June 27, 2017

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ब्लॉगः एक बार फिर देश भ्रष्टाचार से मुक्ति को बेकरार, राजनीतिक दल फसल काटने को तैयार

एक लंबे गैप के बाद वर्ष 2011 में अन्ना हजारे को मुखौटा बना कर अरविंद केजरीवाल ने भ्रष्टाचार के खिलाफ बड़ा आंदोलन खड़ा किया।

दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल (बाएं) और पीएम नरेंद्र मोदी। (फाइल फोटो)

श्रीनिवास, वरिष्ठ पत्रकार

लगता है, एक बार फिर देश भ्रष्टाचार से मुक्त होने को बेकरार हो उठा है। पाँच साल पहले भी अन्ना हजारे-केजरीवाल के आंदोलन ने कुछ ऐसा समां बाँधा था; और मीडिया ने उसे इतना प्रभावी बताया कि लगता था, सचमुच देश की जनता भ्रष्टाचार के खिलाफ गोलबंद हो गयी है। पर अब पता चला है कि इस बीच कालाबाजारी फलते-फूलते रहे, काला धन का भण्डार जमा होता गया। पूरी अर्थव्यवस्था खोखली होने के कगार पर पहुँच चुकी है। नतीजतन सरकार को एक बड़ा और कड़ा फैसला लेना पड़ा। लोगों को थोड़ी असुविधा जरूर हो रही है, लेकिन वे सरकार के साथ हैं। खुश हैं कि काले कारोबारियों की नींद हराम हो रही है। हालांकि विपक्षी दलों और कुछ पत्रकार जनता के कष्ट की बात कर रहे हैं, लेकिन ‘निष्पक्ष’ और सोशल मीडिया पर यकीन करें तो बात एकदम उलट है। यानी लगभग पूरा देश यह मान रहा है कि गरीब और अमीर का फर्क बस मिटने ही वाला है। समाजवाद आ गया ही समझें। नोटबंदी से तकलीफ की बात करनेवाले काला धन के समर्थक हैं या विपक्षी दलों के एजेंट!

कथित खुदा और भगवान करे, यही सच हो। लेकिन अपने आसपास के समाज और माहौल को देखते रहने का अपना तजुर्बा कहता है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ सार्वजनिक रूप से हम कुछ भी बोलें, उससे परहेज बहुत कम को है। मैं नहीं मानता कि सभी भ्रष्ट हैं या मौका न मिलने के कारण ही ईमानदार हैं। लेकिन सच यह भी है कि हमारे आसपास रिश्तेदारी में, गाँव-मुहाले में ऐसे लोग हैं, जिन्हें बेईमानी की कमाई से कोई परहेज नहीं है, बल्कि जो ईमानदार है, वे ‘बेचारे’ हैं। कितने प्रतिशत सरकारी कर्मचारी-अधिकारी आपके हिसाब से ईमानदार हैं? और जो बेईमान व रिश्वतखोर हैं, क्या उनके परिवार को नहीं पता कि उनके घर की खुशहाली और शानो शौकत किस दम पर है? किसी को अपने पति, बेटे-बेटी, दामाद या किसी अन्य निकट रिश्तेदार के घूसखोर होने से ग्लानि होती है? हमने तो अपने देवी-देवताओं को भी रिश्वतखोर मान लिया है। तरह तरह की कामना कर उन्हें भोग लगाते हैं; मानते हैं कि वे प्रसन्न होकर हमारी मुराद पूरी कर देंगे। होती है या नहीं, यह और बात है।

सब ईमानदार हो गये, अचानक? जरा अपने आसपास, अपने परिवार और रिश्तेदारी में झांक कर देखें, दो नंबर की कमाई करनेवाले आसानी सदिख जायेंगे। सच यह है कि समाज के बड़े हिस्से को भ्रष्टाचार से आपत्ति तभी होती है, जब वह उसका नुकसान झेलता है। एक सरकारी दफ्तर का घूसखोर और कामचोर कर्मचारी दूसरे सरकारी दफ्तर में जाकर वहां के भ्रष्टाचार पर झुंझलाता है!

