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गौ रक्षकों के नाम खुला खत- क्‍या कभी खुद से पूछे हैं ये सवाल?

मेरे खत में कुछ सवाल हैं, जिनका जवाब आपको मुझे नहीं बल्कि खुद को देना है। उम्मीद है की इन सवालों के जरिए आप अपने भी सवालों के जवाब खोज लेंगे।
गुजरात के गिर सोमनाथ जिले में दलित युवकों की पिटाई की गई थी। (Photo Source: Video grab)

प्रिय गौ रक्षक,
मैं फरहान रहमान

जानता हूं 2014 में केंद्र में हुए सत्ता परिवर्तन के बाद आपमें नई ऊर्जा का संचार हुआ है। आप अपनी धार्मिक भावनाओं का सदियों से अनादर करते आए लोगों और पूर्व में राजनीतिक संरक्षण प्राप्त होने के वजह से आपकी गौ माता की हत्या करते चले आ रहे उन सभी लोगों से बदला लेना चाहते हैं, ताकि उनको सबक सिखाया जा सके और वे भविष्य में वे ऐसा करने से पहले सोचें।मेरा आपको पत्र लिखने का मकसद आपको नसीहत देना या फिर आपके काम को सही या गलत ठहराना कतई नहीं है। न ही मैं आपकी पार्टी की दोहरी नीति को सामने लाना चाहता हूं। जो सत्ता में आयी तो थी गुलाबी क्रान्ति को खत्म करने का नारा लगाकर, लेकिन पिछले दो सालों में इसने भारत को विश्व का नंबर 1 बीफ निर्यातक देश बना दिया है। बधाई हो, आपको अपनी पार्टी की इस उपलब्धि पर, आखिर देश बदल रहा है, आगे बढ़ रहा है। यह पत्र मैं आपको अपनी तरह का एक आम आदमी मानकर लिख रहा हूं, जो भोला है, सीधा-सादा है और परिस्थितियों का मारा है। मेरे खत में कुछ सवाल हैं, जिनका जवाब आपको मुझे नहीं, बल्कि खुद को देना है। उम्मीद है, इन सवालों के जरिए आप अपने सवालों के जवाब भी खोज लेंगे। जिनके ना होने की वजह से आपके काम और तर्क पर जोश हावी है और इसकी वजह से ही राजनीतिक दल आपका गलत इस्तेमाल करने में कामयाब हो जाते हैं।

शुरुआत करते हैं आपकी दिनचर्या से। जब आप सुबह उठते हैं, तो क्या आपने कभी पक्का किया कि जिस टूथपेस्ट से आप अपने दिन की शुरुआत कर रहे हैं, वह गाय की चर्बी से तो नहीं बना? टूथपेस्ट बनाने में ग्लिसरीन का इस्तेमाल होता है, इसे वनस्पति (सोयाबीन एवं पाम) तथा गोजातीय वसा दोनों से बनाया जा सकता है। वनस्पति से ग्लिसरीन को बनाना महंगा पड़ता है। भला बहुराष्‍ट्रीय कंपनियां आपकी धार्मिक आस्था के लिए अपने फायदे से समझौता क्‍यों करेंगी? गोजातीय वसा का इस्तेमाल सिर्फ टूथपेस्ट में नहीं होता, बल्कि आपके कॉस्मेटिक, माउथवॉश, च्विंग गम, साबुन, शैम्पू , शेविंग क्रीम, कंडीशनर, मॉइस्चराइजर, बालों में लगाने वाली क्रीम जैसे कई प्रोडक्ट्स में होता है। इन उत्पादों के पैक में लिखे पंथेनोल, एमिनो एसिड, विटामिन बी सभी को गोजातीय वसा से बनाया जाता है। क्या आपने चेक किया इन चीजों को ?

अगर मुंह धो लिया हो, तो चलिए चाय पीते हैं। चीनी कितनी लेंगे? 1 चम्मच या दो चम्मच? रुकिए l क्या आपको मालूम है कि चीनी की सफेदी कैसे आती है? इसे जानवरों की हड्डियों के चूरे से साफ किया जाता है, तब जाकर यह सफेद होती है। क्या आप पक्का सकते हैं कि आपकी चीनी को गाय की हड्डियों के चूरे से साफ नहीं किया गया होगा?

