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बेबाक बोल: क्या मौसम है…

भारत जैसे ऊष्णकटिबंधीय देशों में आम तौर पर मौसम अस्थिर रहता है। पिछले कुछ समय से तकनीकी विकास के कारण वैज्ञानिकों के लिए बादलों के गरजने और बरसने की भविष्यवाणियां थोड़ी आसान हो गई हैं। हालांकि ऊष्णकटिबंधीय मौसम कई बार घंटों के हिसाब से करवट लेता है, जिस कारण इसका सटीक अनुमान बहुत आसान नहीं है। मौसम विभाग तो दावा कर रहा है कि वह सही सूचनाएं देकर ‘काटूर्न मुक्त’ हो रहा है लेकिन इन सूचनाओं का प्रबंधन और व्यवस्था के स्तर पर सरकारें कितना फायदा उठा पा रही हैं इसी पर बहस करता इस बार का बेबाक बोल।
(File Photo)

‘मौसम का मिजाज देख कर आएंगे’, या फिर ‘अगर मौसम ठीक रहा तो’। भारतीय मौसम तो हमेशा से आवारा मिजाज का रहा है। कब बारिश, कब धूप और कब बादल मालूम ही नहीं। लेकिन वक्त ने करवट ली। मौसम के बदलते मिजाज की खबर मौसम से पहले हमें है। अब सुबह घर से निकलते वक्त लोग अखबार में मौसम का कोना जरूर पढ़ते हैं। मोबाइल पर ‘मौसम अद्यतन’ सजग करता रहता है। सच है कि मौसम को परखने का यह मौसम भी अभी बदला है। वरना पहले तो अगर मौसम विभाग ने कह दिया कि बारिश होगी तो मतलब धूप और धूप कहा तो बारिश। व्यंग्य चित्रकार मौसम विभाग की भविष्यवाणियों पर अक्सर चुटीले तीर चलाते हैं तो लोग चौपाल या शहरी महफिलों में मजाक उड़ाते दिखते हैं।
पिछले लोकसभा चुनावों के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दुनिया में तेल की कम होती अंतरराष्ट्रीय कीमतों की वजह से खुद को किस्मतवाला कहा था! लेकिन उनकी चमकती किस्मत पर मानसून के कमजोर बादलों ने पानी फेर दिया। कई इलाकों में कमजोर बादलों की पुख्ता खबर के बाद भी सरकार ने मजबूत तैयारी नहीं की और आसमान छूती दाल की कीमतों के साथ बढ़ती महंगाई ने दिल्ली और बिहार में भाजपा की चुनावी फसल को बेतरह नुकसान पहुंचाया। कश्मीर से कन्याकुमारी तक फैले भारत की विडंबना यही है कि यहां की सत्तर फीसद आवाम को आज भी मौसम ही ‘किस्मतावाला’ बनाता है।

2013 में उत्तराखंड में आई कुदरती आपदा के बाद विशेषज्ञों ने कहा था कि मौसम की चेतावनी के बाद अगर सरकार समय पर आपदा प्रबंधन करती तो शायद इतने बड़े पैमाने पर जान-माल के नुकसान से बचा जा सकता था। लेकिन सरकारों की नींद आमतौर पर तब खुलती है जब ऐसी आपदाएं बहुत कुछ तबाह कर जाती हैं। कुछ समय पहले चेन्नई के साथ तमिलनाडु के कई इलाकों में आई बाढ़ ने जनजीवन को बंधक बना लिया था। उस तस्वीर से लेकर हाल में बारिश के बाद ‘गुरुग्राम का महाजाम’ अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बहस और शोध के केंद्र के रूप में देखा जाने लगा था। यानी भारत में अभी तक चेन्नई और नए-नए नामकरण वाले ‘गुरुग्राम’ जैसे हाइटेक शहर बारिश के सटीक पूर्वानुमान के बाद भी डूबने को मजबूर हो जाते हैं। दिल्ली में बारिश के बाद सड़क पर बदइंतजामी की बाढ़ से जूझ चुके अमेरिकी विदेश मंत्री ने देश की तकनीक के अगुआ आइआइटी में बैठे लोगों से पूछा था कि क्या आप लोग नाव से आए हैं? क्या यह केवल प्रकृति के उतार-चढ़ाव का नतीजा है? क्या यह शहरी नियोजन और व्यवस्था में लापरवाही से पैदा हुई अफसोसनाक तस्वीर नहीं है जो अमेरिकी विदेश मंत्री को यह तंज कसने का मौका देती है? यह किसकी लापरवाही है और किसने अपनी जिम्मेदारियां पूरी नहीं कीं?

