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बेबाक बोलः पौधशाला- अंक-शास्त्र

मई 2014 में उत्तर प्रदेश के अंक-शास्त्र ने देश की गद्दी नरेंद्र मोदी को सौंप दी। वहीं 2017 के अंक-शास्त्र ने उत्तर प्रदेश की मशाल मोदी को सौंपी और मोदी ने उस मशाल का वारिस योगी को नियुक्त किया।

भारतीय संस्कृति पर नवब्राह्मणवाद की संकीर्ण जंजीरों का कसाव बढ़ रहा था तभी हरिद्वार की कर्मभूमि में आचार्य श्रीराम शर्मा ने नारी जागरण की शुरुआत अपने घर से करते हुए अपनी पत्नी और बेटी का यज्ञोपवित संस्कार करवाया। आदिवासियों, पिछड़ों और समाज के अन्य कमजोर तबकों को वैदिक पुरोहित के रूप में स्थापित किया। आचार्य शर्मा की मुहिम का असर है कि आज उनके वारिस और 12 करोड़ से ज्यादा अनुयायियों के अगुआ प्रणव पंड्या राज्यसभा की नामजदगी को नकार देते हैं। गुजरात के मुख्यमंत्री को देश का भावी प्रधानमंत्री घोषित कर बाबा रामदेव भाजपा को जिताने की मुहिम में जुट जाते हैं और देश के योगीमय होने के बाद राजनीति को ‘बाबा रे बाबा’ कहते हैं। हिंदू धर्म के केंद्र हरिद्वार में ऐसी पौधशालाएं स्थापित हो चुकी हैं जो चुनावी अंक-शास्त्र बदलने का माद्दा रखती हैं। वटवृक्षों को खड़ा करने वाली इस पौधशाला पर इस बार का बेबाक बोल। 

मई 2014 में उत्तर प्रदेश के अंक-शास्त्र ने देश की गद्दी नरेंद्र मोदी को सौंप दी। वहीं 2017 के अंक-शास्त्र ने उत्तर प्रदेश की मशाल मोदी को सौंपी और मोदी ने उस मशाल का वारिस योगी को नियुक्त किया। मई 2014 से लेकर मार्च 2017 तक के सफर में मोदी के व्यक्तित्व ने भारतीय राजनीति की सूरत बदल दी। इतने कम समय में मोदी एक ऐसे मिथकीय चरित्र के रूप में उभरे जिन्हें कोई ‘ना’ नहीं कह सकता है। यह जनता का दिया ‘अंक-शस्त्र’ ही है कि मोदी के हर फैसले पर ‘कबूल है, कबूल है’ की गूंज उठती है।
चुनावी गणित के अंक-शास्त्र से परे हट हम जरा हरिद्वार के शांतिकुंज पहुंचते हैं। फिलहाल इसके अगुआ प्रणव पंड्या की एक पहचान सर्वशक्तिमान मोदी को ‘ना’ कहने की भी है। गायत्री परिवार के प्रमुख डॉक्टर प्रणव पंड्या ने राज्यसभा का सदस्य बनने से इनकार कर दिया था। अपनी नामजदगी ठुकराने के पीछे पंड्या का तर्क था कि अखिल विश्व गायत्री परिवार के लाखों सदस्यों को इससे ऐतराज था, साथ ही उनका अंतर्मन भी इसकी इजाजत नहीं दे रहा था। उनका तर्क था कि वे राष्टÑ व समाजसेवा संसद में बिना पहुंचे भी करते रहे हैं और आगे भी करेंगे।

मोदी और शाह की शाहकार जोड़ी जिन्होंने भाजपा को शब्दश: अखिल भारतीय जनता पार्टी बना दिया, जिनकी शक्ति के आगे सभी नतमस्तक हैं उन्हें एक धार्मिक संस्था के अगुआ ‘ना’ कह देते हैं। आखिर पंड्या के पीछे वह कौन-सी शक्ति थी, जिसके बल पर उन्होंने चुनावी अंकगणित के विजेताओं को नम्रता से नमस्कार करते हुए ‘न’ कह दिया। राज्यसभा नामजदगी के लिए जिस तरह लोग जीवनपर्यंत जुगाड़ में लगे रहते हैं, उसके लिए जरा भी मोह नहीं दिखा। चुनावी अंकगणित के इतर भी अंक हैं और आंकड़े हैं। अंकगणित में किस अंक का अधिभार किस समीकरण से ज्यादा हो जाए यह नहीं कहा जा सकता। एक संस्था का अगुआ, जिसके पीछे 12 करोड़ लोग खड़े हैं। अध्यात्म के रास्ते हासिल इस लोकसत्ता का अपना लोकतंत्र था। नरेंद्र मोदी ने बात की, अमित शाह ने समझाया तो हां कर दी। लेकिन इन सर्वशक्तिमान को हां करने के बाद वे 12 करोड़ लोग याद आए जिसकी वजह से गायत्री परिवार ने देश से लेकर विदेशों तक में अपनी जगह बनाई।