चलिए, चाय छोड़ देते हैं और नाश्ता करते हैं। क्या लेंगे? पूरी-छोले या सब्जी परांठा? लेकिन पहले पक्का कीजिये कि जो रिफाइन तेल का इस्तेमाल आप कर रहे हैं उसमें गोजातीय वसा तो नहीं? आपकी जानकारी के लिए 1983 में जब इंदिरा गांधी की सरकार थी, तो यह खुलासा हुआ था कि वनस्पती कंपनियां अपने खाद्य तेल में गोजातीय चर्बी का इस्तेमाल कर रही हैं। बड़ा हंगामा हुआ था जिसका नेतृत्व आपके पूर्व लीडर अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण अडवाणी ने किया था। विपक्ष के दबाव में इंदिरा गांधी ने कई कंपनियों के मालिकों को जेल भेजा और गोजातीय वसा के खाद्य तेल में इस्तेमाल पर पाबन्दी लगा दी। आपको पता है कि दिसम्बर 2015 में आपकी पार्टी की सरकार ने इस 32 साल पुराने बैन/पाबन्दी को चुपचाप हटा लिया? क्या अब आप सुनिश्चित कर सकते हैं कि आपके घर में इस्तेमाल हो रहे अडानी के तेल में गोजातीय वसा नहीं होगा?

चलिए खाना छोड़कर, सोफे पर बैठकर बात करते हैं। आपने सोफा कहां से लिया? खैर कहीं से भी लिया हो, क्या आप जानते हैं कि जो फर्नीचर आपके घर में हैं उसके बनाने में पशु उत्पाद का इस्तेमाल हुआ है? आपको मालूम है कि गोंद कैसे बनता है? पशुओं के चमड़े/खाल, हड्डियों एवं मांस को उबालकर। हाँ, ये भी सही है कि आजकल सिंथेटिक तरीके से भी गोंद का निर्माण होता है, परन्तु क्या आप कभी सुनिश्चित कर पाएंगे कि जो गोंद आपके फर्नीचर में लगा है, या जिससे किताब को बांधा गया है, या माइका चिपकाया गया है या कोई भी उत्पाद जिसमे गोंद का इस्तेमाल हुआ हो, वह कहां से आया है? आप केवल खुशफहमी में रहकर संतोष कर सकते हैं कि उस उत्पाद में पशु गोंद का इस्तेमाल नहीं हुआ है, और ‘आल इज वेल’ कहकर दिल को बहला सकते हैं।

चलिए घर से बाहर चलते हैं। गाड़ी में चलें? कार या मोटरसाइकिल? क्या आप जानते हैं कि आपकी गाड़ी में जो पहिया लगा है, उसमें भी पशु का इस्तेमाल किया गया है? परन्तु पहिया तो रबड़ से बना होता है! जी, रबड़ से तो बना होता है, परन्तु इसमें स्टेअरिक एसिड (अम्ल) का इस्तेमाल होता है जो रबड़ को बांध कर रखता है और घर्षण (फ्रिक्शन) में मदद करता है। जानते हैं स्टेअरिक अम्ल कहां से आता है? गाय, भेड़, बकरी, भैंस, सुअर इत्यादि के वसा से। हां, वनस्पतिक तरीके से भी इसका उत्पादन संभव है, परन्तु फिर वही बात- क्या कंपनियां आपके धार्मिक आस्था के लिए अपने फायदे से समझौता करेंगी? स्टेअरिक अम्ल का इस्तेमाल कॉस्मेटिक, मोमबत्ती, डियो, क्रीम में भी होता है।

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बाजार चलें खरीदारी करने? सूती या जूट का थैला साथ ले लें। क्यों? क्योंकि प्लास्टिक के शॉपिंग बैग में भी पशु वसा का इस्तेमाल होता है। यह भी सही है कि प्लास्टिक का निर्माण पेट्रोलियम उत्पाद से होता है, परन्तु प्लास्टिक निर्माता पशु चर्बी का इस्तेमाल एडिटिव एवं “स्लिप एजेंट” के रूप में करते हैं जिससे आपकी पकड़ प्लास्टिक पर मज़बूत हो। इस प्रकार से आप जो भी प्लास्टिक की चीज इस्तेमाल कर रहें हैं और उस पर आपकी ग्रिप/पकड़ मजबूत है, मतलब वह फिसल नहीं रही तो हो सकता है कि उसके निर्माण में पशु चर्बी का इस्तेमाल किया गया हो।

