December 11, 2016

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बेबाक बोल- निज भाषा- हिंदी हैं हम

हिंदी पट्टी में हिंदी का कमाते-खाते भी अगर आपने इसे राजकाज और कामकाज की भाषा बनाने की पैरोकारी की तो अंग्रेजी के झंडाबरदार आपको ‘भक्तिकाल’ में धकेल कर हाशिए पर ला देंगे। मनोरंजन और तकनीक के क्षेत्र में धनवर्षा करवाने वाली हिंदी को रोजी-रोटी की भाषा बनाने की वकालत करते ही आप लोकतंत्र के सबसे बड़े दुश्मन कहे जा सकते हैं। क्षेत्रवाद और वैश्वीकरण के विरोधाभासी धु्रवों पर मजबूत हो रही राजनीति और कमजोर की जाती रही हिंदी पर पढ़ें इस बार का बेबाक बोल।

‘अगर भारत की भाषाएं अंग्रेजी का स्थान नहीं ले सकतीं, तो भारत को स्वतंत्र कराने की ऐसी आतुरता ही क्या थी’? भारत के प्रथम राष्टÑपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने आजादी के बाद हिंदुस्तान में ही हिंदी और अन्य स्थानीय भाषाओं की दुर्गति को लेकर आश्चर्यचकित होकर ये बातें कही थीं। और सचमुच आजादी के बाद से लेकर आज तक हिंदुस्तान में ही कई स्तरों पर हिंदी का जिस तरह परोक्ष या प्रत्यक्ष विरोध जारी है, उसे देख कर हम हिंदी की नमक-रोटी खाने वाले लोग अब भी आश्चर्यचकित हो रहे हैं।
क्या यह सच नहीं है कि ज्यों ही हिंदी को अखिल भारतीय स्तर पर संपर्क भाषा के रूप में स्थापित करने की कोशिश होती है, तो अंग्रेजीदां तबके का बड़ा हिस्सा हिंदी के विरोध का झंडा बुलंद कर बैठ जाता है। गोया, हिंदी के अपनाते ही हिंदुस्तान की सारी आबादी विकास के निचले पायदान पर पहुंच जाएगी। किसी देश में उसकी राष्टÑभाषा की यह मुखालफत अलहदा है। चीन, रूस, जापान, जर्मनी जैसे विकसित देश मादरेजबान को ही अपनाकर दुनिया के विकसित देशों में शामिल हुए हैं। अंग्रेजी उनकी राह में कभी बाधक नहीं बन पाई। विश्व के सभी महान साहित्य अपनी ही भाषा में लिखे गए। दोस्तोव्यस्की, चेखव, पाब्लो नेरुदा, पाउलो कोएल्हो, मैक्सिम गोर्की, रवींद्रनाथ ठाकुर से लेकर प्रेमचंद तक ने अपनी भाषा में साहित्य रचना की और दुनिया के हर हिस्से में पहुंचे। हजारों साल पहले संस्कृत में लिखी गई भगवद्गीता आज भी अपनी समसामयिकता के कारण कई भाषाओं में अनूदित हो चुकी है और हो रही है।


यह सही है कि यूरोप की भाषाई राष्टÑीयता के परिप्रेक्ष्य में कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक फैले भारत में हिंदी को लेकर राष्टÑीयता का भाव कभी पैदा नहीं हो पाया। हिंदी को दक्षिण में ले जाने की शुरुआती कोशिशों के बीच ही कामराज जैसे नेताओं ने नारा दिया था कि अगर केंद्रीय सरकार का कोई कागज हिंदी में मिले, तो उसे फाड़ कर फेंक दो। वहीं लक्ष्मीनारायण सुधांशु ने कहा था कि सरकार अगर कोई कागज अंग्रेजी में भेजे, तो फाड़ कर फेंक दें। एक देश में भाषा के स्तर पर इस तरह के टकराव और बहुभाषा के बीच क्या हम कभी भाषा को लेकर एक तान नहीं गा पाएंगे? अलग-अलग भाषाएं भारत नाम की इस क्यारी में खिलें, इससे सुंदर क्या होगा! लेकिन क्या एक ऐसी भाषा नहीं हो सकती, जो उत्तर से दक्षिण को और पूर्व से पश्चिम को एक सूत्र में बांधे?
निश्चित रूप से विरोध हो हिंदी को जबरन थोपने का, एक भाषा में दूसरी भाषाओं को गुम करने का। लेकिन एक देश के सभी छोरों को जोड़ने वाले सूत्र के रूप में कोई एक भाषा तो हो! किसी भी भाषा को जबरन थोपने का जवाब कविगुरु रवींद्रनाथ ठाकुर ने देते हुए कहा था कि हिंदी को लोकप्रिय बनाना चाहते हो, तो ऐसा साहित्य पैदा करो कि लोग खुद-ब-खुद हिंदी सीखने को तैयार हो जाएं। साहित्य से लेकर समाज और राज के स्तर पर रवींद्रनाथ ठाकुर की बात कहां तक पहुंच सकी, यह हम सबके सामने है। मगर एक तथ्य किंवदंती-सा बन चुका है कि उन्नीसवीं सदी में बाबू देवकीनंदन खत्री रचित उपन्यास ‘चंद्रकाता’ और ‘चंद्रकाता संतति’ को पढ़ने के लिए बहुत से लोगों ने हिंदी सीखी थी। लेकिन इसके अलावा हमारे पास क्या है इस मोर्चे पर कहने के लिए? रवींद्रनाथ ठाकुर की सलाह को अगर किसी ने खोजा, ध्यान में रखा और माना है तो मनोरंजन के बाजार ने। हिंदी पट्टी में जिस बाजार की सबसे ज्यादा आलोचना हुई है, उसी ने हिंदी को आज की अंग्रेजीदां पीढ़ी की जुबान पर चढ़ाया है।


