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चैनलों पर हावी ‘राष्‍ट्रवाद’, पाकिस्‍तानी मेहमानों को नहीं बुलाने की कसमें, ‘बदला’ मांग रहे एंकर

''हमें खुद में झांककर देखना होगा कि हम इतने अभिमानी, गुलाम और चापलूस क्‍यों हो गए हैं।''
हकीकत में भले न हो, मगर भारतीय मीडिया में तो कम से कम एक युद्ध लड़ा ही जा रहा है।

भारत का हर नागरिक इस समय गुस्‍से में है। हमारे सैनिकों के शवों को क्षत-विक्षत कर दिया, ऐसे पाकिस्‍तान की सीनाजोरी पर भारतीय ‘बदला’ चाहते हैं। आंखों में लाली और आवाज़ में गरज रखने वाला यह भारत इस समय मीडिया के लिए टीआरपी का जरिया बना हुआ है। सड़कों और लोगों के दिलों से निकलकर ‘राष्‍ट्रवाद’ अब टीवी स्‍टूडियोज में अपनी जगह बना रहा है। धम्‍म से टेबल पर मुक्‍का मारकर सवाल पूछने वाला एंकर बौराया हुआ है, उसे ‘बदला’ चाहिए। मगर टीआरपी भी तो चाहिए, इसलिए किसी न किसी को बेइज्‍ज़त करना ही पड़ेगा। दोनों तरफ से ऐसे लोग लाए जाएं जो तर्क भुलाकर ‘राष्‍ट्रवाद’ का झंडा उठाते हैं। दो देशों की जुबानी जंग को देखकर दर्शकों का खून भी खौलेगा, और फिर आवाज़ आएगी सोशल मीडिया पर। शहीदों ने तो अपना सर्वोच्‍च बलिदान कर दिया, तो चलो अब उनके परिवारों से पूछा जाए कि उन्‍हें ‘बदला’ कैसे चाहिए। एक के बदले पचास सिर लाकर, या जंग छेड़कर। हकीकत में भले न हो, मगर भारतीय मीडिया में तो कम से कम एक युद्ध लड़ा ही जा रहा है। बहस में पक्षकारी के नाम पर किसी पाकिस्‍तानी को स्‍टूडियो में बुलाने का, और फिर उसकी ऊज-जुलूल बातों पर सीधे पाकिस्‍तान को धमकाने का तो ट्रेंड सा चल पड़ा है।

जब स्‍टूडियो ‘वॉर-फ्रंट’ में तब्‍दील होने लगता है, तब कुछ पत्रकार जागते हैं। कसम खाते हैं कि किसी पाकिस्‍तानी मेहमान को शो पर नहीं बुलाएंगे। ‘फ्रिंज एलिमेंट्स’ को बढ़ावा नहीं देंगे। ‘इंडियन मीडिया में उन्‍हें स्‍पेस नहीं देंगे।’ भूपेंद्र चौबे ने साफ कहा है कि ‘पाकिस्‍तानी सेना के किसी समर्थक, चाहे वह पाकिस्‍तान का बाशिंदा या कोई भी क्‍यों न हो, मेरे शो पर अब नहीं आएगा।’ राजदीप सरदेसाई ने एक पूरा ब्‍लॉग लिख मारा है इन ‘पाकिस्‍तानी मोगैम्‍बोज’ पर। इनके ‘बायकॉट’ की मुहिम भी चला दी है। लिखते हैं कि ‘हम टीवी मीडिया वाले भारत और पाकिस्‍तान की आने वाली नस्‍लों को भयंकर नुकसान कर रहे हैं। अगर पीरजादा (सैयद तारिक पीरजादा) जैसे लोग पाकिस्‍तान की राय बताएंगे तो हर भारतीय पाकिस्तान से ‘बदला’ लेने की कसम खाएगा।’

‘शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले…’ जगदंबा प्रसाद मिश्र की ये लाइनें भारतीय मीडिया के लिए जरा बदल गईं हैं। अब शहीदों की चिताओं पर टीआरपी बटोरी जाने लगी है। जंग की हुंकार भरी जा रही है। कल ‘वर्ल्‍ड प्रेस फ्रीडम डे’ है। जैसे राजदीप ने इस मौके पर कहा, ”हमें खुद में झांककर देखना होगा कि हम इतने अभिमानी, गुलाम और चापलूस क्‍यों हो गए हैं”, पत्रकारों को इस पर सोचना चाहिए।

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