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गोहत्या के नाम पर मुस्लिमों और दलितों की पिटाई तो कर रहे हैं। पर, हाथापाई में ध्यान रखिये कि कहीं आपको चोट न लग जाये, क्योंकि चोट लगने पर आपको उपचार कराना होगा, और उपचार के दौरान आपका ”धर्म” भ्रष्ट हो सकता है। उपचार के दौरान डॉक्टर से अनुरोध कीजिये कि वह आपको टैबलेट देंं, कैप्सूल नहीं, क्योंकि कैप्सूल का खोल भी पशु प्रोटीन से बना होता है। कैप्सूल के खोल में जेलाटीन का इस्तेमाल होता है और जेलाटीन का निर्माण गाय, भैंस अथवा सुअर के खाल को उबालकर, या फिर हड्डियों से होता है। अगर आपको चोट लग आयी हो और स्टिच की आवश्यकता हो तो फिर संकट की स्थिति है, क्योंकि टांके लगाने के लिए इस्तेमाल होने वाला धागा भी पशुओं की आंत से बना होता है। हालांकि, अब इसका इस्तेमाल कम होने लगा है (पश्चिमी देशों में) क्योंकि इसके इस्तेमाल से “bovine spongiform encephalopathy” या “mad cow disease” होने की संभावना रहती है, परन्तु भारत में चिकित्सा पद्धति और इसके अनैतिक व्यवसायीकरण से आप भी अवगत हैं।

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क्या आपको मालूम है कि बहुत सी दवाइयां जो आप खाते हैं, उसमें भी गोजातीय वसा, मांस, हड्डी या जानवरों के अन्य अंग का इस्तेमाल होता है। अगर आप रक्त चाप के मरीज हैं, आपकी दवा में हेपारिन हो सकता है। हेपारिन का इस्तेमाल रक्त को पतला करने एवं थक्का जमने से रोकने में होता है। किडनी के डायलिसिस में भी इसका इस्तेमाल होता है। इसका निर्माण गाय के फेफड़े अथवा सुअर की आंत से होता है। अगर आप डायबिटीज के शिकार हैं, तो मालूम होना चाहिए कि इंसुलिन कहां से बनता है? सुअर के अग्नाशय (pancreas) से। निराश हो गए? क्रिकेट का मजा लीजिए। पर यह जान लीजिए कि क्रिकेट के गेंद का खोल गाय के बछड़े की खाल से बनता है। तभी उसमे स्विंग आता है। उफ्फ…परेशान हो गए! सिगरेट पीना है? पर याद रहे कि सिगरेट के फिल्टर में भी सुअर का खून होता है, क्योंकि वह निकोटीन को सोख लेता है।

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उम्मीद है, आपको संदेश मिल गया होगा– दलित और मुसलमान आपकी आस्था को चोट नहीं पहुंचा रहे। कॉरपोरेट जगत ने आपकी आस्था और रुढियों को बर्बाद कर दिया है, यहां तक कि आप इसके बिना जी नहीं सकते। फिर दलितों और मुसलमानों को मारकर आपको क्या मिल रहा है? वे तो इस व्यापार में एक कड़ी मात्र हैं जो अपनी रोजी-रोटी के लिए जान जोखिम में डालकर पशुओं को इन कॉरपोरेट्स तक पहुंचाते हैं। उनको मिलता क्या है इस व्यापार में? चवन्नी भर पैसे। असल धंधा तो कॉरपोरेट्स कर रहे हैं और आप उन्हें रोक भी नहीं सकते। तो फिर झगड़ा किस बात का? किस बात का खून खराबा?

 
लेखक झारखण्ड केंद्रीय विश्वविद्यालय में सामाजिक शोधकर्ता हैं। इस लेख में लिखे विचार व्यक्तिगत हैं।

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  1. P
    Polysam
    Mar 22, 2017 at 4:08 pm
    Amazing truth
    (0)(0)
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