March 27, 2017

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बेबाक बोलः नामाबाद से नामपुर तक

सियासत की भट्ठी में अपनी राजनीति की रोटियां सेंकने वालों के लिए गुलजार का गीत ‘नाम गुम जाएगा’ बेमानी है।

शेक्सपियर और गुलजार को झुठलाते हुए नाम ने अपना दम दिखा दिया है। राष्टÑवाद को जब एक ब्रांड की तरह पेश किया गया तो इतिहास की स्लेट पर विचारधारा का डस्टर चलाना जरूरी था। राष्टÑवाद को ध्यान में रख रेस कोर्स रोड लोक कल्याण मार्ग हुआ। इसके पहले हरियाणा सरकार सरस्वती नदी के उद्गम स्थल के पास बसे गांव मुस्तफाबाद का नाम बदल कर सरस्वती नगर और गुड़गांव को गुरुग्राम कर चुकी है। इलाहाबाद को सायास प्रयागराज लिखना और बोलना शुरू कर दिया गया है। शहरों, बस्तियों और मोहल्लों के नाम में ‘बाद’ को बेदखल कर ‘पुरम्’ पर जोर है। नाम में क्या रखा है, यह सवाल पहचान की राजनीति में बचकाना है। तो नाम के बढ़ते इकराम पर पढ़ें इस बार का बेबाक बोल।

सियासत की भट्ठी में अपनी राजनीति की रोटियां सेंकने वालों के लिए गुलजार का गीत ‘नाम गुम जाएगा’ बेमानी है। भाजपा की अगुआई वाली राजग सरकार ने सत्ता में आते ही राष्टÑवाद और देशभक्ति को एक ब्रांड की तरह पेश किया। और इस ब्रांड को चमकाने के लिए पहला हथियार तो नाम ही थे। यही कारण है कि रेसकोर्स रोड लोक कल्याण मार्ग और औरंगजेब रोड एपीजे अब्दुल कलाम रोड हो गया। एक ब्रांड बन चुके गुड़गांव का नाम जब हरियाणा की खट्टर सरकार बदल कर ‘गुरुग्राम’ कर देती है तो इसका संकेत साफ है। एक ब्रांड ही तो नए ब्रांड को आगे ले जाएगा।
इसके पहले भी कलकत्ता कोलकाता, बंबई मुंबई और मद्रास चेन्नई हुआ है। कहीं यह भाषा के नाम पर, कहीं अस्मिता तो कहीं धर्म के नाम पर। और, अब इन सब पर साझा मुलम्मा चढ़ा है राष्टÑवाद का।
हरियाणा और पंजाब की साझा राजधानी चंडीगढ़ से सटे पंजाब के कस्बे मोहाली का नाम भी अकाली सरकार ने साहिबजादा अजीतसिंह नगर और रोपड़ का रूपनगर कर दिया था। महाभारत के अहम किरदार गुरु द्रोणाचार्य को ध्यान में रख कर गुड़गांव को ‘गुरुग्राम’ किया गया। माना जा रहा है कि ऐसा राष्टÑीय स्वयंसेवक संघ के एजंडे के तहत किया जा रहा है। नाम बदलना कोई नई बात नहीं। लेकिन इससे पहले यह प्रक्रिया योजनाओं और परियोजनाओं के नाम तक ही महदूद थी। लेकिन केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुआई में बनी हिंदुत्त्ववादी सरकार में उसका आधार धर्म या धर्म से करीबी नाम रख कर ही यह बदलाव किया गया।
महाभारत से हरियाणा का करीबी नाता रहा है और प्रदेश के हर कोने में इस महाकाव्य के साथ जुड़ी किंवदंतियों की भरमार है। कहीं ऐसा न हो कि ‘गुरुग्राम’ इसकी शुरुआत हो और फिर आगे प्रदेश में ‘कुंती नगर’ या ‘गीता प्रदेश’ पर भी गौर किया जाए।
प्राचीनकाल से गंगा, यमुना और सरस्वती को पवित्र माना जाता है। मान्यता है कि इनमें से सरस्वती का उद्गम हरियाणा से ही हुआ है। यमुना तो हरियाणा से गुजर कर ही दिल्ली में दाखिल होती है। प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा के समय में भी सरस्वती के उद्गमस्थल से इसके बहाव की धारा पहचान करने के प्रयास होते रहे और कुरुक्षेत्र तक तो इसके निशान ढूंढ़ने का भी दावा किया गया। लेकिन किसी सरकार ने कभी भी इस दिशा में उतनी उत्सुकता से काम नहीं किया, जितना मौजूदा भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने किया। सरकार ने न सिर्फ इसके शोध का बजट बढ़ाया, बल्कि जहां से उद्गम माना गया है, वहां के गांव मुस्तफाबाद का नाम बदल कर भी सरस्वती नगर कर दिया। यह गांव सरस्वती के उद्गम स्थल आदि बद्री के निकट जिला यमुनानगर में स्थित है।
नाम परिवर्तन का सियासी खेल हर सरकार और काल में होता रहा है। हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री और इंडियन नेशनल लोकदल के प्रमुख ओमप्रकाश चौटाला ने भी 2005 के चुनाव से पहले गुड़गांव से सटे मेवात को जिला बना दिया था। इस नामकरण के साथ नजर थी मेवात में रहने वाले मेव समुदाय के लोगों के वोटों पर। अपनी कुशाग्र बुद्धि के लिए मशहूर चौटाला ने मेवात का नाम बदल कर ‘सत्यमेवपुरम’ कर दिया था। सत्यमेव में ‘मेव’ भी समाहित था, इसलिए। दीगर है कि लोगों ने तब सत्ता के नशे में चूर चौटाला को करारी हार का मुंह दिखाया। लेकिन मौजूदा सरकार ने मेवात का नाम बदल कर नूह कर दिया जो पहले उसका जिला मुख्यालय था।

