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एक टेलीग्राम जिससे अमेरिका को उतरना पड़ा पहले विश्व युद्ध में, जर्मन विदेश मंत्री को देश हारकर चुकानी पड़ी इसकी कीमत

जुलाई 1914 से नवंबर 1918 तक चले दुनिया के पहले विश्व युद्ध में एक तरफ अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, जापान, इटली इत्यादि देश थे। दूसरी तरफ जर्मनी, ऑस्ट्रिया-हंगरी, तुर्की, बुल्गारिया इत्यादि देश थे।
पहले विश्व युद्ध में इस्तेमाल हुए अमेरिकी ब्रिटिश, फ्रांसीसी और जर्मन गैस मास्क। (Photo- REUTERS Editorial Use Only)

जुलाई 1914 से नवंबर 1918 तक चले दुनिया के पहले विश्व युद्ध के बारे में आपने अब तक बहुत से किस्से सुने-पढ़ें होंगे। दुनिया ने इससे पहले बड़ी-बड़ी लड़ाइयां देखी थीं लेकिन इतने सारे देश एक-दूसरे को मिटाने के लिए दो गुटों में बंटकर पहले बार युद्धरत थे। एक तरफ अलाइड पावर्स में फ्रांस, ब्रिटेन, रूस, अमेरिका, जापान, इटली इत्यादि देश थे। दूसरी तरफ सेंट्रल पावर्स में जर्मनी, ऑस्ट्रिया-हंगरी, तुर्की, बुल्गारिया इत्यादि देश थे। पहले विश्व युद्ध में सबसे निर्णायक मोड़ा था अप्रैल 1917 में अमेरिका का इसमें आधिकारिक रूप से शामिल होना। अमेरिकी सेना की ताकत ने युद्ध में अलायड पावर्स की तरफ पलड़ा झुका दिया। लेकिन ये जानकर आपको हैरत होगी कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने  एक टेलीग्राम मिलने के बाद इस युद्ध में शामिल होने का फैसला कर लिया था।

युद्ध इतिहासकार पैट्रिक ग्रेगरी ने बीबीसी डॉट कॉम पर प्रकाशित लेख में अमेरिका के पहले विश्व युद्ध में शामिल होने और उस ऐतिहासिक टेलीग्राम के बारे में विस्तार से बताया है। दूसरे विश्व युद्ध में अमेरिका के शामिल होने की ठोस परिस्थितियां तब पैदा हुईं जब जर्मन सरकार ने ब्रिटिस प्रायद्वीप से गुजरने वाले अमेरिका समेत सभी देशों के जलपोतों पर हमला करने की घोषणा (यू-बोट वारफेयर) की। मई 1915 में जर्मनी ने आयरलैंड के समुद्र तट के पास एक यात्री विमान को नष्ट कर दिया था जिसमें 128 अमेरिकी नागरिकों समेत 1200 लोग मारे गए थे। उस समय अमेरिका के राष्ट्रपति वूडरो विल्सन थे। इसके बाद अमेरिका में युद्ध में शामिल होने का दबाव बढ़ गया। सितंबर 1915 में जर्मनी के कैसर विलहम द्वितीय ने यात्री जलपोतों पर हमला  करने के परहेज का आदेश दिया। अमेरिका ने संयम दिखाया और वो युद्ध में शामिल नहीं हुआ।

विल्सन 1917 में एक बार फिर अमेरिका के राष्ट्रपति बने। जनवरी 1917 में सीनेट को संबोधित करते हुए विल्सन ने युद्ध खत्म होने के बाद “सभी देशों की दोस्ती की बुनियाद” तैयार करने पर जोर दिया। विल्सन को इस बात का जरा भी अंदाजा नहीं था कि भविष्य की कोख में उनके देश के लिए क्या छिपा है। 31 जनवरी को जर्मन राजदूत ने विल्सन के गृह मंत्री रॉबर्ट लैंसिंग को बुलाकर जर्मनी सरकार के ताजा फैसले से अवगत कराया। जर्नी ने एक बार फिर यू-बोट वारफेयर की घोषणा की थी। इस घोषणा के बाद दोनों देसों के कूटनीतिक संबंध टूट गए। भावी को रोकने के कुछ प्रयास किए गए लेकिन होनी को टाला नहीं जा सका।

अभी अमेरिका के युद्ध में शामिल होने को लेकर असमंजस थी और अटकलों के बाजार गर्म थे, तभी जर्मनी से आए एक टेलीग्राम ने पूरा परिदृश्य बदल दिया। युद्ध इतिहासकार पैट्रिक ग्रेगरी के अनुसार ये टेलीग्राम कथित तौर पर जर्मनी के विदेश मंत्री आर्थर जिमरमैन ने भेजा था। इस टेलीग्राम में कहा गया था कि अगर अमेरिका विश्व युद्ध में कूदता है तो जर्मनी मेक्सिको को सैन्य मदद देने को तैयार है। मेक्सिको के जर्मन दूतावास को भेजा गये टेलीग्राम में जिमरमैन ने लिखा था, “आओ साथ युद्ध करें, एक साथ शांति लाएं।”  जिमरमैन ने मैक्सिको आश्वासन वित्तीय मदद के आश्वासन के साथ भरोसा दिलाया कि “जर्मनी पनडुब्बियों की बेमुरव्वत तैनाती से कुछ ही महीने में शांति आ जाएगी।” 29 मार्च को दिए एक भाषण में जिमरमैन ने अपने मंसूबों का जायज ठहराया।

दो अप्रैल 1917 को  विल्सन ने अमेरिकी कांग्रेस के संयुक्त सत्र को संबोधितकिया। अपने भाषण में उन्होंने अमेरिका के भावी कार्रवाई के संकेत दिए। विल्सन ने कहा कि उनकी जर्मन नागरिकों से कोई दुश्मनी नहीं लेकिन लोकतंत्र को बचाना जरूरी है। चार अप्रैल को अमेरिकी सीनेट ने विल्सन के पक्ष में प्रस्ताव पारित किया। छह अप्रैल को हाउस ऑफ कामंस ने इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। उसी दिन शाम को राष्ट्रपति विल्सन ने प्रस्ताव पर दस्तखत कर दिए और अमेरिका आधिकारिक तौर पर युद्ध में कूद पड़ा। उसके जो हुआ वो इतिहास है। अमेरिका का साथ मिलते ही अलायड पावर्स की ताकत कई गुना बढ़ गई और आखिरकार उसे ही जीत मिली।

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