December 10, 2016

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बेबाक बोल- गमेगंगा, बहती गंगा

दो लफ्जी मंत्र से देश की सत्ता पर प्रचंड बहुमत से काबिज हुई सरकार के ‘शाह’ ने जब ‘अच्छे दिन’ को ही जुमलेबाजी बता दिया तो लगा जैसे कि किसी बन रही इमारत की बुनियाद ढह गई हो।

‘इतिहास की पुकार, करे हुंकार, ओ गंगा की धार, निर्बल जन को, सबल संग्रामी गमग्रोग्रामी, बनाती नहीं हो क्यूं? नि:शब्द सदा ओ गंगा तुम बहती हो क्यूं’…शरद पूर्णिमा के बाद शीत ऋतु के संधिकाल में सिकुड़ते चांद की चांदनी रात में हरकी पैड़ी किनारे भूपेन हजारिका का गीत लहरों के साथ कानों में टकराता है। दिवाली की फिजा में रंग-रोगन, सफाई और चीन के बहिष्कार के नारों और उफनती ‘मन की बात’ के बीच मैली होती गंगा मौन है। जिस नदी की धार हमारे जीवन का विस्तार है उसकी सफाई के नारे भी चुनावी जुमले न करार दिए जाएं। दीपोत्सव पर शुभकामनाओं के साथ आम जन के सबसे बड़े धन नि:शब्द गंगा पर कुछ बात।

दो लफ्जी मंत्र से देश की सत्ता पर प्रचंड बहुमत से काबिज हुई सरकार के ‘शाह’ ने जब ‘अच्छे दिन’ को ही जुमलेबाजी बता दिया तो लगा जैसे कि किसी बन रही इमारत की बुनियाद ढह गई हो। अमित शाह ने तो इसे चुनावी जुमला समझ कर भूल जाने की सलाह दी और अच्छे दिनों के मलबे में दबे नितिन गडकरी ने इसे गले की हड्डी बताया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब वाराणसी को अपना चुनाव क्षेत्र बना कर कहा कि ‘वाराणसी मुझे गंगा मैया ने बुलाया है’ तो लगा कि बरसों से अस्थि विसर्जन, उत्तर प्रदेश के चमड़ा शोधन संयंत्र (टेनरी) और वाराणसी समेत कई शहरों के जल-मल और औद्योगिक उत्सर्जन का दंश झेल रही गंगा का कल्याण अब दूर नहीं है। सरकार का आधा कार्यकाल पूरा हो चुका है, लेकिन ऐसा लगता नहीं कि आने वाले ढाई साल में कोई ऐसा करिश्मा होगा कि गंगा साफ हो जाए। हां, एक नया जुमला चाहे आ जाए, ‘गंगा मइया ने फिर से बुलाया है’ के नारे की शक्ल में!
यह भी हो सकता है कि हिंदुत्ववादी सरकार पुराणों का हवाला देते हुए कहे कि भगवान शिव की जटा से धरती पर प्रवाहित हुई गंगा मैया ने सदियों से जो गंदगी झेली है, उसके लिए पांच वर्ष अपर्याप्त हंै… और समय चाहिए… कम से कम पांच वर्ष और… फिर विरोधी तो सरकार के अभियान पर पानी फेर ही सकते हैं… ‘भाइयो जितनी गंदगी हमने साफ की, ये कांग्रेस वाले उससे दोगुनी डाल गए। लेकिन इस बार एक मौका और। ऐसा इंतजाम होगा कि विरोधियों को गंगा के पास भी फटकने न देंगे’..। ऐसे बोलों की संभावना है। देश के आम लोगों में गंगा को लेकर आस्था का सवाल है। यह नदी उनके जीवन विस्तार के साथ मरने के बाद हिंदुओं के मोक्ष का द्वार भी मानी जाती है। उनकी आस्था को बदलने का दमखम शायद ही किसी सरकार में हो। काश, गंगा की सफाई में पहला चरण उसे नियमित करने का होता। विडंबना है कि उस दिशा में एक भी कदम नहीं उठाया गया।


