December 02, 2016

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बेबाक बोल- जादूगर- भ्रमजाल

इतने बड़े लोकतंत्र में सरकार अचानक एक फरमान जारी कर देश की 86 फीसद मुद्रा को चलन से बाहर कर देती है। सवाल उठता है कि आखिर एक दिन के लिए भी देश के 99.9 फीसद लोगों को असुविधा का सामना क्यों करना पड़े? और इसका जवाब आता है समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व का ध्वजावहक, आधुनिक लोकतंत्र की मूर्ति संयुक्त राज्य अमेरिका से। नवउदारवादी मूल्यों के खात्मे के इस दौर में मोदी-ट्रंप सरकार के वोट और नोट के बीच के संबंधों को समझने की कोशिश करता इस बार का...

जब अमेरिका के वोटों पर नजर गड़ाए हुए चुनावशास्त्री टीवी पर बैठने की तैयारी कर रहे थे, तभी भारतीय टेलीविजन पर नायक की माफिक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आकर नोटों की मार दे दी। दिवाली के बाद दिल्ली से लेकर कई राज्यों में फैले प्रदूषण, एक चैनल पर एक दिन की पाबंदी, जेएनयू के छात्र की गुमशुदगी के तूल पकड़ते मामले के बीच इधर मोदी ने ‘कौन करेगा कालेधन के खिलाफ लड़ाई- द्वितीय’ का तुरुप का पत्ता खेला और उधर अमेरिकी लोकतंत्र ने ट्रंप के हाथ में एकध्रुवीय दुनिया की कमान दे वैश्विक राजनीति और समाज को जोर का झटका दे दिया। अमेरिकी जनता के वोटों का बक्सा चुनावशास्त्रियों की मौत का एलान कर चुका था। अब जेरे-बहस मोदी और ट्रंप के नाम, राष्टÑवाद के इस अंगने में उदारवाद का क्या काम…! अमेरिका के वोट और मोदी के नोट एक ही तरह की राजनीति का इशारा कर रहे थे। अबकी बार मोदी सरकार, अबकी बार ट्रंप सरकार। भारत और अमेरिका में सत्ता के दावेदार एक ही भाषा बोल रहे थे और यहां से लेकर सात समुंदर पार तक जनता एक ही विचारधारा पर मुहर लगा रही थी। मोदी और ट्रंप की वैश्विक बनती विचारधारा ही अब चुनौती है।

 

 

चुनावी नतीजों के बाद भारत में कहा गया कि मोदी नहीं जीते, कांग्रेस हारी है और अब अमेरिका के लिए कहा गया कि यह ‘हाथी’ की जीत नहीं, ‘गधे’ की हार है। तो भारत से लेकर अमेरिका तक यह उस नवउदारवादी विचारधारा पर एक हथौड़ा था, जिसकी मार जनता तीन दशकों से खाए बैठी है और पलटवार अब कर रही है। जब नवउदारवाद के पैरोकार रोटी-कपड़ा और मकान के जुगाड़ में नाकाम रहे तो जनता उनकी विचारधारा के छाते के नीचे आखिर कब तक रहती। बाजार से पूंजी गायब, रोजगार गायब तो लोग कब तक धर्मनिरपेक्षता, अभिव्यक्ति की आजादी के झुनझुने से बहलते। लोगों ने देखा कि आपकी रोजी-रोटी की बात तो वह ‘वैचारिक अछूत’ कर रहा है। ये कह रहे हैं कि हम अमेरिका से भारत में नौकरी लाएंगे तो वे कह रहे थे कि भारतीयों और अन्य शरणाथिर्यों को दिया गया अमेरिकियों का हिस्सा वापस लेंगे। पहले अपना पेट भरेंगे फिर मेहमानों का इंतजाम करेंगे। देशी-विदेशी पूंजी के अंधाधुंध मुनाफे के वैश्विक खेल में जनता की पीड़ा भी वैश्विक थी। और, मुनाफे के इस धंधे का शिकार हुआ था श्रमिक वर्ग। पूंजी के बाजार में सबसे उपेक्षित श्रमिक वर्ग ही था। उसका शोषण इतना हो चुका था कि अब उसके पास खोने के लिए कुछ नहीं था।

