December 10, 2016

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करवा चौथ हो या तीज, शिवरात्रि, नवरात्रि…व्रत के मूल नियमों की सीमारेखा तोड़ रहे हैं उपवास

ऐसा ही बंटाधार हमने व्रत की समृद्ध अवधारणा का किया। व्रत, यानि संकल्प। संकल्प के साथ किया गया प्रत्येक कर्म व्रत कहलाता है।

Author October 19, 2016 18:18 pm
करवा चौथ की फाइल फोटो

भारतीय आध्यात्म की मीमांसा की जाये, तो इसके आग़ोश में किसी विकसित और तकनीकी रूप से समृद्ध समाज के सूत्र छिपे नज़र आते हैं। अगर आध्यात्मिक विकास के सफ़र को दो भागों में बांट दिया जाये, तो इसका पहला हिस्सा तो पूर्णत: वैज्ञानिक नज़र आता है। पर उत्तरार्ध उतना ही ज़्यादा अवैज्ञानिक। आध्यात्मिक मान्यतायें बाहरी मस्तिष्क को अधिक महत्व न देकर अंत:करण (जो मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार के योग से बना है) पर नियंत्रण की बात कहती थीं, जिसकी तकनीकी पुष्टि हिन्दुओं के गणपति और जैन धर्म के जीतेन्द्र में परिलक्षित हुई।

गणपति ( गण+पति ) अर्थात् अपनी इंद्रियों और स्वयं पर नियंत्रण करने वाला। क्योंकि इंद्रियों पर क़ाबू करके अपनी मस्तिष्क की अप्रतिम क्षमता से रूबरू हुआ जा सकता है। जीतेन्द्र का भी कमोबेश यही अर्थ निकलता है। हम जिस दैविक ऊर्जा को गणपति कहते हैं, पहले उन्हें सुमुख के नाम से जाना जाता था। पर कालांतर में आध्यात्म का स्वरूप अनेक तरह के अतार्किक और अवैज्ञानिक मान्यताओं में उलझ गया।

वीडियो: देखें देश भर में किस तरह मनाया जा रहा है करवा चौथ-

हमारे आन्तरिक सात चक्रों को नियंत्रण करने वाली हमारी स्वयं की नौ आन्तरिक ऊर्जाओं को हमने बदलते वक़्त के साथ मिट्टी की देवी में तब्दील करके पंडालों में बिठा दिया, और बाह्य मस्तिष्क से नौ गुने शक्तिशाली अचेतन मन को जागृत करने वाले, अपनी नौ गुना ज़्यादा शक्ति के पुनर्परिचय के पर्व नवरात्रि को नाचने गाने का पर्व बना दिया। फलस्वरूप हम महलों की समृद्ध विरासत के बावजूद शामियाने के स्तर पर लुढ़क गये।

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ऐसा ही बंटाधार हमने व्रत की समृद्ध अवधारणा का किया। व्रत, यानि संकल्प। संकल्प के साथ किया गया प्रत्येक कर्म व्रत कहलाता है। हमारे स्वयं के सकारात्मक आचरण से सुख, और नकारात्मक आचरण से हमें कष्ट प्राप्त होता है। जगत का हर व्यक्ति जीवन में आनन्द की प्राप्ति और अपने दु:खों का निराकरण तलाश करता है। मनुष्य की इसी प्रवृत्ति को पहचान कर मस्तिष्क के अधिकाधिक प्रयोग के लिये पूर्व के वैज्ञानिक, मनीषियों नें वेदों, पुराणों और स्मृतियों में आन्तरिक ऊर्जा के विकास के सूत्र प्रतिपादित किये। संकल्प यानि व्रत उसी आन्तरिक विस्तार की एक प्रक्रिया का हिस्सा थी।

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व्रत को नित्य/नियमित, नैमित्तिक और काम्य इन तीन खण्डों में विभक्त किया जा सकता है। सकारात्मक कर्म, सत्य संभाषण, मधुर वचन, मर्यादित आचरण, इंद्रियों पर नियंत्रण इत्यादि व्रत नित्य व्रत कहे जाते हैं। किसी विशेष निमित्त या जिनके नियमित करने की आवश्यकता नहीं है, नैमित्तिक व्रत में शुमार होते हैं। और कामना के लिये किया गया कर्म काम्य व्रत कहलाता है। वैदिक युग की अपेक्षा पौराणिक युग में व्रत का प्रसार अधिक हुआ। पौराणिक काल खण्ड में व्रत के नियम भी लचीले होते चले गये।

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ऋषि-मुनियों ने उत्तम जीवन के लिये मन और काया को स्वस्थ रखने पर बल दिया था। पतंजलि ने इसी तकनीकी विकास को तेज़ क़दम देते हुए प्राणायाम के सूत्र प्रतिपादित किये। और स्वस्थ रहने के लिये तत्कालीन स्वास्थ्य शास्त्रियों ने समय समय पर उपवास पर बल दिया। उन विशिष्ट तकनीक का प्रसार करने के लिये उन्होंने ने उन तकनीकी कर्मों, धार्मिक क्रिया-कलापों से बांध दिया, और आध्यात्मिक चोला पहना दिया। पर कालान्तर में पूर्ण ज्ञान के अभाव में उपवास को ही संकल्प यानि व्रत मान लिया गया। और उस उपवास में भी अतार्किक और अस्वास्थ्यकर भोजन की सेंध व्रत की मूल अवधारणा पर गहरा कुठाराघात थी। जो विषय का ज्ञाता नहीं था, वो भी व्रत के पवित्र प्रयोजन को अपनी मर्ज़ी से तोड़ता-मरोड़ता गया, और उसमें अपने भिन्न सूत्र जोड़ता चला गया।

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किसी महत्वपूर्ण कार्य या उपासना से पहले आलस्य से बचने और शारीरिक क्षमता में वृद्धि करने के लिये हल्का भोजन, फल-फूल और कुछ समय तक का उपवास अस्तित्व में आया। लेकिन जाने कब चुपके से इस पवित्र और वैज्ञानिक अवधारणा व्रत ने पेट भर कर खाने वाले या निराजल उपवास का स्वरूप ले लिया पता ही न चला। ये उपवास रूपी व्रत अपने प्रयोजन में सफल रहे या असफल इसका मूल्यांकन वैयक्तिक रूप से करने की ज़रूरत है, पर करवा चौथ, तीज, शिवरात्रि और नवरात्रि के उपवास सिर्फ़ कुछ सौ वर्ष से ज़्यादा पुरातन नहीं हैं, और ये अक्सर व्रत के मूल नियमों की सीमारेखा के बाहर अपना विस्तार करते हुए प्रतीत होते हैं।

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सद्गुरु आनंद जौहरी सद्गुरु आनंद जौहरी

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First Published on October 19, 2016 6:01 pm

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