरवाजे बंद होने लगे, क्योंकि हिंदुस्तानियों को अहंकार हो गया कि वे सब कुछ जानते हैं और किसी और से संपर्क से वे प्रदूषित हो जाएंगे। अपनी महानता के भ्रम को हम सदियों से पाले हुए हैं। ग्यारहवीं शताब्दी में अल बरूनी जब हिंदुस्तान आए तो उन्होंने लिखा: ‘‘हिंदू मानते हैं कि उनके देश जैसा कोई देश नहीं है, उनके राजा जैसा कोई नहीं है, उनके धर्म जैसा कोई धर्म नहीं है और उनके पास हर क्षेत्र में जो ज्ञान है, वह अतुल्य है। हिंदू मूढ़ और घमंडी हैं।’’
वास्तव में किसी भी समाज और संस्कृति के पतन का कारण उसकी बंद सोच है। जब जनमानस अपने आप में ही लीन हो जाता है, अपने को ही स्वंभू मानने लगता है और अहंकार से ग्रस्त हो जाता है तो उसके नायक भी इन सबका प्रतिनिधित्व करने लगते हैं। यह आत्मविश्वास के नाम का खोटा सिक्का चल तो निकलता है, पर इससे सृजन स्रोत नहीं फूटते।
सर्वोत्तम श्रेष्ठ आज भी हमारे लिए एक लक्ष्य हो सकता है, पर उसके लिए भूमि तैयार करनी होगी। आर्थिक उन्नति उसकी पहली सीढ़ी है। संपन्नता के बिना किसी भी सृजन की कल्पना नहीं की जा सकती। गरीबी बुद्धि को पंगु कर देती है। पिछले दो हजार सालों से हम इसके चंगुल में हैं। कुछ नया सोच नहीं पा रहे। कुछ नया कर नहीं पा रहे हैं। अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में, कला के क्षेत्र में, व्यवस्था के मामले में, विज्ञान के क्षेत्र में हम बस औरों की नकल मात्र कर उसको विकास का नाम दे रहे हैं। मन और दिमाग बंद से हो गए हैं। फिर से अतीत को खंगालना चाहते हैं। पुरातत्त्व से नवनिर्माण करना चाहते हैं। पर क्या ऐसा प्रयास सार्थक होगा?

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  1. A
    AMRIT RAJ
    Dec 4, 2016 at 1:08 pm
    अश्विनी भटनागर जी,बन्द समाज और खुला समाज के बीच आपका लेख अतीत से वर्तमान तक झरोखा दर्शन कराया। बेहतरीन और समकालीन लेख है और मुझे पढ़ने के बाद अच्छा लगा। श्रेष्ठ समाज का निर्माण के साथ - साथ समावेशी और रचनात्मक समाज का निर्माण की जिम्मेदारी हम सबों पर है। अतीत का गुणगान तब होता जान वर्तमान ख़राब हो जाये। अहंकार जीवन का दुश्मन है वही स्वाभिमान एक विशेषता। यह लेख एक नया नजरिया प्रदान करता है।
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    सबरंग