December 07, 2016

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ब्लॉग: नोटबंदी पर हो रही है ओछी राजनीति लेकिन जनता जानती है सच क्या है

मुद्रा के प्रचलन में हर व्यक्ति उस्ताद होता है। ग्रामीण महिलाएं, पुरुष अनपढ़ भले ही हों लेकिन सदियों से मुद्रा पद्धति के बदलते प्रत्येक स्वरुप को आसानी से वे आत्मसात करते आए हैं।

दवा की दुकानों पर नोट लिए जाने से बहुत सारे लोगों ने छोटी-मोटी दवाएं खरीदकर 500, 1000 के नोटों से निजात पानी चाही। कोलकाता की एक दुकान का दृश्‍य। (Photo: PTI)

डॉ शुभ्रता मिश्रा

नवम्बर का पूरा महिना 500 और 1000 के नोटों को समर्पित सा बीता जा रहा है। फेसबुक और वाटसेपों पर सृजनशीलता की ऐसी बहार अपनेआप में मिसाल बन रही है, तो मीडिया और अखबार भी स्वयं को इन समाचारों से बाहर ही नहीं निकाल पा रहे हैं। आम जनता परेशान है, लेकिन मजे भी उतने ही ले रही है। यह वाकई आम भारतीय जनता का आम गुण है। ये अलग बात है कि प्रायः आम जनता को विशेष अवसरों पर तथाकथित विशेष लोग आम नहीं रहने देना चाहते और उनकी पीड़ा अचानक उनको अनुभूत होने लगती है। पीड़ाओं का राजनीतिकरण लगते देर नहीं लगती और देश समर्थन और असमर्थन के गुटों में बँटता चला जाता है। देश में इस समय विमुद्रीकरण के संक्रमण की पीड़ा झेल रहे आम भारतीय की गरीबी और सामाजिक रीतिरिवाज उभरने लगे हैं। किसी को अचानक बैंकों की व्यवस्था सिर्फ चंद अमीरों की लगने लगी है और वे जनता के धन को जनता तक ही न पहुंच पाने की पीड़ा से आहत ही नहीं वरन् बेहद परेशान नजर आ रहे हैं।

समझ में नहीं आता हर मुद्दे का राजनीतिकरण क्यों आवश्यक होता है। यह ऐसा करने वालों के लिए कदाचित् कई बार लाभप्रद भी साबित हो जाता है, लेकिन उतनी ही बार वे स्वयं को खुश कर लेते हैं कि हमने जनता को मूर्ख बना ही दिया। लेकिन इस बार विमुद्रीकरण के मुद्दे को जितना राजनीतिक बनाना चाहा जा रहा है, सम्भवतः उतनी सफलता मिल नहीं पा रही है। क्योंकि आम लोग जो गांवों से लेकर शहरों तक बाकी मामलों को भले ही उतना न समझ पाते हों, लेकिन पैसों का लेनदेन, उसकी महत्ता और उपयोगिता एक आनुवांशिक गुण की तरह होता है। एक बच्चा भी जब से पैसे से एक मीठी गोली का मिलना समझ लेता है, तब से वो यह जान जाता है कि इस टुकड़े में कुछ तो बात है। एक भिखारी भी जो रोज टीवी नहीं देखता, सामाचार नहीं पढ़ता, लेकिन 8 नवम्बर से उसे भी ये जानकारी मिल गई कि 500 और 1000 के नोट नहीं चलेंगे और उसने भीख ठुकराना शुरू कर दिया।

मुद्रा के प्रचलन में हर व्यक्ति उस्ताद होता है। ग्रामीण महिलाएं, पुरुष अनपढ़ भले ही हों लेकिन सदियों से मुद्रा पद्धति के बदलते प्रत्येक स्वरुप को आसानी से वे आत्मसात करते आए हैं। पुराने जमाने के अनाज के बदले सामानों की खरीद से लेकर आज बैंकों में अपने खाते खुलवाने की उनके लिए अद्यतन मुद्रा पद्धति तक को उन्होंने सुगमता से ग्राह्य किया है। हम कितनी ही बार कहते रहते हैं कि भारत में शिक्षा से लेकर अन्य विषयों तक का विकास अभी समग्र नहीं कहा जा सकता। यह बात बिल्कुल सच भी है, लेकिन रुपयों-पैसों का विषय एक ऐसा बुनियादी विषय होता है, जो आम जिजीविषा से जुड़ा है, इसलिए इसमें होने वाले विकास की धारा से जुड़ने में लोगों को देर नहीं लगती। हम भारतीयों के लिए यह एक सुखद पहलू कहा जा सकता है कि कोई भी भारतीय अर्थव्यवस्था को समझने के मामले में नासमझ नहीं है। वह शीघ्र ही कैश-लैस मुद्रा कार्ड प्रणाली को भी आत्मसात कर सकने की क्षमता रखता है। इन दिनों वाटसेप पर रेडियोमिर्ची पर किसी प्रकाश तिवारी को उसके खाते में 25000 रुपए जबरन जमा कराने का मुर्गा बनाए जाने का ऑडियो बहुत चल रहा है। सब मजे ले रहे हैं। खूब लोटपोट भी हो रहे हैं। लेकिन वास्तव में उस ऑडियो से ऐसे हर उस भोलेभाले भारतीय व्यक्ति की ईमानदारी से लेकर उसकी वर्तमान भारतीय विमुद्रीकरण के प्रति जागरुकता का संकेत भी उजागर होता है।

बहुत बरगलाने की कोशिशें विभिन्न माध्यमों से की जा रही हैं, लेकिन सही मायनों में लोग एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल दे रहे हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि बरगलाने का सच क्या है। अतः विषय यह उठता है कि सिर्फ विरोध के लिए विरोध करने की राजनीतियों के शिकार नेतागण तथा कुछ बुद्धिजीवी देश को किस दिशा में ले जाने का प्रयास कर रहे हैं। यदि कुछ भूल से भी अच्छा देश के लिए हो रहा है, तो उसमें हर्ज क्या है। कोई कालाधन की परिभाषाएं बदलने में लगा है, कोई कालाधन निपटान में व्यस्त है, कोई न्यायालय के दरवाजे खटखटा रहा है, कोई लाइनों में मृत्यु और विवाह की गम्भीरताएं खोज रहा है। कितने व्यस्त और अस्तव्यस्त से हो रहे हैं लोग। लेकिन मुद्रा वही है, अपनी बदलती मुद्राओं के साथ। प्रहसन, प्रदर्शन और विरोधों से भारतीय युवा कन्फ्यूज है, क्या सही है, क्या गलत है, कुछ समझ नहीं पा रहा। जो जितना अपनी बात को तगड़े तरीके से रख देता है, उसे वही सही लगने लगता है। आवश्यकता इस बात की है कि विमुद्रीकरण का कदम जब देश ने उठा ही लिया है, तो सभी राजनीतिक दल आर्थिक संक्रमण के इस समय की गम्भीरता को समझते हुए एक स्वस्थ पारम्परिक भारतीय राजनीति का परिचय दें और युवाओं व देश के आम नागरिकों की भावनाओं से कम से कम इस विषय पर खिलवाड़ न करें। देश की स्वच्छता और स्वस्थता को एक बार तो गम्भीरता से लें, क्योंकि उनकी जिजीविषा भी आम लोगों की तरह विमुद्रीकरण से कहीं हटकर नहीं है। जीविकाओं के ढंग बदल सकते हैं, पर मायने वही रहते हैं।

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First Published on November 18, 2016 6:27 pm

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