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अखबार-किताब पढ़ने की फुर्सत नहीं लेकिन फेसबुक-वाह्टसप को चट करने की आदत बढ़ी

सोशल मीडिया के आने के बाद से हर व्यक्ति अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पूरा पूरा उपयोग करते हुए अपनेआप को लेखक समझता जा रहा है।
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है। (Photo- Indian express Archives)

डॉ. शुभ्रता मिश्रा

बच्चों और युवाओं के बीच पढ़ने की प्रवृत्ति और अधिकाधिक पुस्तकों के प्रकाशन द्वारा विश्व की बौद्धिक संपत्ति को बढ़ावा देने के उद्देश्य से यूनेस्को द्वारा 1995 से 23 अप्रैल को विश्व पुस्तक दिवस के तौर पर मनाए जाने की परम्परा शुरू की गई है। वास्तव में यह दिवस विश्व स्तर पर भारत सहित दुनिया के अनेक देशों में उत्सव के रूप में मनाया जाता है। निःसंदेह सुनने में यह सब बहुत अच्छा लगता है। पूरे विश्व का तो नहीं कह सकते परन्तु अपने भारत में जमीनी तौर पर यह सच है कि आजकल हर जगह बढ़ रहे कम्प्यूटरीकरण और डिजीटलीकरण ने बच्चों और युवाओं की मानसिकता को भी मशीनीकृत बना दिया है। पुस्तकों और पुस्तकालयों के डिजिटलीकरण के कारण बहुत से युवाओं द्वारा पुस्तकों को उनके पुस्तकीय स्वरूप में हाथों से पकड़ने और पढ़ने की प्रवृत्ति को किसी उबाऊ समझे जाने वाले काम की श्रेणी में माना जाने लगा है।

वैसे भी पढ़ना, अध्ययन करना और किताबों की दुनिया की सैर आरम्भ से ही बहुत कम लोगों को पसंद रहा है। महत्वपूर्णं बातों के बारे में जानने के लिये उनमें जिज्ञासा उत्पन्न करने के साथ ही पढ़ने की आदत के लिये बच्चों और युवाओं को प्रोत्साहित करने के तरह-तरह के तरीके अपनाए जाते रहे हैं। श्रुतियों से लेकर चित्र कहानियों, कॉमिक्स पुस्तकों और वर्तमान के कम्प्यूटरीकृत वेब पुस्तकों की दुनिया तक किताबों के स्वरूपों में बहुत बदलाव हुए हैं। पढ़ना और अध्ययन दोनों में अंतर है। विश्व पुस्तक दिवस को मनाए जाने के पीछे सिर्फ पढ़ने की प्रवृत्ति को प्रेरित करना है, क्योंकि जब पढ़ेंगे तब कहीं जाकर अध्ययन की सीमा तक पहुंचेगे। आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में अखबारों को उठाकर पढ़ने का समय लोगों के पास नहीं है, शेष बचे समय में वाटसेप पर मिल रहीं चटपटी से लेकर जरुरी खबरों तक को लोग पढ़ लेते हैं, काफी है।

वैसे एक बात नोटिस करने की है कि सोशल मीडिया के आने के बाद से लोगों में पढ़ने की प्रवृति में इजाफा हुआ है। इसका कारण मशीनी सरलता है। इसमें कागज पैन उठाकर लिखना नहीं पड़ता ज्यादा से ज्यादा कॉपी पेस्ट करना पड़ता है और पढ़ने का पढ़ना भी हो जाता है। पढ़ने की इस तरह की बढ़ती प्रवृत्ति के चलते किताबें फिर भी कहीं न कहीं पीछे रह जाती हैं। पाठक के स्तर पर किताबों की इस दशा के लिए सिर्फ पाठकों को ही उत्तरदायी माना जा सकता है। लेकिन किताबों के चलन में बढ़ोत्तरी के लिए लेखकों और प्रकाशकों की भूमिका सबसे अधिक मायने रखती है। सामान्य लेखकों की क्या स्थिति है ये वे ही जानते हैं, क्योंकि किताबों के व्यावसायीकरण ने उनकी अध्ययनी उपादेयता को बहुत गिरा दिया है। हकीकत यह है कि पैसा है, तो किताबें हैं। आजकल कोई भी रुपया देकर किताबें छपवा सकता है। विषयों और प्रकाशकों का अम्बार लगा हुआ है और उसके सापेक्ष लेखकों की भरमार भी कुछ कम नहीं है।

