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पटाखों पर बैन: सुप्रीम कोर्ट के इस न्याय को क्या नाम दें?

यह अवश्य है कि इनके चयनात्मक प्रतिबंधों से देश के माहौल पर प्रतिकूल प्रभाव अवश्य पड़ जाता है। कहीं खून की दुहाई, तो कहीं जलप्रदूषण के मुद्दे परोक्ष-अपरोक्ष रुप से उछलने लगते हैं।
सोमवार (9 अक्टूबर) को पुरानी दिल्ली में जामा मस्जिद के पास पटाखा खरीदते लोग (फोटो-पीटीआई)

डॉ. शुभ्रता मिश्रा।

पिछले अनेक वर्षों से हमारे देश में आतिशबाजी और पटाखे चलाने का प्रचलन प्रायः हर खुशी के मौके पर दिखाई देने लगा है। यानी पटाखे अब सिर्फ दीवाली के त्योहार तक सीमित नहीं रह गए हैं, बल्कि सीमाएं तोड़कर हर त्योहार का अंग बन गए हैं। लेकिन हर बार पटाखों से पर्यावरण प्रदूषित होने का ठीकरा दीपावली के सिर पर ही फूटता है। ऐसा ही कुछ फिर हो गया है और देश में धार्मिक संवेदनाएं कहीं सुबकने लगी हैं तो कहीं वाकयुद्धों में बदलने लगी हैं। पर्यावरणविद् बेहद खुश हैं, उन्हें होना भी चाहिए क्योंकि पर्यावरण प्रदूषण रोकने की उनकी मुहिम पर कानूनी वार जो पड़ गया है, वे अपने प्रयासों के सुखद परिणामों से प्रसन्न होने के पूर्ण अधिकारी हैं। लेकिन उन आमजनों की संवेदनाओं को कौन तसल्ली देगा जो कहीं न कहीं न्याय की पारदर्शिता में भी चयनात्मक प्रवृत्ति की रेखा को देख पा रहे हैं। रोक पटाखों की बिक्री पर हो और चलाने पर न हो, या कि बात दीवाली के महज दो दिनों में वायुगुणवत्ता के सुनिश्चित परिणामों वाले परीक्षणों की हो, हर हाल में रौनक दीपावली की ही फीकी होनी है। असमानता बहुत पीड़ा दे जाती है, वो किसी भी स्तर की हो। इसी असमानता को भारत संवैधानिक तौर पर समान करने के असफल प्रयास करता आ रहा है। अब पटाखों ने पर्वस्तरीय असमानता का जो नया राग छेड़ दिया, उससे एक बार फिर देश आरोपों-प्रत्यारोपों के वादविवादों में पड़ गया है।

कितना अच्छा होता कि पटाखों को जड़ से ही हटा दिया जाए, एक चयनात्मक पर्व और स्थान विशेष की बजाय पूरी तरह से पटाखों और आतिशबाजियों पर सम्पूर्ण देश में ही रोक लगा दी जाए। न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी। क्योंकि ये तो सबको सीधा सीधा समझ में आता है कि पर्यावरण प्रदूषण में किन किन कारकों का कितने प्रतिशत हाथ है और उनमें इन बेचारे पटाखों का कितना योगदान है। लेकिन कमजोरों को डंडे झेलने ही पड़ते हैं, ये प्राकृतिक सच है। पटाखे पर्यावरण प्रदूषण के वे ही कमजोर कारक हैं, जो दिल्ली के कचरे. औद्योगिक और वाहनिक प्रदूषणों से कहीं अधिक दीपावली पर चर्चे में आने वाले किसी आरक्षित कारक से कम नहीं होते हैं। जब जब दीपावली आती है, पटाखे तो बाद में फूटते हैं, न्यायालयिक घोषणाओं के बम और फिर उनके साथ साम्प्रदायिक फुलझड़ियां पहले चलने लगती हैं।

सारे त्यौहार का मजा किरकिरा हो जाता है। भारत में हर त्योहार कितने तनावों में मनने लगे हैं। कोई त्योहार आने वाला होता है उसके पहले हाईअलर्ट घोषित होने लगता है। मानो त्योहार नहीं, कोई साम्प्रदायिक बाधाएं हों। इन सभी माहौल ने त्योहार की परिभाषाएं ही उलट दी हैं। पटाखों को दीपावली से ही न जोड़ा जाए, बल्कि नववर्ष के दौरान से लेकर हर खुशी में भी जो आतिशबाजियां आजकल होने लगी हैं, उनकी तरफ भी ध्यान देना जरुरी है। क्योंकि ऐसा तो नहीं हो सकता कि दीपावली के दौरान चलने वाले पटाखे और अन्य समयों पर चलने वाले पटाखे चयनात्मक रुप से अलग अलग तरह का पर्यावरणीय प्रभाव डालते होंगे। यह अवश्य है कि इनके चयनात्मक प्रतिबंधों से देश के माहौल पर प्रतिकूल प्रभाव अवश्य पड़ जाता है। कहीं खून की दुहाई, तो कहीं जलप्रदूषण के मुद्दे परोक्ष-अपरोक्ष रुप से उछलने लगते हैं। बहुत सी राजनीतिक सुगबुगाहटें हिचकोले लेने लगती हैं, लेकिन थोड़े से पैसों से थोड़े से पटाखों को चलाने वाली आम जनता अपनी दीवालियां भी नहीं मना सकती, इस न्याय को क्या नाम दें?

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  1. M
    manish agrawal
    Oct 10, 2017 at 8:27 pm
    माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने एक शानदार फेंसला दिया है जिसका हर जहीन हिंदुस्तानी , खैर मक़दम करेगा ! आतिशबाज़ी चलाना एक निहायत ही वाहियात रवायत है ! आतिशबाज़ी सिर्फ शोर और वायु प्रदूषण का मरकज़ है ! आतिशबाज़ी में कैडमियम और लेड जैसे हैवी मेटल और सल्फर डाइऑक्साइड तथा नाइट्रेट जैसे विषैले पदार्थ हवा को ी तरह प्रदूषित करते हैं , जो इंसानों की सेहत के लिए बेहद खतरनाक हैं और जानलेवा भी हो सकते हैं ! मज़हब से आतिशबाज़ी का कोई ताल्लुक ही नहीं , इसलिए यदि जाहिल किस्म के लोग , इस फैंसले पर छाती पीट रहे हैं तो वो ग़लत है ! अरे गंवार लोगों ! आतिशबाज़ी से जहरीली हुयी हवा जिन लोगों की सेहत को नुक़सान पहुंचाएगी , उनमे 80 फीसदी तो हिन्दू ही होंगे क्योंकि Total Population का 80 फीसदी हिन्दू ही तो है ! कुछ लोग एक वाहियात दलील देते हैं की बच्चों के लिए बिना पटाखों के काहे की दिवाली ? उन ों से पूछना चाहता हूँ की जवान औलादों को, उनके मांगने पर भी, माँ बाप कभी भी चरस , गांजा नहीं पीने देते क्योंकि ये नुकसानदेह हैं ! तो फिर बच्चों के फेंफडें खराब करने के लिए आतिशबाज़ी क्यों? ाााााााााााााााााााााााााााााााााा
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