बारिश को लेकर मौसम विभाग की सटीक चेतावनी के बाद भी दिल्ली और गुड़गांव सिर्फ बरसात के पानी से पैदा बाढ़ में डूबने पर मजबूर हो जाते हैं तो बिहार, उत्तर प्रदेश, असम, पश्चिम बंगाल के ग्रामीण इलाकों के बारे में क्या कहा जाए, जहां नदियों के पानी में उफान और उसका अपने किनारों को अपने दायरे में समेट लेना एक प्राकृतिक घटनाक्रम का नतीजा है। सूचना क्रांति के इस युग में सूचना को ही सबसे बड़ा हथियार माना गया। लेकिन हम सूचना हासिल करने के बाद प्रबंधन के स्तर पर हाथ पर हाथ धरे बैठे रह जाएं तो इस सूचना का क्या लाभ। हाल ही में बिहार में आई बाढ़ के बाद पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने बाढ़ के फायदों की बात कही तो खूब हंगामा बरपा। यह सही है कि नदियों की बाढ़ मिट्टी और खेती को नया जीवन देती है। अब यह सत्ता पर बैठे हुक्मरानों पर निर्भर करता है कि वे बाढ़ को वरदान बनाएं या फिर अभिशाप।

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पर अब वक्त आ गया है कि हम इसरो और अन्य वैज्ञानिक अनुसंधान केंद्रों को मजबूत बना कर इस बेचारगी के माहौल को खत्म करने की ओर कदम बढ़ाएं। इस साल बारिश के लगभग ठीक-ठाक पूर्वानुमान के बाद मौसम विभाग पहली बार शीतलहर के बारे में भी भविष्यवाणी करने की तैयारी कर रहा है। अंतरिक्ष में भेजे गए उपग्रहों की बदौलत पूरी तवक्को है कि ये पूर्वानुमान सही साबित होंगे। अब तो मौसम विभाग पर्यटन पूर्वानुमान, हाइवे पूर्वानुमान और पर्वतीय मौसम के लिए अलग से पूर्वानुमान जता रहा है। शोध संस्थाएं और वैज्ञानिक तो अपना काम कर रहे हैं, लेकिन विज्ञान से उपजे नए सच का सामना जनता से करवाने में हमारी सरकारें कितनी सक्षम हैं?

क्या हम यह उम्मीद करें कि सरकार शीतलहर से पहले उन लोगों के लिए ठंड से बचने का पूरा इंतजाम करेगी, जिनके सिर पर छत नहीं है, ताकि इन सर्दियों में हमें अखबारों में यह सुर्खियां न पढ़ने को मिलें कि अमुक जगह पर खुले आसमान के नीचे सोए ठंड से अनेक लोगों की जान गई। अगर इतनी सूचनाओं के बाद भी हम प्रबंधन के स्तर पर नहीं सुधरे तो हमें लिखना पड़ेगा कि फलां व्यक्ति की जान बारिश, ठंड या लू से नहीं, बल्कि सरकारी लापरवाही के कारण गई। अमेरिका और चीन जैसे देश भी मौसम के गुस्से का सामना करते हैं। लेकिन इन देशों में करवट लेता मौसम बड़ी संख्या में लोगों की मौतों का कारण नहीं बनता है, क्योंकि इन देशों की सरकारें मौसम की मार से बचने की पुख्ता तैयारी करती हैं।

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यह सच है कि संचार उपग्रहों के मामलों में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र (इसरो) अपनी क्षमता को अंतरिक्ष में साबित कर चुका है। आज के दौर में कुदरती आपदा प्रबंधन में उपग्रह कई बार अपनी क्षमता जाहिर कर चुके हैं। खासकर समुद्री इलाकों में खौफनाक तूफानों से हम इसके सहारे निपटने की कई बार सफल कोशिशें कर चुके हैं।

भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए आज यह फौरी जरूरत है कि इसरो जैसे केंद्र हर राज्य के पास हों। मौसम और खेती विज्ञान को लेकर शिक्षा और अनुसंधान को बढ़ावा मिले। मौसम का वृहत ही नहीं, सूक्ष्म और सटीक पूर्वानुमान भी लगाया जा सके। हरियाणा के गांव नीलाखेड़ी या तारावाडी के किसानों को पहले से पता चल जाए कि इस मानसून उनके खेतों को आसमान से कितना पानी मिलना है, बुआई का माकूल वक्त क्या हो या कब उनकी उम्मीदों की फसल पर आफत के ओले गिर सकते हैं।इसरो के अंतरिक्ष में भेजे उपग्रहों की बदौलत अब समुद्र और मौसम के अध्ययन में काफी मदद मिल रही है। लेकिन यह भी सच है कि उपग्रह सिर्फ सूचना दे सकता है। इस सूचना को खेती और आपदा प्रबंधन के लिए इस्तेमाल करना सरकार और व्यवस्था के हाथ में है। लालबहादुर शास्त्री ने आजाद भारत को आगे बढ़ाने के लिए ‘जय जवान’ और ‘जय किसान’ का नारा दिया था जिसमें आगे की सरकार ने विज्ञान को भी जोड़ा। लेकिन यह सिर्फ नारा ही बन कर रह गया। अगर आज भी हम जवान और किसान के साथ विज्ञान को जोड़ लें तो हमारा देश सीमा से लेकर खेतों की मिट्टी तक महफूज और मजबूत रहेगा।

 

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