सोशल मीडिया के आने के बाद से हर व्यक्ति अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पूरा पूरा उपयोग करते हुए अपनेआप को लेखक समझता जा रहा है। लेखन की कसौटियां किसी पोस्ट के शेयर होने और लाइकिंग की संख्या पर निर्भर होने लगी हैं। जिस विषय को एक प्रबुद्ध लेखक राष्ट्रहित और समाजोपयोगी समझकर लिखता है, सम्भव है उसे शेयर और लाइकिंग के पैमानों पर बिल्कुल अंक प्राप्त ही न हों। लीजिए हो गया उसका लेखन असफल, शायद वह आगे कभी लिखे भी न या फिर उसके लेखन की मौलिकता उस ओर पसरने लगे जहां शेयरिंग ज्यादा मिलेगी और शायद शोहरत भी क्योंकि लेखन में इन दिनों एक बात और सामने आने लगी है कि लेखन का पारिश्रमिक लेखकों को मिलना विशेषरुप से गैरअँग्रेजी लेखकों को मिलना नामुमकिन है। वैसे भी निराला और प्रेमचंद जैसे हमारे मूर्धन्य लेखकों के समय से ही लेखन पारिश्रमिक की क्या दशा रही है, इससे सभी परिचित हैं। जब हमारे देश में उन श्रद्धेयों की ये हालत थी तो आज के लेखकों की क्या बिसात कि वे अपने लेखन के बदले पारिश्रमिक की बात भी उठाएं। ऐसे ढेरों लेखक हैं जो बिना पारिश्रमिक के मिल जाएंगे और ऐसे ढेरों लेखकों की संख्या भी कम नहीं हैं जो अपने कुछ भी लिखे को प्रकाशित करवाकर उसे बिकवाने की भी समृद्धता रखते हैं। अब बचते हैं वो जो लिखते हैं, स्तरीय लिखते हैं, पर बौद्धिक समृद्धि वाले आर्थिक विपन्नों की श्रेणी में आते हैं। ये वे लेखक हैं जो बहुत किताबें लिखने की सामर्थ्य तो रखते हैं, पर उनका लेखन मात्र पाण्डुलिपियों में जीवाश्मीकृत होकर रह जाता है।

मैं यह बिल्कुल नहीं कहूंगी कि आवश्यकता किस बात की है, क्योंकि यह कहना उन लेखकों की दुर्दशा का परिहास करने के पाप के बराबर है, क्योंकि यह लेखन की वो गहरी पीड़ा है, जो विश्व पुस्तक दिवस नहीं मना सकती, जो डिजीटलीकरण और कम्प्यूटरीकरण की दौड़ के साथ नहीं भाग सकती, शायद विशुद्ध लेखन पाण्डुलिपीकरण से आगे कभी बढ़ नहीं सकता। किसी लेखक का कथन याद आ रहा है कि भारत में लेखकों की पाण्डुलिपियां उन अविवाहित बेटियों की तरह होती हैं, जिन्हें समाज में सम्भालकर रखने के अलावा लेखक और कुछ नहीं कर पाता। दुनिया भले ही विश्व पुस्तक दिवस मनाती हो, पर भारत की पुस्तकीय दुनिया में अविवाहित पाण्डुलिपियों की सिसकियां अभी भी शेयरों और लाइकिंगों की कसौटियों से बहुत पीछे हैं।

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