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कर्पूरी ठाकुर जयंती: देशी माटी में जन्मे देशी मिजाज के राजनेता थे जिन्हें न पद का लोभ था, न उसकी लालसा

कर्पूरी ठाकुर का संसदीय जीवन सत्ता से ओत-प्रोत कम ही रहा। उन्होंने अधिकांश समय तक विपक्ष की राजनीति की।
दो बार मुख्यमंत्री रहे कर्पूरी ठाकुर जब 1977 में लोकसभा का चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचे थे, तब उन्होंने अपने संबोधन में कहा था-संसद के विशेषाधिकार कायम रहें, लेकिन जनता के अधिकार भी।

डॉ. नवल किशोर राय 

आज जब संसदीय परंपराओं से इतर संसद और विधान सभाओं को अंधेरे में रखकर सरकारें लोकनीति से जुड़े मुद्दों पर बंद कमरों में फैसले लेती हैं, अध्यादेश लाती हैं और विपक्ष लगातार पूरे संसदीय सत्र को हंगामें की भेंट चढ़ा देता है, तब जननायक कर्पूरी ठाकुर की विचारधारा और अधिक प्रासंगिक हो जाती है। उनका मानना था कि संसदीय परंपरा और संसदीय जीवन राजनीति की पूंजी होती है जिसे हर हाल में निभाया जाना चाहिए। उनकी चिंता के केंद्र में हमेशा गरीब, पिछड़े, अति पिछड़े और समाज के शोषित-पीड़ित-प्रताड़ित लोग रहे हैं। और शायद यही वजह रही है कि उनकी समस्याओं के निराकरण के लिए कर्पूरी ठाकुर ने सदैव लोकतांत्रिक प्रणालियों का सहारा लिया। मसलन, उन्होंने प्रश्न काल, ध्यानाकर्षण, शून्य काल, कार्य स्थगन, निवेदन, वाद-विवाद, संकल्प आदि सभी संसदीय विधानों-प्रावधानों का इस्तेमाल जनहित में किया। उनका मानना था कि लोकतंत्र के मंदिर में ही जनता-जनार्दन से जुड़े अहम मुद्दों पर फैसले लिए जाएं।

दो बार मुख्यमंत्री रहे कर्पूरी ठाकुर जब 1977 में लोकसभा का चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचे थे, तब उन्होंने अपने संबोधन में कहा था-‘संसद के विशेषाधिकार कायम रहें, लेकिन जनता के अधिकार भी। यदि जनता के अधिकार कुचले जायेंगे तो एक न एक दिन जनता संसद के विशेषाधिकारों को चुनौती देगी।’ आज की स्थितियां कमोबेश यही हैं। सरकारें जनहित को हाशिए पर धकेल चंद लोगों की भलाई और चंद लोगों की सलाह पर जनविरोधी फैसले लेने लगी हैं। नोटबंदी भी ऐसे फैसलों का एक उदाहरण हो सकता है। हालांकि, इसके निमित्त हर राजनीतिक दल अपने-अपने तर्क गढ़ रहे हैं और वे सभी इसके लिए स्वतंत्र हैं लेकिन व्यापक स्तर पर देखा जाय तो इसे भी संसदीय परंपरा को धुमिल करने का एक कुत्सित प्रयास कहना अनुचित नहीं होगा।

प्रमुख समाजवादी चिंतक राम मनोहर लोहिया कहा करते थे कि मेरे पास कुछ नहीं है, सिवा इसके कि इस देश का साधारण आदमी समझता है कि मैं उनका अपना आदमी हूं। आज नेता और जनता के बीच का वह अपनापन कहीं नहीं दिखता। न तो लोहिया और चौधरी चरण सिंह के चेलों की राजनीति में, न ही जयप्रकाश नारायण और कर्पूरी ठाकुर की विरासत संभाल रहे नेताओं में और न ही दीनदयाल उपाध्याय, श्यामा प्रसाद मुखर्जी और हेडगेवार की वैचारिक परंपरा के वाहक और अटल-आडवाणी के चेलों की राजनीतिक कार्यप्रणाली में। कहना न होगा कि सभी विचारधारा की राजनीति में आज जन मानस के लिए लोक कल्याण की राजनीति कुंद हो गई है। सभी दलों के नेता जनता को सिर्फ मतदाता समझने की भूल कर रहे हैं। अगर इस पर तुरंत लगाम नहीं लगाया गया और राजनेताओं ने भूल नहीं सुधारी तो इसका खामियाजा संसदीय मूल्यों को लंबे समय तक भुगतना पड़ सकता है।

