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जानिए धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलने वाला, 19 लाख रुपये सालाना पैकेज वाला इंजीनियर कैसे बना आतंकी?

मंसूर ने पुणे स्थित आजम कैम्पस में कुरान फाउंडेशन में अरबी पढ़ने के लिए प्रवेश लिया तो उसका परिचय आसिफ बशीरुद्दीन शेख और अनीक़ शफीक़ सैयद से हुआ।
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

कोई पढ़ा-लिखा प्रतिभाशाली नौजवान आतंकवादी कैसे बन जाता है? आखिरकार उच्च और आधुनिक वैज्ञानिक शिक्षा प्राप्त कोई नौजवान मजहबी कट्टरपंथियों के बहकाने में कैसे आ जाता है? इन्हीं सवालों का जवाब देती है एस हुसैन जेदी और बृजेश सिंह की नई किताब “डेंजरस माइंड” जिसमें मंसूर पीरभाई नामक नौजवान के आतंकवादी बनने की दास्तान है। मंसूर पीरभाई आतंकी संगठन इंडियन मुजाहिद्दीन के मीडिया सेल का प्रमुख था। पुणे का रहने वाला मंसूर पीरभाई कॉन्वेट स्कूल में पढ़ा था। वो धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलता था। वो 12वीं में 98 प्रतिशत और 10वीं में 93 प्रतिशतों अंकों के साथ पास हुआ था। उसने पुणे के विश्वकर्मा इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से इंजीनियरिंग की।उसका एक भाई शाहिद ब्रिटेन में डॉक्टर है। दूसरा भाई आदिल आर्किटेक्ट है।  जब मंसूर इंडियन मुजाहिद्दीन (आईएम) से जुड़ा तो उसका तीसरा भाई आलिम अभी छात्र ही था। उसके पिता भारतीय सेना के दक्षिणी कमान को किराना का सामान आपूर्ति करते थे। उसकी मां स्कूल टीचर थीं। उसकी पत्नी होमियोपैथी की डॉक्टर थीं। उसके ससुर महाराष्ट्र सरकार में मझोले स्तर के सरकारी अधिकारी थे। तीन बच्चों के पिता मंसूर के पड़ोसी उसे मिलनसार और मधुर व्यवहार वाले युव के तौर पर याद करते हैं। आतंकी बनने से पहले वो याहू में बतौर प्रिंसिपल इंजीनियर काम करता था। उसकी तनख्वाह 19 लाख रुपये सालाना थी।

मंसूर ने पुणे स्थित आजम कैम्पस में कुरान फाउंडेशन में अरबी पढ़ने के लिए प्रवेश लिया तो उसका परिचय आसिफ बशीरुद्दीन शेख और अनीक़ शफीक़ सैयद से हुआ। ये दोनों इंडियन मुजाहिद्दीन के लिए नए सदस्य भर्ती करवाने के लिए नौजवानों की शिनाख्त करते थे। ये दोनों ऐसे युवाओ को शिकार बनाते थे जिसका मजहब-दीन के बारे में रुझान हो। ये दोनों ऐसे नौजवानों को दीन-धर्म की बातचीत के बहाने मुसलमानों पर हो रहे “अत्याचार” की कहानियां सुनाते थे और फिर धीरे-धीरे उन्हें इस्लाम और मुसलमानों के बचाने के लिए “जिहाद” का रास्ता अपनाने के लिए प्रेरित करते थे। आसिफ और अनीक़ का कर्नाटक के भटकल के रहने वाले इकबाल भटकल से करीबी तालुक्कात थे। दोनों ने भटकल को मंसूर के बारे में बताया। आसिफ, अनीक और इकबाल दो साल तक मंसूर के दिमाग में “जिहाद” का बारूद भरते रहे। जब उन्हें यकीन हो गया कि मंसूर आतंकवादी संगठन इंडियन मुजाहिद्दीन में भर्ती होने के लिए पूरी तरह तैयार हो गया है तो उन्होंने उसे एहतकाफ़ के लिए तैयार किया। एहतकाफ़ के दौरान रमजान के महीने में रोजेदार एक महीने तक मस्जिद में रहकर इबादत करता है और आखिरी दिन बाहर आता है।