लेकिन सवाल है कि स्थानीय लोगों के वोटों पर नजर रखते वक्त गुड़गांव की अंतरराष्टÑीय छवि का ध्यान रखा गया था क्या? यह सवाल इसलिए अहम है कि गुड़गांव वह शहर है, जिसके कारण हरियाणा की अंतरराष्टÑीय स्तर पर पहचान है। एक के बाद एक बहुराष्टÑीय कंपनी का देश में विदेशी मुद्रा निवेश के पहले चरण में ही गुड़गांव में आ जाने के कारण इसने हरियाणा में अंतरराष्टÑीय मानचित्र पर अपनी पहचान बनाई। दिल्ली से नजदीकी भी गुड़गांव की खासियत थी। निवेश की अपार संभावनाओं को देखते हुए ही चौटाला ने गुड़गांव में उद्योगों को लाने के लिए पूरी दुनिया का चक्कर लगा लिया। यह रिवायत कांग्रेस के दो कार्यकाल के मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा ने भी जारी रखी और उसी को आगे बढ़ाते हुए खट्टर भी अपने शुरुआती विदेशी दौरे कर चुके हैं और प्रदेश की सरकार चीन के वांडा ग्रुप के साथ अपने एमओयू का ढिंढोरा पीट चुकी है।

गुड़गांव की तरक्की की राह अस्सी के दशक में यहां पर मारुति सुजुकी की कंपनी से हुई थी जो इक्कीसवीं सदी में इतनी रफ्तार पकड़ गई कि इस समय फोर्ब्स कंपनी की भारतीय सूची की 500 कंपनियों में से 50 फीसद कंपनियों की यहां मौजूदगी है। यहां पर सूचना प्रौद्योगिकी की कंपनियों की तो 2000 के बाद जैसे बाढ़ ही आ गई थी। गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, इंटेल, आइबीएम कोई नाम जेहन में आए और उसका दफ्तर गुड़गांव में न हो, यह हो ही नहीं सकता। अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, दक्षिण कोरिया, कनाडा, स्वीडन, फ्रांस, आस्ट्रेलिया, संयुक्त अरब अमीरात और जर्मनी जैसे देशों की कंपनियों के यहां आलीशान दफ्तर हैं। सरकारी दावों पर भरोसा करें तो गुड़गांव में 50 हजार करोड़ से भी ज्यादा का विदेशी निवेश है। यहां पर फैली कंपनियों के जाल के सदके ही गुड़गांव की प्रति व्यक्ति आमदनी देश भर में तीसरे स्थान पर है।