कर्पूरी ठाकुर का संसदीय जीवन सत्ता से ओत-प्रोत कम ही रहा। उन्होंने अधिकांश समय तक विपक्ष की राजनीति की। बावजूद उनकी जड़ें जनता-जनार्दन के बीच गहरी थीं। तब संचार के इतने सशक्त माध्यम नहीं थे। बावजूद इसके कोई घटना होने पर वह सबसे पहले उनके बीच पहुंचते थे। यह जनता के बीच उनकी गहरी पैठ और आपसी सामंजस्य का प्रतिफलन था। वो हमेशा जनता की बेहतरी के लिए प्रयत्नशील रहे। जब उन्होंने 1977 में पहली बार मुख्यमंत्री का पद संभाला था तब उन्होंने बिहार में शिक्षा व्यवस्था को सुधारने के लिए कई उपाय किए। वो जानते थे कि समाज को बिना शिक्षित किए उनकी कोशिश रंग नहीं ला सकेगी। नाई जाति में पैदा होकर भी कर्पूरी ठाकुर कभी एक जाति, समुदाय के नेता नहीं रहे। वो सर्वजन के नेता थे। पक्ष, विपक्ष से जुड़े सभी लोग उनकी राजनीतिक शूचिता और दूरदर्शिता के कायल थे। उन्होंने उस वक्त आरक्षण का गजट निकाला था। अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के अलावा उन्होंने अगड़ी जाति के गरीब लोगों और हरेक वर्ग की महिलाओं को तीन-तीन फीसदी आरक्षण देने की वकालत की थी।

कहना न होगा कि एक गरीब परिवार में जन्में विचारों के धनी कर्पूरी ठाकुर ने जिस राजनीतिक दूरदर्शिता का परिचय आज से करीब 40 साल पहले दिया था वो देश के लिए आज भी प्रासंगिक बने हुए हैं। उन्होंने देशी और मातृभाषा को बढ़ावा देने के लिए तब की शिक्षा नीति में बदलाव किया था। वो भाषा को रोजी-रोटी से जोड़कर देखते थे। देश आज भी नई शिक्षा नीति की बाट जोह रहा है। उन्होंने गरीबों और भूमिहीनों के खातिर भूमि सुधार लागू करने की बात कही थी जो आज भी लंबित है। वो जानते थे कि इससे न केवल सामाजिक विषमता दूर होगी बल्कि कृषि उत्पादन में भी आशातीत बढ़ोत्तरी होगी। देश में आज भी भूमि अधिग्रहण पर एक मुकम्मल कानून बनाने में सरकारों को पसीने छूट रहे हैं क्योंकि वे जनमानस की जगह कॉरपोरेट घरानों से प्रेरित हो रही हैं। कुल मिलाकर कहें तो कर्पूरी ठाकुर देशी माटी में जन्मे देशी मिजाज के राजनेता थे जिन्हें न पद का लोभ था, न उसकी लालसा और जब कुर्सी मिली भी तो उन्होंने कभी उसका न तो धौंस दिखाया और न ही उसका तामझाम। मुख्यमंत्री रहते हुए सार्वजनिक जीवन में ऐसे कई उदाहरण हैं जब उन्होंने कई मौकों पर सादगी की अनूठी मिसाल पेश की। भारतीय राजनीति में ऐसे विलक्षण राजनेता कम ही मिलते हैं। शायद इसीलिए कर्पूरी ठाकुर को सिर्फ नायक नहीं अपितु जननायक कहा गया।

(लेखक पूर्व सांसद हैं और जननायक कर्पूरी ठाकुर विचार केंद्र, बिहार के केंद्रीय अध्‍यक्ष हैं।) 

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