जब मंसूर अहतकाफ के बाद मस्जिद से बाहर आया तो आसिफ और अनीक ने उसे मजहबी खुतबे के तौर दुनिया में मुसलमानों पर हो रहे जुल्मों-सितम का हवाला देते हुए जिहाद की जरूरत पर जोर दिया। आसिफ और अनीक ने गुजारत दंगों का खास तौर पर हवाला देते हुए मंसूर से कहा कि इसके खिलाफ जिहाद की एकमात्र रास्ता है। आसिफ और अनीक ने भांप लिया कि मंसूर उनकी बातों से मुतमईन हो रहा है। आसिफ और अनीक ने रियाज भटकल और इकबाल भटकल को इस बारे में सूचना दी। भटकल बंधुओं ने दोनों के इस प्रतिभाशाली नौजवानों के साथ पूरी एहतियात से पेश आने के लिए कहा ताकि वो उनके हाथ से फिसल न जाए। जनवरी 2007 में भटकल बंधुओं और आईएम के अन्य सदस्यों की मंसूर से मुलाकात कराई गई। ये मुलाकात आसिफ के पुणे स्थिति आवास पर हुई। बैठक में आसिफ, अनीक, भटकल बंधुओं के अलावा माजिद शेख, अब्दुल्लाह और अकबर चौधरी शामिल थे।

इस बैठक में रियाज भटकल ने गुजराती मुसलमानों पर हुए जुल्मों का बदला लेने के लिए जिहाद की जरूरत पर एक बार फिर से जोर दिया। भटकल ने मंसूर को यकीन दिलाया कि उसकी टेक्नोलॉजी में महारत जिहादी ग्रुप के बहुत काम आएगी। मंसूर आखिरकार उनके ग्रुप में शामिल होने को तैयार हो गया इसके बाद भटकल ने कुरान की एक आयत पढ़ी जिसमें जिहाद हर मुसलमान का फर्ज बताया गया है। रियाज भटकल ने मंसूर को सबसे पहला काम अपने संदेशों के एनक्रिप्शन का सौंपा ताकि उनकी बातचीत सुरक्षा एजेंसियां न पढ़ सकें। इसके बाद इस समूह की मुलाकातें और ज्यादा होने लगीं। वो इराक, फिलस्तीन, भारत समेत दुनिया के तमाम मुल्कों के मुसलमानों की “बदहाली” पर चर्चा करते थे।

मंसूर आईएम के लिए डिलीट किए हुए डेटा को रिकवर करने, इंटरनेट का प्रयोग सुरक्षित बनाने और इन कामों के लिए उचित सॉफ्टवेयर चुनने और इन्स्टाल करने का काम करता था। रियाज ने एक हार्ड डिस्क खरीदकर उस पर मंसूर से प्रयोग करवाया कि डिलीट किया हुआ डेटा सुरक्षा एजेंसियां किस हद तक वापस हासिल कर सकती हैं। मंसूर ने रियाज को इंटरनेट पर बातचीत के लिए प्रॉक्सी सर्वर का इस्तेमाल करना सिखाया। मई 2007 में हैदराबाद स्थिति ई2-लैब्स नामक साइबर सिक्योरिटी कंपनी ने विश्व स्तरीय कंपनी ज़ोन-एच के साथ मिलकर छह दिन का हैकिंग कोर्स शुरू किया। इस कोर्स की फीस एक लाख रुपये थी।  कोर्स की फीस काफी ज्यादा थी। आईएम के साथियों ने मंसूर की मदद में असमर्थता जाहिर कर दी। मंसूर ने कोर्स के आयोजकों से रियायत की मांग की जो उसे मिल गयी। वो केवल 70 हजार रुपये देकर 14 मई से 19 मई 2007 कोर्स में शामिल हुआ। मंसूर ने कंपनी में निजी काम के बहाने छुट्टी ली। घरवालों से उसने कहा कि कंपनी उसे किसी काम से एक हफ्ते के  लिए हैदराबाद भेज रही है।

हैदराबाद जाते समय बस में मंसूर की मुलाकात मुबीन कादर शेख से हुई जो उसका पूर्वपरिचित था। मुबीन ने उसे बताया कि वो भी हैकिंग का कोर्स करने हैदराबाद जा रहा है। मुबीन पैसे की कमी के कारण आखिरकार कोर्स नहीं कर सका। हैकिंग कोर्स खत्म होने से एक दिन पहले 18 मई (शुक्रवार) को हैदराबाद की मक्का मस्जिद में बम धमाका हुआ जिसमें चार लोग मौके पर पांच लोग अस्पताल में मारे गए। धमाके के बाद दंगा भी भड़क गया। दंगा शांत कराने की कोशिश में पुलिस द्वारा चलाई गई लाठी-गोली से चार लोग मारे गए। कोर्स क्लास के बाद मंसूर मुबीन के साथ अस्तपाल जाकर घायलों से मिला। बेगुनाह मुसलमानों को दर्द से कराहते देखने के बाद आईएम में शामिल होने के मंसूर के फैसले पर एक तरह से आखिरी मुहर लग गई। उसके बाद उसने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा लेकिन उसका सफर लम्बा नहीं रहा। अक्टूबर 2008 में जब पुलिस ने 31 वर्षीय मंसूर को देश में हुई कई बम धमाकों में शामिल होने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया।

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