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एक थप्पड़ से फिल्म इंडस्ट्री को मिला शोमैन

नई पीढ़ी के लिए केदार शर्मा वह फिल्मकार हंै जिन्होंने एक ओर रणवीर कपूर के दादाजी राज कपूर को परदे पर उतारा तो दूसरी ओर ऋत्विक रोशन के दादाजी संगीतकार रोशन को बतौर संगीतकार अपनी फिल्म में मौका दिया।
Author April 28, 2017 02:10 am
शर्मा सिर्फ निर्देशक ही नहीं थे बल्कि पटकथा-संवाद लेखक, गीतकार, गायक और अभिनेता भी थे। गीतकार के रूप में ‘बालम आय बसो मोरे मन में…’ जैसे कई मशहूर गाने लिखे तो निर्देशक के रूप में ‘चित्रलेखा’ (1941), ‘नीलकमल’ (1947), ‘सुहागरात’ (1948), ‘बाबरे नैन’ (1949), ‘जोगन’ (1950), ‘हमारी याद आएगी’ (1961) जैसी कई मशहूर फिल्में बनाई। कल, 29 अप्रैल, 2017 को केदार शर्मा 18 वीं पुण्यतिथि पर वह मशहूर किस्सा, जिसने राज कपूर को एक क्लैपर बॉय से हीरो बना दिया था।

गणेश नंदन तिवारी
नई पीढ़ी के लिए केदार शर्मा वह फिल्मकार हंै जिन्होंने एक ओर रणवीर कपूर के दादाजी राज कपूर को परदे पर उतारा तो दूसरी ओर ऋत्विक रोशन के दादाजी संगीतकार रोशन को बतौर संगीतकार अपनी फिल्म में मौका दिया। पुरानी पीढ़ी के लिए केदार शर्मा बारीक आवाज वाले ऐसे प्रतिभाशाली निर्देशक थे जिनका एक थप्पड़ खाकर राज कपूर स्टारडम के रास्ते पर चल पड़े, तो एक थप्पड़ खाकर तनुजा को समझ आया कि अभिनय एक गंभीर काम है। यह सिनेमा की ही ताकत थी कि कलकत्ता में 1933 में बनी देबकी बोस की ‘पूरनभगत’ देखकर पंजाब के एक युवक ने तय कर लिया कि वह सिनेमा की दुनिया में जाएगा, देबकी बोस से मिलेगा। दर्शनशास्त्र, फोटोग्राफी, चित्रकला और कविता में दिलचस्पी रखने और अंग्रेजी में एमए करने वाला यह युवक पंजाब से पहुंच गया कलकत्ता। खूब जूते घिसने के बाद दो पंजाबी, पृथ्वीराज कपूर और केएल सहगल, उससे टकराए। देबकी बोस से भी मुलाकात हुई जिन्होंने उसे स्टिल फोटोग्राफी का काम सौंप दिया। कलकत्ता में पांच सालों में युवक ने अभिनेता, गीतकार, गायक, लेखक के रूप में छिटपुट काम किया और 1939 में ‘दिल ही तो है’ से डायरेक्टर बन गया। 1941 में ‘चित्रलेखा’ की कामयाबी ने युवक, केदार शर्मा, की शोहरत दूर दूर तक पहुंचा दी। रणजीत मूवीटोन के सेठ चंदूलाल शाह ने उसे मुंबई बुला लिया। मुंबई में शर्मा अपने पुराने मित्र पृथ्वीराज कपूर से वापस मिल गए। दोनों के बीच पुरानी मित्रता फिर कायम हो गई।

पृथ्वीराज कपूर का नीली आंखों वाला बेटा राज कपूर अक्सर शर्माजी से पूछता था कि आखिर परदे पर ये परछाइयां कैसे हिलती हैं? शर्मा ने कहा कि बड़े हो जाओ, कुछ पढ़ो लिखो, फिर मेरे चेले बन जाना। उसके बाद सब समझ जाओगे। 1942 में शर्मा पृथ्वीराज कपूर को लेकर ‘गौरी’ बना रहे थे। इसी दौरान कपूर ने कहा कि उनका बेटा राज कपूर बिगड़ रहा है, जिसे लेकर वह चिंतित है। शर्मा ने कहा कि वे शिक्षक रहे हैं लिहाजा राज कपूर को उनके हवाले कर दिया जाए। वे सब ठीक कर देंगे। एक अच्छा सा दिन देखकर राज कपूर ने केदार शर्मा को गंडा बांधा और उनके शिष्य बन गए। राज कपूर को शर्मा ने अपनी तीसरा असिस्टेंट बना लिया। काम दिया शॉट से पहले क्लैप देने का। राज कपूर क्लैप देने से पहले अपने बालों में कंघी करते थे और कैमरे की ओर ऐसे देखते थे मानो वह खुद ही फिल्म में काम कर रहे हों। केदार शर्मा उनके रंग ढंग देख रहे थे। एक दिन घोडबंदर पर फिल्म की शूटिंग थी। सूरज डूबने जा रहा था और केदार शर्मा राज कपूर को बता चुके थे कि वे अपने बालों में कंघी का चक्कर छोड़ें वरना देर होने पर सूरज डूब जाएगा और उन्हें जरा से काम के लिए वापस 30-35 किलोमीटर आना पड़ेगा।

मगर हिदायत काम नहीं आई। राज कपूर का बालों में कंघी करना जारी था। शॉट के दौरान कैमरे के सामने खड़े कलाकार ने नकली दाढ़ी लगा रखी थी। जब क्लैप देने का मौका आया तो बेखयाली में क्लैप दे रहे राज कपूर के क्लैप में कलाकार की नकली दाढ़ी फंस गई। गुस्साए केदार शर्मा ने राज कपूर को थप्पड़ रसीद कर दिया। राज कपूर पर हाथ उठाने के बाद शर्मा को लगा कि उन्हें इतनी सख्त प्रतिक्रिया नहीं देनी थी और बार बार बालों में कंघी करने वाले राज कपूर में दरअसल कैमरे के सामने आने की छुपी चाहत है। अगले दिन उन्होंने राज कपूर को अपने दफ्तर आने के लिए कहा।  कपूर ने घबरा कर कहा कि वे नहीं आएंगे वरना उनकी फिर से पिटाई होगी। शर्मा ने उन्हें समझा बुझा कर बुलाया। एक मोटी रकम का चेक उनके सामने रखा और कहा कि वे उनकी बतौर निर्माता पहली फिल्म ‘नीलकमल’ के हीरो होंगे। राज कपूर से उनकी पसंद की हीरोइन का नाम पूछा। राज के कहने पर उन्होंने मधुबाला को उनकी हीरोइन बना दिया। बाद में यही राज कपूर मुंबई फिल्म इंडस्ट्री के शोमैन बने।

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