December 06, 2016

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सुरजीत एस. भल्ला का ब्लॉग: नरेंद्र मोदी सरकार ने जमा काले धन पर तो वार किया, पर चुनौती नया ब्लैक मनी पैदा नहीं होने देने की है

नरेन्द्र मोदी सरकार को अगर काला धन पर लगाम लगाना है तो सबसे पहले उन्हें कई नीतियां बदलनी होंगी।

सी आर शशिकुमार द्वारा निर्मित प्रतीकात्मक चित्र

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मंगलवार (8 नवंबर) को घोषणा की थी कि 500 और 1000 के नोट 8 नवंबर की रात से प्रचलन से बाहर हो गए हैं। उसकी जगह 500 और 2000 के नए नोट जारी किए जाएंगे। 9 नवंबर को देशभर के सभी बैंकों और एटीएम को बंद रखा गया था। उसके बाद 10 नवंबर से बैंकों में पुराने 500 और 1000 के नोट बदले जा रहे हैं। ढाई लाख से ज्यादा की रकम जमा करने वालों पर निगरानी भी रखी जा रही है। इसे भ्रष्टाचार और काला धन के खिलाफ एक बड़ी लड़ाई की शुरुआत कहा जा सकता है। अगर यह सफल होता है तो इसे भारत में जीएसटी बिल और 1991 के आर्थिक सुधारों से भी एक बड़े सुधार के रूप में देखा जाएगा। हालांकि, इसकी राह इतनी आसान नहीं है क्योंकि इसमें बहुत किंतु-परंतु छिपे हैं। हालांकि, यह पिछले दिनों में जमा किए गए काला धन पर बहुत असरकारी साबित होने वाला है।

सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि काला धन है क्या? दरअसल, यह वह पैसा है जिसका टैक्स नहीं चुकाया गया है। काला धन कॉरपोरेट्स या वेतनभोगी कर्मचारियों द्वारा जमा नहीं होता है क्योंकि वो पहले से ही टैक्स के दायरे में होते हैं। काले धन का अधिकांश सृजन प्रोफेशनल्स द्वारा होता है। इनमें डॉक्टर, वकील, अकाउंटेन्ट्स वगैरह शामिल हैं। विजय केलकर की टास्क फोर्सेज ऑन डायरेक्ट टैक्सेज-2002 में इस कड़ी की गुमनाम चीजों को रेखांकित किया गया है।

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काले धन का अधिकांश हिस्सा सोना खरीद, फॉरेन एक्सचेंज खरीद और रियल एस्टेट में खर्च होता है। इसके अलावा विदेशों में किसी गुमनाम शख्स को पैसे भेजना काले धन पर रोक लगाने की दिशा में आजकल एक बड़ी समस्या बनकर उभरी है। सोने की खरीद भी अब आसानी से रडार पर आ रही है इसलिए ज्यादातर काला धन रियल एस्टेट में खर्च हो रहा है। अगर कोई वेतनभोगी व्यक्ति घर खरीदता है और बिल्डर को कुछ पैसे नकद देता है इसका मतलब उसे अपनी सफेद कमाई को काला धन में बदलना एक मजबूरी है। वही पैसा वह विक्रेता को देता है।

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नरेन्द्र मोदी सरकार को अगर काला धन पर लगाम लगाना है तो सबसे पहले उन्हें कई नीतियां बदलनी होंगी। सबसे पहले तो उन्हें आय कर की दरें घटानी चाहिए क्योंकि जो लोग कर नहीं देते हैं उनकी संख्या इससे घटेगी और वो टैक्स दे सकेंगे। दूसरी, सरकार को घरों की खरीद पर लगने वाले निरर्थक कर दरों में भी कटौती करनी चाहिए। इसके अलावा जमीन की खरीद-बिक्री के किसी भी स्तर पर स्टाम्प ड्यूटी नहीं लगनी चाहिए। यह उपनिवेशवाद की निशानी है और शायद यही वजह है कि कांग्रेस देश में जीएसटी नहीं ला सकी। तीसरा प्रोपर्टी की बिक्री पर कैपिटल गेन टैक्सेज को भी 10 फीसदी से नीचे घटाया जाना चाहिए। इस दिशा में इस बात का हमेशा ख्याल रखा जाना चाहिए कि सरकार को इस तरह के टैक्सेज से कितने राजस्व का फायदा होता है। साल 2013-14 में कैपिटल गेन टैक्सेज से करीब 8000 करोड़ रुपये प्राप्त हुए जो कुल डायरेक्ट टैक्स आमदनी (60 हजार करोड़ रुपये) का मात्र 12 फीसदी है।

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हालांकि, मैंने (केलकर समिति की 2002 और 2012 की रिपोर्ट) से सहमति जताते हुए कहा है टैक्सेशन में नैतिकता का कोई आधार नहीं होता है बल्कि उसकी जगह वैधानिक और कारगर तरीके से राजस्व सृजन पर ध्यान दिया जाना चाहिए। इसके साथ ही आम आदमी और गरीब आदमी के नाम पर अर्थव्यवस्था को बंधक बनाने की वकालत और कोशिशों को बंद किया जाना चाहिए, तभी मोदी सरकार बड़े पैमाने पर टैक्स सुधार की प्रक्रिया अपना सकती है। और जब बीजेपी ऐसा कर लेगी तभी उसे पवित्र गाय से जुड़े मुद्दों पर आक्रामक रुख अख्तियार करना चाहिए। अब इसकी नई शुरुआत हो चुकी है। अब वक्त उस सफर को पूरा करने का है।

(सुरजीत एस. भल्ला इंडियन एक्सप्रेस में कंट्रीब्यूटिंग एडिटर और न्यूयॉर्क स्थित ऑब्जर्वेटरी ग्रुप में सीनियर इंडिया एनालिस्ट हैं। इस लेख में प्रकाशित विचार उनके निजी विचार हैं।)

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First Published on November 12, 2016 11:54 am

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