ईवीएम और मतपत्रों की बहस के परे एक जनादेश हरिद्वार के शांतिकुंज से भी निकला। अनुयायियों को पंड्या की नामजदगी से अवगत कराया गया और उनकी राय मांगी गई। अध्यात्म के केंद्र में तुरत-फुरत में इलेक्ट्रॉनिक रायशुमारी हुई और गायत्री परिवार ने अपने अगुआ को कहा कि आप मोदी को ‘ना’ बोल दें। और, इसी 12 करोड़ के अधिभार से पंड्या का पलड़ा भारी हुआ और पूरी नम्रता से ‘ना’ कहा। अनुयायियों के द्वारा थमाए गए इसी अंक-शस्त्र ने पंड्या को इतनी ताकत दी कि वे सर्वशक्तिमान के फैसले से परे गए। और, अपनी लोकसत्ता के फैसले को मानने के बाद उनकी तूती गायत्री परिवार के दायरे से बाहर भी गूंजने लगी। अनुयायियों के अगुआ का यह ‘ना’ भी अंकों के बादशाह के लिए एक संकेत है। यह एक ऐसी पौधशाला के विकसित होने का संकेत है, जो कभी भी आपकी शक्ति को चुनौती दे सकता है। फिलहाल, यह अगुआ मोदी की जीत को अपनी जीत बता रहे हैं। लेकिन जिस दिन ये उनके लिए फैसले को अपना मानना बंद कर देंगे तब क्या होगा? बारह करोड़ कब आपका पलड़ा झुका दें, कहा नहीं जा सकता।

योग-क्रांति से अपने अनुयायियों का विशाल साम्राज्य स्थापित करने वाले रामदेव का कांग्रेस से मनमुटाव हुआ और उन्होंने भ्रष्टाचार व कालेधन के खिलाफ अभियान छेड़ दिया। साल 2013 में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को पतंजलि योगपीठ में साधु-संतों के सामने देश का भावी प्रधानमंत्री घोषित किया। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कांग्रेस के खिलाफ हो रामदेव ने मोदी के पक्ष में जमकर प्रचार किया और 2014 में मोदी की जीत के बाद ही पतंजलि पीठ लौटे। केंद्र में मोदी से लेकर उत्तर प्रदेश में योगी तक का राज कायम करने में रामदेव के योगपथ का अहम योगदान रहा। हरिद्वार का शांतिकुंज से लेकर पतंजलि योगपीठ। इनकी विचारधारा भाजपा से मेल खाई तो इनके अनुयायी भी भाजपा के साथ हुए जिसका असर चुनावी अंकगणित पर दिखा।

हिंदू आस्था के अहम केंद्र हरिद्वार में दो ऐसी पौधशालाएं हैं जहां से ऐसी शक्तियां पैदा हो रही हैं जो अंकों की दुनिया का पलड़ा बदल सकती हैं। मोदी और योगी के लिए जनादेश का जो वटवृक्ष खड़ा हुआ है उसके बीज इन्हीं पौधशालाओं में लगाए गए थे। वह अलग बात है कि ये पौधशालाएं जैसे बीज बो रही हैं उसके फल भाजपा के बागों में ही लगे हैं और इसकी फसल मोदी और योगी ने ही काटी है। मोदी और योगी सत्ता पाने का सुख ले रहे हैं तो इन पौधशालाओं के अगुआ सत्ता को नकारने का असीम सुख उठा रहे हैं। पंड्या के अनुभवों से कह सकते हैं कि हासिल से ज्यादा की खुशी नकार की थी। चुनावी अंकों से सत्ता को हासिल करने का सुख है तो उसी के समांतर अंकों के कारण सत्ता को नकारने का सुख है।
इसी अंक-शस्त्र की शक्ति से रामदेव राजनीति को ‘बाबा रे बाबा’ कह कर नकारते हुए 2019 के लक्ष्य में सिर्फ ‘मेरा भारत महान’ बोल कर चुप हो जाते हैं। प्रणव पंड्या कहते हैं कि राजनीति में फंस कर अपने ‘परिवार’ (गायत्री परिवार) के लिए कैसे काम कर पाऊंगा। योगपीठ से लेकर शांतिकुंज की पौधशालाओं से शक्ति की यह गूंज उनके लिए एक संदेश हो सकती है जो कहते हैं कि, ‘हमारा क्या, हम तो फकीर हैं कभी भी झोला उठा कर चल देंगे’। इन पौधशालाओं में ऐसे योद्धा तैयार हो चुके हैं जो रणक्षेत्र का सेनापति तय करते हैं। सत्ता को ना कहने की इनकी शक्ति ही इन्हें असली शक्तिशमान बनाती है। भारतीय राजनीति में कहा गया यह ‘ना’, जनादेश की मशाल पकड़े महारथियों को कुछ पाठ पढ़ाना चाह रहा है।

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