अमेरिका की अगुआई में भारत में नेहरूवादी-साम्यवादी अर्थव्यवस्था का दाह-संस्कार कर मनमोहन सिंह नवउदारवाद का चेहरा बने थे। नौकरियों की हालत बद से बदतर होती गई, लेकिन बराक ओबामा से लेकर हिलेरी क्लिंटन की जुबान एक तरह की जड़ता की राजनीति पर टिकी रही। ‘ब्रेग्जिट’ पहले ही नवउदारवाद की चूलें हिला चुका था और अब ट्रंप की सरकार आर-पार की लड़ाई का एलान कर चुकी है। पिछले तीन दशकों में पूंजीवाद और नवउदारवाद के झंडाबरदारों ने आम जनता को खुले बाजार में झोंक तो दिया, लेकिन उसके थपेड़े संभालने के लिए माहौल नहीं बनाया। एक खास विचारधारा के बोझ तले समाज और अर्थशास्त्र में जो सड़ांध आ चुकी थी, उसे हटाने के लिए वह कोई भी विचारधारा अपनाने को तैयार थी। बेरोजगारी का संकट झेल रही जनता को अभिव्यक्ति की आजादी, लैंगिक समानता और यौन उत्पीड़न की बातें समझ में नहीं आती हैं। भारत में न तो कांग्रेस आपकी रोजी-रोटी पर बोलने को तैयार थी और अमेरिका में हिलेरी क्लिंटन के पास इस बात का कोई जवाब नहीं था कि बाजार में पूंजी को बढ़ाने, नौकरियां लौटाने के लिए उनका रोडमैप क्या है। जनता जो बातें हिलेरी के मुंह से सुनना चाहती थी, अपनी ठहरी हुई राजनीति के कारण हिलेरी वह बोल ही नहीं पा रही थीं। और ट्रंप जिनकी कोई राजनीति ही नहीं थी, व्यवस्था जिनके लिए खुला मैदान थी, वही बोल रहे थे जो जनता चाह रही थी। हां जी, इस्लाम ही हमारा दुश्मन है, आतंकवाद ही हमारा दुश्मन है, आउटसोर्सिंग और आव्रजन ही हमारा दुश्मन है। कम से कम यहां दुश्मन को एक शक्ल-ओ-सूरत तो दी गई थी! तो लंबे समय से एक जगह ठहरी हुई हालत के खिलाफ जाने के लिए जनता के पास मोदी और ट्रंप के अलावा विकल्प भी क्या था?

भारत के ढाई साल के बाद अमेरिका में ट्रंप की सरकार बनी है। यथास्थितिवाद से घबराई हिंदुस्तान की जनता को मोदी ने भरोसा दिलाया था कि साठ साल का बिगड़ा अब तिलस्मी अंदाज में ठीक हो जाएगा। लेकिन ढाई साल बाद नौकरी और महंगाई को लेकर कांग्रेस-काल वाला ही अनुभव करने लगी, लौट के बुद्धू घर को आए जैसी सोचने लगी जनता के लिए अब मोदी सरकार क्या कर रही है? हर-हर मोदी और घर-घर मोदी के नारे के बाद घर-घर रोजगार पहुंचाने का कोई रास्ता इनके पास भी नहीं है। चाय से लेकर गाय पर चर्चा तक की काठ की हांडी एक बार चढ़ चुकी है और आगे उत्तर प्रदेश और पंजाब का चुनाव है। चुनावों के वक्त तो आपने कांग्रेस को जनता का दुश्मन करार दिया और जनता ने उस दुश्मन को किनारे भी कर दिया। अब हर हाथ काम मांग रही जनता के लिए क्या किया जाए, उसके सामने कौन सा दुश्मन खड़ा किया जाए।

