April 23, 2017

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होली: स्वार्थ, जाति-पाति, ऊंच-नीच में बंटे लोगों के चेहरे पर नहीं चढ़ता अब कोई रंग

देश के पांच राज्यों के चुनाव नतीजे की वजह से चुनावी रंग में लोगबाग रंगे हैं मगर होली का रंग फीका है।

होली के रंग में सराबोर लोग।

“ढोला ढोल मजीरा बाजे रे काली छींट को घाघरो नजारा मारे रे…।”

“जोगीरा सा रा रा रा…….।”

होली के त्योहार की दस्तक इन गीतों के साथ ढाप की थाप और ढोलक और मजीरे की आवाज से 15 रोज पहले से ही सुनाई पड़ने लग जाती थी। बिहार में होली राजस्थान और बिहारी गीतों का मिश्रण आपसी भाई-चारे के रिश्ते को मजबूत करता था। लोग चाव से घरों से निकल इन टोलियों में गीतों को सुनते और घर में पकाया पकवान खिलाते और फिर रंग डालते। तब लगता होली है। जाने माने साहित्यकार शिव कुमार शिव, वरिष्ठ पत्रकार वृजेंद्र दूबे सरीखे लोग कहते हैं अब न वो लोग हैं, न वह माहौल। सिर्फ औपचारिकता ही रह गई है। बिहार के भागलपुर में तो होली त्यौहार को मित्र बसंत गोष्टी ने ही जीवंत बना रखा है। मारवाड़ी युवा मंच के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जगदीश चंद्र मिश्र पप्पू बताते हैं कि यह परंपरा बुजर्गों ने 57 साल पहले शुरू की थी। इन बुजुर्गों ने यह भार आगे चलकर नौजवानों को सौंपा जिसका निर्वाह बखूबी और तन्मयता से ये कर रहे हैं। शायद इसकी नींव रखने वालों में एक कवि हृदय रमेश मिश्र अंगार आखिरी कील बचे हैं जो संस्था के संरक्षक हैं। तकरीबन 92 साल की उम्र में भी होली आते ही वे तरो-ताजा हो मारवाड़ी पाठशाला के पंडाल को सुशोभित करते हैं। अबकी भी 11 मार्च को आयोजन है और तब लोगों को इनकी गुनगुनाती आवाज सुनने को मिलेगी।

यह ऐसा मंच है जहां राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर, बालकवि वैरागी, शरद जोशी, रामरिख मनहर, काका हाथरसी, गोपाल व्यास, ओमप्रकाश आदित्य, जैमनी हरियाणवी, गोपाल दास नीरज, हुल्लड़ मुरादावादी जैसे नामचीन कवियों ने अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है। सुरेंद्र शर्मा, हरिओम पवार, प्रभा ठाकुर, गोविन्द व्यास, अशोक चक्रधर सरीखे लोगों ने तो हाल तक आकर कविता का रसपान कराया। अब इनकी जगह राष्ट्रीय स्तर के युवा कवियों ने ले ली है। बिहार का भागलपुर शहर रंग और सांस्कृतिक भूमि रही है। गुरुवार को ही मुशायरा का एक कार्यक्रम हुआ जिसमें देश के जाने माने शायर वसीम बरेलवी, मुनव्वर राणा, नवाज देबवंदी और अनवर जलालपुरी देश के विभिन्न शहरों से आए। यह अलग बात है कि आयोजन अपने आप में सिमटा सा था। मगर जिसने भी सुना उसी ने वाह-वाह कहा।

देश के पांच राज्यों के चुनाव नतीजे की वजह से चुनावी रंग में लोगबाग रंगे हैं मगर होली का रंग फीका है। दूसरे शहरों में काम करने वालों का अपने घर होली पर जाना मायने रखता है। ख़ास कर वैसों के लिए जिन्होंने परिवार को अपने पैतृक घर या गाँव में ही छोड़ रखा है। चाहे वे राजस्थान के हों या बिहार, बंगाल या मुंबई में हो। वे घर जरूर जाना चाहते हैं। कलकत्ता, दिल्ली और मुंबई शहरों में ढप पर पहले से ही कानों में आवाज आती “संदेशों आगो रे महाजन म्हणे छुट्टी दे दे रे…..।” ऐसे गीत सुन महाजन समझ जाते होली आ गई है। गुमास्तों के घर जाने की ललक पैदा हो गई है। महाजन छुट्टी तो देते ही घर परिवार के लोगों के वास्ते सौगात भी देते। इससे ये गदगद होकर अपने घरों को जाते और त्यौहार मना वापस महाजन के काम पर हाजिर होते। यह एक रिश्ता था।

अब जमाना मतलब और स्वार्थ का आ गया है। स्वार्थ, जाति-पाति, कौम, ऊंच-नीच में बंटे लोगों के चेहरे के रंग यूँ ही उड़े हैं। वैसों को होली के रंग में रंगना मुश्किल है। राजस्थान के नवलगढ़ और लक्ष्मणगढ़ शहर में देखा कि लोग बैंड बाजे लेकर अपने मित्रों और रिश्तेदारों के यहां टोली बना जाते हैं और उन्हें बारी-बारी से घरों से निकाल रंग गुलाल लगा होली का गीत गाते मस्ती करते हैं। माहौल तो बिहार में भी है लेकिन मुठ्ठी भर लोगों की वजह से आपसी भाई चारे में दरार आ गयी है। बुजुर्ग मुकुटधारी अग्रवाल ने फेसबुक के अपनी वाल पर होली के मौके पर भाईचारे को लेकर गहरी चिंता जताई है। पर जाहिर है इन त्योहारों को भी राजनीति ने डंस लिया है। अब न वैसे लोग हैं, न वैसा माहौल। यही सोच लोग घरों में दुबके अपने को सुरक्षित महसूस कर रहे हैं। पर्व अब औपचारिकता भर है।

वीडियो देखिए- मथुरा, बरसाना में शुरु हुआ होली का उत्सव

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First Published on March 10, 2017 6:18 pm

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