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‘मेघदूत’ से उपग्रह तक…

500 ई. में लिखी गई वराहमिहिर की शास्त्रीय रचना ‘वृहत्संहिता’ इस बात का सबूत है कि उस समय भी लोगों को वायुमंडलीय संरचना का गहन ज्ञान था।
Author October 8, 2016 11:26 am
उपग्रह।

सातवीं सदी में कालिदास ने ‘मेघदूतम्’ की रचना की। कालिदास ने मध्य भारत में मानसून के बादलों के पथ का एक मौसम वैज्ञानिक की तरह पीछा किया है। भारत जैसे ऊष्णकटिबंधीय देश के लिए मौसम सभ्यता के शुरुआती चरण से ही अहम रहा है। इसलिए भारत में ऋतु-ज्ञान की चर्चा प्राचीनकाल की पुस्तकों में भी मिलती है। 3000 ईपू में लिखे गए उपनिषदों में बादलों के निर्माण पर चर्चा के साथ पृथ्वी और सूर्य की गति के कारण मौसम चक्र में बदलावों का जिक्र है। 500 ई. में लिखी गई वराहमिहिर की शास्त्रीय रचना ‘वृहत्संहिता’ इस बात का सबूत है कि उस समय भी लोगों को वायुमंडलीय संरचना का गहन ज्ञान था। प्राचीन पुस्तकों में इस बात का जिक्र है कि सूर्य की बदौलत ही बारिश होती है और अच्छी बारिश ही लोगों के जीवन का मूल है।

कौटिल्य के ‘अर्थशास्त्र’ में बारिश का वैज्ञानिक तरीके से वर्णन करने के साथ इस बात की भी जानकारी दी गई है कि इसका राज्य पर क्या असर हुआ या राज्य ने कम या ज्यादा बारिश के लिए कौन से उपाय अपनाए। ब्रितानी हुकूमत के दौरान भारत में विज्ञान की एक शाखा के तौर पर मौसम को देखा जाने लगा। सत्रहवीं सदी में थर्मामीटर और बैरोमीटर का आविष्कार हो चुका था। 1636 में ब्रितानी वैज्ञानिक हेली का भारतीय मानसूनी मौसम पर लेख प्रकाशित हुआ था। ब्रितानी हुकूमत ने भारतीय मौसम के अध्ययन के लिए कोलकाता (1785) और मद्रास (1796) वर्तमान चेन्नई में पहले मौसम केंद्र की स्थापना की जो दुनिया के सबसे पुराने मौसम केंद्रों में से एक हैं। कोलकाता में 1784 में बंगाल एशियाटिक सोसायटी की स्थापना हुई जिसने मौसम विज्ञान के अध्ययन को बढ़ावा दिया। इसके साथ ही प्रांतीय सरकारों ने विभिन्न क्षेत्रों में मौसम अध्ययन केंद्रों की स्थापना करवाई।

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1864 में कोलकाता को प्रलयंकारी चक्रवात का सामना करना पड़ा। इसके बाद 1866 और 1871 में मानसून के बादलों ने धोखा दिया। कुदरती मिजाज से तालमेल बिठाने के लिए 1875 में कोलकाता में पहले ‘भारतीय मौसम विज्ञान विभाग’ की स्थापना के साथ ही मौसम संबंधी सभी अध्ययन व क्रियाकलाप एक छतरी के नीचे आ गए। इसके साथ ही मौसम विभाग समय के साथ आधुनिक होता गया। 1954 में उड्डयन मौसम सेवा में रडारों का इस्तेमाल किया गया, 1957 में कोडाईकेनाल वेधशाला में प्रथम ओजोन मापों के बाद भारत में पर्यावरण मौसम विज्ञान की शुरुआत हुई। इसके बाद 90 के दशक में कंप्यूटर के जरिए आंकड़ों का संग्रहण शुरू करने के साथ 2000 में इंटरनेट से जुड़ाव ने मौसम विज्ञान को सशक्त बनाया। चेन्नई में डॉप्लर वेदर रडार (डीब्लूआर) की स्थापना के साथ चक्रवात की तीव्रता का अनुमान लगाना संभव हो पाया। अब तो मौसम विभाग कंप्यूटरों ओर जिओस्टेशनरी सेटेलाइट, आइएनएसएटी से भी लैस है। इसरो के उपग्रहों ने इसके हाथ और मजबूत किए हैं।

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