राज्य के नौकरशाहों की तैनाती के लिए पहली पसंद गुड़गांव ही रहता है। यह माना जाता है कि इस शहर की निस्बत ही राज्य के नगर और योजना विभाग के खजाने भर गए। यहीं पर सीएलयू हासिल करने की होड़ लगी। यहां पर अपना घर बसाने या कंपनी खड़ी करने या फिर सरकार की मेहरबानी से फार्म हाउस बनाने वालों की सूची में कई महान विभूतियों के नाम दर्ज हैं। यहां की जमीन तो कांग्रेस प्रमुख सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा की भी पहली पसंद थी। बदकिस्मती की यहां के ही एक जमीन सौदे और सीएलयू के सिलसिले में वे न्यायिक जांच के घेरे में हैं। तो राष्टÑवाद के ब्रांड को आगे बढ़ाने के लिए ब्रांड गुड़गांव के साथ खिलवाड़ किया गया। इससे सरकार की गुड़गांव को लेकर प्राथमिकता समझ आती है। आधुनिक शहर के रूप में गुड़गांव की छवि खराब करने वाले मुद्दे सरकारी गलियारों में अपना हल तलाश रहे हैं। गुड़गांव में भ्रष्टाचार अपनी चरम सीमा पर है। सीएलयू और इनके एवज में कथित तौर पर दी जाने वाली भारी-भरकम रिश्वत के लिए यह शहर कुख्यात है। शहर का आंतरिक ढांचा पूरी तरह चरमरा चुका है। सड़कें बदहाल हैं, यातायात व्यवस्था पंगु। यहां का पुलिसिया निजाम आपसी लड़ाई और सर्वोच्चता की होड़ के लिए सुर्खियां बटोर चुका है। बलात्कार, वाहन चोरी, हिंसा, श्रम विवाद और शोषण की घटनाएं आम हैं। हाल ही में मूसलधार बारिश न झेल पाने के कारण इसकी वैश्विक स्तर पर किरकिरी हुई। इन सबसे निपटने के बजाए सरकार ने इसका नाम बदल डाला। इसे संघ को खुश करने की कवायद माना गया।

कांग्रेस के प्रमुख प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला कहते हैं कि ग्राम शब्द हरियाणा की संस्कृति, इतिहास और बोली का हिस्सा नहीं है। ऐसा करके प्रदेश का अपमान किया गया है। गुड़गांव सहित अन्य जगहों के नामकरण को लेकर सोशल मीडिया पर सरकार को व्यंग्यबाणों का सामना करना पड़ा। लेकिन इन विरोधों के परे सरकार के संचालक मुदित हैं और हिंदू मन खुश। क्योंकि उन्हें पता है कि इतिहास की स्लेट पर लिखी इबारत पर अपनी विचारधारा का डस्टर चला कर वे अपना इतिहास बना रहे हैं।
बहरहाल, बात इस विरोधाभास पर भी हो कि शहर का नाम गुरुग्राम और यहां की इमारतों के आगे पाम ड्राइव, पाम स्प्रिंग, पाम वैली, ल लयून, कासा विला, द प्लेयर वेलिंगटन के नाम खुदे हैं। बच्चे ‘गुरुग्राम’ को गुडगाम बोलते हुए उन अंग्रेजी स्कूलों में जा रहे हैं जहां हिंदी बोलने पर अघोषित पाबंदी है। घरों में ऐसे खाने बन रहे हैं जिनका सही उच्चारण करने के लिए आपको विशेषज्ञों की सलाह लेनी पड़ती है। और इन सबके बीच ‘गुरुग्राम’। राष्टÑवाद और बाजार की जुगलबंदी से नाम का इकराम कितना बढ़ेगा यह तो राम जाने!

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First Published on October 15, 2016 2:22 am

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