फिलहाल एक और तिलिस्म का जाल बिछाते हुए कांग्रेस-काल में छपे 500 और हजारी नोटों को जनता का दुश्मन बताते हुए इस ‘कालेधन’ को रातोंरात जनता से दूर कर दिया गया। अच्छे दिन के मलबे में कराह रही जनता के बीच राष्टÑ के ‘शुद्धीकरण’ का यह तिलिस्म रचना जरूरी था। अचानक शाम में टीवी पर आकर जनता को प्रधानमंत्री का संदेश देना नया माहौल रच गया। गुपचुप लिया फैसला, ऐतिहासिक, साहसिक, बैंक वालों को भी कानोंकान खबर नहीं – जैसे जुमले उछल चुके थे। फैसले का विरोध हो या समर्थन, सवाल पूछ रही जनता के बीच नया तिलिस्म तो रच ही दिया गया था। भले ही नोटों का यह फैसला देश के आम नागरिक के सिर पर हथौड़े की तरह लगा, सरकार का जनता को चकरा देने वाला मकसद तो पूरा हो ही गया। सनद रहे, मोदी की राजनीति का तुरुप का पत्ता ही चकरा देना है, एक जादूगर की तरह। एक पूरी लड़की को तलवार से काट कर टुकड़ों में कर देना और फिर उसे जोड़ देना, गुलदस्ते से कबूतर उड़ा देना और कबूतर को खरगोश बना देना। अपने बटुए में, अलमारी में पड़े करंसी नोटों को पल भर में कागज के टुकड़े में बदल जाते देखते हुए जनता चकरा रही थी।

अब यह खुद मोदी सरकार का ही बयान है कि देश में जितनी करंसी बाजार में है उसका 86 फीसद भाग इन्हीं नोटों की सूरत में है। एक आंकड़ा ही देखिए कि देश में 14180 अरब कीमत के पांच सौ और हजार के नोट हैं। इसके अलावा, जो लोगों की तिजोरियों में भरे पड़े हैं, वे अलग हैं। कहीं यह है कि देश में छह लाख करोड़ के बड़े नोट हैं। सरकार ने अब सबकी सफाई के लिए आम आदमी को महज साढ़े तीन घंटे का नोटिस दिया वह भी तब जबकि बैंक व दूसरे वित्तीय संस्थान बंद हो चुके थे। एटीएम में छोटे नोट नहीं थे। अब आप उस छात्र या छात्रा का सोचें जिसे रात को यह पता न चला तो सुबह उसके पास कॉलेज तक जाने के लिए और दोपहर में कैंटीन में खाने के लिए पैसे नहीं हैं जो पढ़ाई के लिए अपने परिवार से दूर रहते हैं। सरकार ने यह भी ध्यान में नहीं रखा कि दूसरे दिन खारी बावली और शाहदरा जैसे कई बाजारों और निर्माण कार्य से जुड़े मजदूरों को दिहाड़ी नहीं मिलेगी तो वे खाएंगे क्या? बिना छोटे नोटों के सब्जी कैसे बिकेगी? ‘राष्टÑ निर्माण’ में योगदान के इस तिलिस्मी तरीके से आमजन हैरान थे। लेकिन हैरानी-परेशानी के बीच जीपीएस चिप वाले दो हजारी नोटों की अफवाह के साथ वह व्यस्त भी तो थी, सरकार से वही रोटी और रोजगार वाले कांग्रेसकालीन सवाल करना कुछ देर के लिए भूल तो गई थी!

एक बात यह भी कि सरकार के अलंबरदार जिन बड़े कारोबारियों के साथ सेल्फी लेते हैं, सरकारी नेमतों से नवाजते हैं, वही कालेधन के साथ उनकी सरकार की सीमा के पार खड़े हो जाते हैं। जादू के साथ यही बड़ी बात है कि उसमें हैरतअंगेज कारनामे के बाद एक और कारनामा ऐसा होता है जो उससे भी बड़ी हैरत पेश करता है, जिसे अंग्रेजी में ‘प्रेस्टीज’ कहते हैं। जैसे कि आप जादू के जोर से सबकी आंखों के सामने किसी को गायब कर दें तो लोग दांतों तले अंगुली दबा लेते हैं। लेकिन जादू का अंत यहां नहीं। यह पूरा तब होता है जब आप उसी व्यक्ति को कहीं और से आम लोगों के बीच से नमूदार भी कर दें। समय आ गया है जब देश के सबसे बड़े जादूगर को अब हैरत को भी हैरान कर देने वाला कारनामा करके दिखाना है जिसे देख सब कह सकें, ‘जी, बिल्कुल… अब सब साफ है!’ ऐसा होगा क्या? मोदी और ट्रंप दोनों जादूगरों पर नजर है।

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First Published on November 12, 2016 2:08 am

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