दरअसल, मनोरंजन का बाजार जानता है कि अपनी भाषा का दायरा कितना है और वह दिल को कैसी छूती है। आज हिंदी फिल्मों का, हिंदी गानों का बाजार इतना आगे बढ़ चुका है कि दूसरी भाषाओं को हिंदी की शक्ल में सामने आना पड़ रहा है, चाहे वह रीमेक हो या रीमिक्स। यह बहुत ही सहज रूप से आगे बढ़ रहा है। हम गूगल का उदाहरण देख सकते हैं। गूगल को हिंदी के मौजूदा दायरे और उसमें मौजूद उसके ग्राहकों का दायरा कितना बड़ा है इसका अंदाजा है, और वह उसमें जितनी पहुंच बना सकेगा, उसका बाजार उतना ही बढ़ेगा। गूगल ने हिंदी के साथ अन्य भारतीय भाषाओं को भी तकनीक से जोड़ा। अपनी भाषायी रणनीति के कारण ही यह हाशिये पर बैठे उस व्यक्ति के हाथ में भी पहुंच गया, जहां तक हमारी सरकारें नहीं पहुंच पाती हैं। लेकिन अपने हाथ में मौजूद स्मार्ट फोन के साथ हिंदी में वाट्सऐप, सोशल मीडिया और मेसेज के साथ जीने-खेलने वालों के लिए हिंदी में रोजगार कहां है?
यहीं आकर हमें सोचना पड़ता है कि क्या हमारी सरकारों ने कभी चाहा कि हिंदी की ताकत को बढ़ाना है तो इसके लिए जरूरी है कि यह रोजी और रोटी की भी जुबान बने? अगर किसी उत्पाद का बाजार बढ़ता है तो जनता में उसके प्रति ललक बढ़ती है। और यही ललक सरकारें अपनी मादरेजबान बोलने वालों के लिए नहीं जगा पा रही है। हमने अपनी राजनीति के कारण तुलसी और ग़ालिब के बीच ऐसी अमूर्तन दुश्मनी की रेखा खींच दी है कि अगर उर्दू लिखते वक्त कोई आमफहम उर्दू शब्द नहीं मिलता है तो उसकी जगह हिंदी के बजाय अंग्रेजी शब्दों का इस्तेमाल हो जाता है। और अगर हिंदी को अपनी सरहद से बाहर जाना पड़ता है तो वह संस्कृत से हाथ मिला लेती है। संत कवि तिरुवल्लुवर की रचनाओं को उत्तर भारत तक आने में साठ साल लग गए। आजादी के बाद के पचहत्तर सालों के बाद होना तो यह चाहिए था कि ‘वणक्कम’, ‘प्रणाम’ और ‘आदाब’ बोलने वालों को किसी तरह के अनुवाद की जरूरत महसूस नहीं होनी चाहिए थी। लेकिन भाषायी सियासत ने भारत की भाषाओं को बहनें बनाने के बजाय प्रतिद्वंद्वी और कभी-कभी दुश्मन तक बना कर रखा।
हाल ही में एक खबर आई कि मध्य प्रदेश के 31 हजार सरकारी माध्यमिक शालाओं में हिंदी शिक्षक का पद पूरी तरह खत्म कर दिया गया है। यहां पिछले पांच सालों से हिंदी विषय को अन्य विषयों के शिक्षक पढ़ा रहे हैं। मध्य प्रदेश भाजपाशासित राज्य है और हिंदी भाषी भी। खुद भाजपा का हिंदी को लेकर जगजाहिर प्रेम रहा है, लेकिन जब रोजगार के स्तर पर इसका खयाल रखने की जरूरत आई तो हिंदी ही बेरोजगार हुई।

