December 06, 2016

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मंदिर-मस्जिद में जाने का हक पाकर भारतीय महिलाओं को क्या हासिल होगा?

इसी साल शनि शिंगणापुर मंदिर में भी महिलाओं के प्रवेश को अनुमति मिली।

चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रतीक के तौर पर किया गया है। (पीटीआई फाइल फोटो)

डॉ. शुभ्रता मिश्रा

भारत का कोई भी कोना हो, नारी को अपने अस्तित्व को हमेशा साबित करना पड़ा है। युगों युगों से अग्नि परीक्षाओं से लेकर आज की लंबी कानूनी लड़ाईयों तक हर धर्म, जाति और सम्प्रदाय की भारतीय नारियों ने स्वयं के सतीत्व से लेकर अस्तित्व के अधिकारों के लिए हमेशा संघर्ष किया है। यह भी उतना ही सच है कि उनका संघर्ष कभी व्यर्थ नहीं गया क्योंकि सत्य की विजय सनातन रही है। आज फिर एक ऐसी ही विजय को भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन (बीएमएमए) की सहसंस्थापक नूरजहां एस नियाज के नेतृत्व में देश की मुस्लिम महिलाओं ने हासिल किया है। सर्वोच्च अदालत के आदेश के बाद 75-80 महिलाओं का एक समूह मुंबई के वरली तट के निकट एक छोटे से टापू पर स्थित हाजी अली दरगाह में सम्मानपूर्वक अंदर गया और मजार पर चादर और फूल चढ़ाए। पहले अगस्त में बॉम्बे हाई कोर्ट ने महिलाओं को मजार तक जाने पर लगे प्रतिबंध को हटाने का आदेश दिया था और फिर 24 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। इसी साल शनि शिंगणापुर मंदिर में भी महिलाओं के प्रवेश को अनुमति मिली।

निःसंदेह ये दोनों ही इस साल की बड़ी कागजी और कानूनी जीत रही हैं, लेकिन प्रश्न उठता है कि क्या यह वाकई जीत है या सिर्फ जीत की प्रतीकात्मक विजय है। क्योंकि जो जीतीं हैं, ये वो नारियां हैं, जो नारी के अधिकारों को और समाज में उनकी समानता के न होने को भलीभांति जानती व समझती हैं। दूसरी ओर भारत की वे नारियां भी हैं, जो या तो स्वयं इतनी धार्मिक कट्टर जटिलताओं में उलझी हुई हैं कि मिले अधिकार को भी सहज स्वीकार कर पाना नहीं चाहतीं और ऐसी भी हैं, जो स्वयं के अधिकारों से बिल्कुल अनभिज्ञ रहती हैं। महिलाओं के अप्रवेश को प्रवेश में परिवर्तित कर लेना ही सामाजिक समानता का प्रतीकचिन्ह नहीं हो जाता या कि पूरी जीत नहीं कही जा सकती।

वास्तव में भारतीय समाज में उच्चवर्गीय और उच्च-मध्यम वर्गीय महिलाओं को छोड़ दें, तो आज के कोई भी कानूनी फैसले समाज में महिलाओं को कितना समान बना पाए हैं, यह विचारणीय विषय है। भारत में नारी सिर्फ नारी समुदाय है, उसका धर्म, जाति या सम्प्रदाय महज पहचान के लिए है, बाकी वो सिर्फ एक लिंगभेद से अधिक कुछ है नहीं। आज मजार में प्रवेश करने के बाद मजार को स्पर्श न कर पाने का भेद कितना सम्मान दे पाया है, ये भी वे जानती हैं, जो जीती हैं। फिर भी जीत तो जीत होती है, लेकिन नारी समुदाय को पीढ़ियों से चले आ रहे असमानता के अपने इस संघर्ष को कब तक झेलते जाना है, कहना बहुत मुश्किल है।

नारी जाति के समान अधिकारों के आंदोलनों में पिछली शताब्दी की सावित्रीबाई फुले के संघर्षों से लेकर इस शताब्दी की भूमाता ब्रिगेड की प्रमुख तृप्ति देसाई तक सभी वीरांगनाओं को बहुत कुछ सुनना व झेलना पड़ा है। पर ऐसा नहीं लगता कि मुद्दे हैं कि वहीं रह जाते हैं, सिवाय इसके कि कुछ परिष्कृत हो जाते हैं। भारतीय समाज में अभी भी सही मायनों में मन और हृदय से नारी के प्रति सम्मानजनक समानता का सौ प्रतिशत रुप में आ पाना सम्भव सा नहीं लगता। जीत सही मायनों में उस दिन होगी जब भारत में हर धर्म की निम्नवर्गीय नारियों को भी अपने अधिकारों का स्वयं संज्ञान हो सकेगा और वे इन कानूनी नारी विजयों के अर्थ सही मायनों में पहचान पाने की क्षमता रख पाएंगी।

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First Published on November 30, 2016 11:05 am

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