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आंदोलन, ईवीएम और आत्ममंथन

दिल्ली विधानसभा में 2015 की ऐतिहासिक जीत और उसके ठीक दो साल बाद पंजाब, गोवा, राजौरी गार्डन और अब दिल्ली नगर निगम का चुनावी फैसला।
Author April 29, 2017 01:53 am
आम आदमी पार्टी भी इसी सोच के दौर से गुजर रही है और ईवीएम को एक बड़ा मुद्दा बनाने और आंदोलन की बात करने वाली पार्टी अब उससे इतर भी कारणों को तलाश रही है ताकि आगे की राह तय की जा सके।

दिल्ली विधानसभा में 2015 की ऐतिहासिक जीत और उसके ठीक दो साल बाद पंजाब, गोवा, राजौरी गार्डन और अब दिल्ली नगर निगम का चुनावी फैसला। किसी भी राजनीतिक दल के लिए यह सोचने पर विवश होना लाजमी है कि ‘ये कहां से कहां आ गए हम’। आम आदमी पार्टी भी इसी सोच के दौर से गुजर रही है और ईवीएम को एक बड़ा मुद्दा बनाने और आंदोलन की बात करने वाली पार्टी अब उससे इतर भी कारणों को तलाश रही है ताकि आगे की राह तय की जा सके। हालांकि, आप के चंद प्रमुख चेहरों से बातचीत से यह बात सामने आई कि कार्यकर्ताओं के माध्यम से जनता के साथ व्यापक संवाद स्थापित करने वाली पार्टी का वह संपर्क कमजोर पड़ रहा है और उसे फिर से मजबूती देने की जरूरत है। खुद के स्थापित पैमानों और लोगों की वैकल्पिक राजनीति की उम्मीदों को लेकर कैसे काम करे – इस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। उत्तर प्रदेश में भाजपा की भारी जीत और पंजाब व गोवा में आम आदमी पार्टी की हार से कार्यकर्ताओं के टूटे मनोबल को कैसे वापस लाया जाए, पार्टी इस पर काफी गंभीर है। आगामी विधानसभा चुनावों विशेषकर गुजरात में पार्टी चुनावी राजनीति में जाए या नहीं इस पर भी पुनर्विचार की संभावना है।

आम आदमी पार्टी दिल्ली के सचिव, ग्रेटर कैलाश से विधायक और दिल्ली नगर निगम चुनाव की बागडोर संभालने वालों में से एक सौरभ भारद्वाज ने यह बात स्वीकार की कि पार्टी के अंदर कई लोग मान रहे हैं कि ईवीएम को मुद्दा बनाने से जनता के बीच गलत छवि गई, लेकिन जो सही लगा वही कहा गया और आगे भी जानकारी आएगी तो सामने रखेंगे। ‘आप’ की वैकल्पिक राजनीति में अहमियत पर जोर देते हुए भारद्वाज ने आत्ममंथन को एक छोटा मुद्दा बताया। बकौल भारद्वाज, ‘पारंपरिक राजनीति में लॉबी का जो खेल होता है आत्ममंथन उसी का एक जरिया है। एक लॉबी दूसरी लॉबी को नीचा दिखाने के लिए आत्ममंथन का सहारा लेती है’।

हालांकि आप विधायक के मुताबिक, उत्तर प्रदेश विधानसभा के नतीजों के तुरंत बाद एमसीडी चुनाव हो गया, इससे पंजाब और गोवा से दिल्ली लौटे कार्यकर्ताओं को हमारे तरह के प्रचार अभियान के लिए बहुत कम समय मिला। उन्होंने कहा कि प्रचार की रणनीति पर चर्चा जरूर होगी लेकिन यहां प्रचार का तरीका बड़ा मुद्दा नहीं है।
पार्टी के एक अन्य नेता मदन लाल ने कहा कि काम तो किया लेकिन जनता से संवाद नहीं कर पाए, यह एक बड़ा सच है और पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने सभी को जनता के बीच जाने को कहा है। सौरभ भारद्वाज के मुताबिक, यह तय किया गया है कि हर विधायक अपने क्षेत्र की जनता से संवाद कर कमजोर होती पार्टी की जड़ों के पीछे के कारणों को पड़तालेगा और उसकी चर्चा शीर्ष नेतृत्व के साथ करेगा।

आम आदमी पार्टी के नेता सोमनाथ भारती ने माना कि पार्टी खुद के मानकों से लड़ रही है। बकौल भारती, ‘चार साल पुरानी पार्टी इतनी आशाओं के साथ चुनाव लड़ती है कि सरकार बना लेगी। हमारी लड़ाई हमारे द्वारा ही तय मानकों से है’। उनके मुताबिक जब ईवीएम का सच सामने आएगा तो आएगा, लेकिन लगातार हुई हार के कारणों को समझना होगा। कहीं न कहीं लोगों के बीच हम अपना संदेश और काम पहुंचा नहीं पाए। हालांकि भारती पार्टी की राष्ट्रीय महत्त्वाकांक्षा को नकार नहीं पाते हैं। उनका कहना है, ‘देश के अंदर मोदी के विकल्प की बात होती है तो अरविंद केजरीवाल का ही नाम सामने आता है’। सवाल यह है कि निकाय से लेकर क्षेत्रीय चुनावों में लगातार मुंह की खा रही पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच जो राष्टÑीय स्तर की महत्त्वाकांक्षा के बीज बोए हैं उस पर क्या रणनीति अपनाई जाएगी। शायद पूर्व ‘आप’ नेता मयंक गांधी का एक खुले पत्र के माध्यम से केजरीवाल को दी गई सलाह यहां काम करे।

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First Published on April 29, 2017 1:53 am

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