तो हिंदी का संबंध जहां भी राजकाज या कार्य व्यापार से होता है वहीं उसे मार खानी पड़ती है। आज भी हिंदी के साथ अन्य भारतीय भाषाएं कहीं पिछड़ रही हैं तो वह है राजकाज के स्तर पर, राज्यों की अपनी सुविधा के मुताबिक लिए फैसलों की वजह से, क्योंकि यहीं राजनीति सबसे ज्यादा है। बहरहाल, हिंदी को ‘थोपने’ का आरोप लगाने वाले तर्क देते हैं कि क्या आप हिंदी के साथ वैश्विक बाजार में प्रवेश करेंगे? वहीं यह भी तर्क दिया जा रहा है कि पिछले दस सालों में चीन ने अपने यहां अंग्रेजी शिक्षण पर काफी जोर दिया है। लेकिन क्या दस साल पहले तक चीन दुनिया के बाजार से गायब था? क्या यह सच नहीं है कि चीन ने अगर दुनिया में अपनी धमक बनाई तो उसमें अंग्रेजी की भूमिका एक सीमा तक ही रही और चीनी भाषा ने ही वहां विकास की जमीन को इतना उर्वर बनाया कि आज वह दुनिया के सबसे विकसित देशों को चुनौती देता दिखता है? फिर हिंदी को इसी बुनियाद पर आगे बढ़ाने की अपील करने वाले यह कब कह रहे हैं कि आप अंग्रेजी पढ़े ही नहीं? चीन की तरह पहले अपनी संस्कृति की बुनियाद मजबूत तो कर लें, उस पर गर्व करना सीख लें, तब अंग्रेजी सीखने के मामले में चीन का उदाहरण दें। सिर्फ हिंदी का विरोध कर आप चीन के समकक्ष नहीं पहुंच सकते।

इन पंक्तियों के लेखक को अपने सार्वजनिक दायरे में अंग्रेजी के समांतर हिंदी में भी काम करने का मौका मिला है। डेढ़ दशक तक अंग्रेजी में पत्रकारिता करने के बाद जब हिंदी में काम करने का जिम्मा मिला, तो लगा कि दिल और जुबान की ‘घर वापसी’ हुई है। लगातार अंग्रेजी में काम करने के बाद भी हिंदी में काम करने में जरा भी मुश्किल नहीं हुई, क्योंकि हिंदी तो बचपन की लोरी से लेकर लड़कपन की मौज-मस्ती, झगड़े और प्यार की भाषा थी।
हिंदी पट्टी में बैठ कर हिंदी की पैरोकारी करने का मतलब कहीं से भी तमिल, मराठी या पंजाबी के खिलाफ होना नहीं है। बल्कि इससे ज्यादा अच्छा और क्या होगा कि एक हिंदी भाषी उतनी ही सहजता से तमिल, मलयालम, मराठी या पंजाबी भाषा में बात और काम करे और इन भाषाओं के लोग भी हिंदी में उतने ही सहज हों। क्षेत्रीयता किसी भाषा की सीमा क्यों हो? लेकिन अगर किन्हीं हालात में भारत के अलग-अलग हिस्सों में भाषाएं बदल रही हैं तो एक देश होने के नाते कोई भी एक भाषा समूचे देश को एक सूत्र में जोड़े, इससे किसी को क्यों एतराज होना चाहिए!

अफसोस यह है कि दूसरी भाषाओं की तो दूर, हिंदी की मिट्टी पर पले-बढ़े लोग भी हिंदी अपनाने का मतलब विकास की दौड़ में पीछे हो जाना मान बैठते हैं। अंग्रेजी में कठिन स्पानी और इतालवी शब्दों को आसानी से बोल लेने वाले लोगों को हिंदी में जरा भी संस्कृत की ‘बू’ आती है तो वे इसे अछूत करार देते हैं। दक्षिण और उत्तर-पूर्व तो छोड़िए, हिंदी हमेशा से हिंदी पट्टी में भी राजनीति की शिकार होती रही है। उत्तर से लेकर दक्षिण तक छिड़ी जंग में राजनीति हमेशा जीतती रही है और भाषा हारती रही है। लेकिन यह सच तो भारतेंदु हरिश्चंद्र ने औपनिवेशिक काल में ही बता दिया कि निज भाषा की उन्नति किए बिना आप उन्नति नहीं कर सकते। लेकिन हम अब भी अंग्रेजी की मानसिक गुलामी से बाहर नहीं निकल पाए हैं और यही वजह है कि अपनी भाषा से पैदा होने वाला स्वाभिमान और सहजता हमारे व्यक्तित्व और फिर देश का चरित्र नहीं बन सका है!

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First Published on November 5, 2016 1:35 am

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