गंगा के सभी घाट दिन-रात श्रद्धालुओं से भरे रहते हैं। लेकिन इन्हें संरक्षित करने का कम से कम सरकार का तो कोई प्रयास दिखाई नहीं देता। रही बात गंगा की सफाई की तो पिछली सरकारों और मौजूदा सरकार में एक बुनियादी फर्क साफ है कि यह सरकार हर घोषणा ढोल-नगाड़ों के साथ करती है। पुरजोर प्रचार और ‘आकाशवाणी’ से ‘मन की बात’ करने का रिकॉर्ड तो है ही। ‘नमामि गंगे’ भी अपवाद नहीं। पूरे देश की जनता को ऐसा आभास दिया गया, जैसे इस सरकार से पहले कभी किसी ने गंगा की सफाई की दिशा में कोई कदम उठाया ही न हो। राजनीति विज्ञान के सिद्धांतकार मानते हैं कि जम्हूरियत में अवाम की याददाश्त छोटी होती है। मौजूदा सरकार को अवाम की इस खूबी का खासा इल्म है। खास कर सरकार के शीर्ष नेताओं में यह खूबी कूट-कूट कर भरी है। जो थोड़े से वाजिब-जुबान होना चाहते हैं उनके लबों पर पट्टियां बंधी हैं।
आस्थावान सरकार के लिए इस दिशा में कोई कार्य थोड़ा नहीं, बहुत दुर्गम है कि वह गंगा के प्रति लोगों की श्रद्धा और आस्था के रास्ते में रुकावट खड़ी कर सके। गंगा के प्रदूषण के लिए ब्रितानी हुकूमत से लेकर आजाद हिंद की वह हर सरकार दोषी है जिसने सीवर और औद्योगिक उत्सर्जन के निपटारे जैसी बुनियादी व्यवस्था पर भी ध्यान नहीं दिया। राजीव गांधी से लेकर मनमोहन सिंह और वर्तमान राजग सरकार वाराणसी और गंगा को महज वोट बैंक समझते रहे। सफाई के नाम पर कागजों में करोड़ों बहते रहे और जमीन पर गंगा और मैली होती चली गई।
यहां बात करें मौजूदा सरकार की तो इसके नुमाइंदों को हर बात पंचम सुर में गा-गा कर कहने की आदत है। वरना, गंगा को लेकर मदन मोहन मालवीय सौ वर्ष पहले ही ब्रितानी हुकुमत से टकरा चुके थे। हरिद्वार में गंगा सभा का गठन किया था जो आज भी अपने स्तर पर गंगा की सफाई के अभियान में जुटी है। सौ बरस पहले ब्रितानी हुकूमत ने भीमगोडा बांध का निर्माण शुरू करवाया तो महामना ने उसके खिलाफ अभियान छेड़ दिया। उनका कहना था कि गंगा की धारा अविरल ही रहनी चाहिए, तभी उसकी धार्मिक महत्ता अखंड रहेगी। गंगा को स्वच्छ रखने के नजरिए से उन्होंने गंगा सभा का गठन किया। इस संगठन के मौजूदा अध्यक्ष गांधीवादी पुरुषोत्तम शर्मा का कहना है कि यहां सफाई के नाम पर व्यावहारिक रूप से कुछ हुआ हो, यह तो दिखता नहीं। कागजों में सरकार जो करे। यह संगठन तब से अब तक बिना किसी सरकारी मदद के चलता है। हालांकि यह संगठन लोगों की गंगा के प्रति आस्था और आस्थावानों का प्रयास ही है।
सरकारी कागजों को खंगालें तो यह साफ है कि गंगा की सफाई के प्रति ‘आधुनिक चिंता’ 1986 में हुई। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने ‘गंगा एक्शन प्लान’ नाम से गंगा की स्वच्छता की दिशा में शुरुआत की। यह एक संयोग हो सकता है कि राजीव गांधी ने भी यह घोषणा वाराणसी के घाट से ही की और अपना ध्यान चमड़ा शोधन संयंत्रों और सीवरेज पर ही रखा जो गंगा में प्रदूषण के बड़े जिम्मेदार हैं। सरकार ने तब एक के बाद एक जल-मल शोधन संयंत्र स्थापित किए। लेकिन बढ़ते उद्योगों और बढ़ती जनसंख्या की मार ऐसी रही कि समांतर प्रयास कुछ खास मदद नहीं कर पाए।
पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव ने भी अपने कार्यकाल में गंगा की सफाई के लिए कई प्रयास किए। उसके बाद फिर से एक ठोस प्रयास पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल में हुआ, जब गंगा रिवर बेसिन प्राधिकरण का गठन किया गया। यह जिम्मा केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय को दिया गया। उसके बाद मोदी का सितारा जब देश के क्षितिज पर बुलंद हुआ तो उन्होंने भी गंगा सफाई अभियान का बीड़ा उठाया। मोदी का अभी तक यह बड़ा योगदान है कि इसके लिए मंत्रालय में अलग विभाग ही बना दिया, जिसकी कमान साध्वी उमा भारती के सुपुर्द की गई है। एक भारी-भरकम बजट भी इसके लिए तय किया गया। इस पर योजनाएं बनाने में हो सकता है खर्च हो रहा हो, लेकिन व्यावहारिक तौर पर अभी कुछ खास नजर नहीं आया है।
सरकार ने इस अभियान के पहले चरण यानी 2014-15 में इसके लिए 2137 करोड़ रुपए का बजट तय किया। हालांकि बाद में इसमें से 84 करोड़ रुपए कम करके इसे 2053 करोड़ कर दिया गया। इस पर हैरान ही हुआ जा सकता है कि इतने तामझाम से जो अभियान छेड़ा गया, उसमें से पहले वर्ष महज 326 करोड़ ही खर्च हुए, जबकि बाकी का करीब 1700 करोड़ यों ही पड़ा रहा। सरकार की इस खासमखास परियोजना का हाल यह है कि 2015-16 में इसके लिए 2750 करोड़ के प्रस्ताव को 1650 करोड़ कर दिया गया। इसे पूरा खर्च नहीं किया जा सका।
मौजूदा बजट भी तकरीबन 2500 करोड़ से ज्यादा का ही है। लेकिन इतने भारी भरकम बजट के बावजूद मौके पर देखें तो सब कुछ पहले जैसा ही नजर आता है। ‘हर की पैड़ी’ पर वैसी ही अव्यवस्था है। वाराणसी, इलाहाबाद के घाटों की भी ऐसी ही हालत है। हालांकि यह तय है कि जब तक यहां वैकल्पिक व्यवस्था नहीं होगी तब तक अस्थि विसर्जन और स्नान से होने वाले प्रदूषण पर काबू पाना नामुमकिन-सा है। इसके दूसरे चरण में औद्योगिक कचरा और फिर सीवर-तंत्र से जुड़ी समस्याओं को उठाया जा सकता है।
और हां, सरकार के साथ गंगा हर एक आम हिंदुस्तानी की भी जिम्मेदारी है। इस दिवाली हमने चीनी उत्पादों के खिलाफ तो बहुत अभियान छेड़ लिया। लेकिन इस त्योहारी मौसम में अपनी जीवनदायिनी नदियों का खयाल रखा क्या? हमारे घर और मंदिर में जो आस्था के प्रतीक हैं, नदियों में प्रवाहित होने के बाद वैज्ञानिक भाषा में उसे प्रदूषण कहा जाता है। तो गंगा जैसी नदियों को बचाने के लिए क्या हम अपनी आस्था को प्रदूषण नहीं बनने देने का संकल्प ले सकते हैं?

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First Published on October 29, 2016 2:01 am

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