वैसे काला धन है क्या? वही ना, जिसे हम घोषित नहीं करते। जिस पर कर नहीं चुकाते। तो क्या ऐसा काला धन सिर्फ बड़े उद्योगपतियों-कारोबारियों के पास है? नहीं। मासिक वेतन पानेवालों की आय तो सरकार की नजर में है ही। ‘ऊपर’ की आमदनी छोड़ कर। लेकिन निजी उद्यम करनेवाले कितने लोग अपनी आय का सही हिसाब देकर आय कर चुकाते हैं। कितने वकील या डाक्टर हमें अपनी फीस की रसीद और सरकार को आय का सही ब्यौरा देते हैं? क्या ये सब हमारे बीच के और हमारे परिवारों में भी नहीं हैं? ठेकेदार और तरह तरह के धंधेबाजों-बिचौलियों, दुकानदारों की तो बात ही छोड़ दें। क्या ये सभी सचमुच अचानक ईमानदार हो गये हैं? और क्या भाजपा के समर्थक और मोदी के सारे प्रशंसक, जो इस कदम को देश हित में बता रहे हैं, भाजपा को चंदा देनेवाले सेठ साहूकार में से कोई कभी ऐसे धंधों में लिप्त नहीं रहा है? और अब ये सब सचमुच आगे कोई ऐसा काम नहीं करेंगे? सरकार भी जानती है कि ऐसा नहीं है। लोगों पर प्रवचनों-उपदेशों का असर शायद ही पड़ता है। गलत तरीके से धन अर्जन करने और छिपाने वालों के खिलाफ कार्रवाई करनी होगी। सरकार यही करने का दावा कर रही है। फिलहाल मान लें कि उसका इरादा सही है। लेकिन कृपया यह बताने का प्रयास न करें कि ऐसे लोग भी रातोंरात ईमानदार हो गये हैं। साथ ही, बस इतना निवेदन है कि जो लोग अपनी तकलीफ बयां कर रहे हैं, उन सबों को एक ही श्रेणी में मत रख दें। उनमें से भी अनेक इस फैसले को सही मानते हुए भी तकलीफ की बात कर रहे हैं।

नोटबंदी का समर्थन, यानी देशभक्ति? मुझे तो लगता है, यह नोटबंदी भी गोरक्षा, बन्दे मातरम, भारत माता की जय, तिरंगा प्रेम, धरा 370, मुसलिम आतंकवाद, पकिस्तान को गरियाने, तीन तलाक, सर्जिकल स्ट्राइक आदि की तरह देशभक्ति जताने का एक बहाना; और अपने आलोचकों को देशद्रोही साबित करने का हथियार बन गया है।

भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों का हश्र : यह सही है कि भारत की एक बड़ी, बहुतों के मुताबिक सबसे बड़ी समस्या भ्रष्टाचार है। इसके खिलाफ समय समय पर आंदोलन भी होते रहे हैं। नतीजा? सरकार बदल जाती है। आंदोलन के नेताओं को सत्ता मिल जाती है। फिर सब यथावत! ’74 में हुए ऐसे एक आंदोलन में तो यह खाकसार भी शामिल था। पूरे जोश और इस उम्मीद में कि व्यवस्था ही बदल जाएगी। लेकिन वह भी आखिरकार एक सत्ता परिवर्तन की मुहीम बन कर रह गयी। पहली बार केंद्र में गैर कांग्रेस सरकार बनी। नयी जनता पार्टी सरकार ने कुछ अच्छे काम भी किये। लेकिन महज तीन साल बाद कांग्रेस की वापसी हो गयी।

कोई एक दशक बाद फिर भ्रष्टाचार विरोधी उबाल उठा। निशाने पर फिर कांग्रेस। फिर सरकार बदली। वीपी सिंह प्रधानमंत्री बने। पर उसके बाद देश की राजनीति मंडल-कमंडल, मदिर-मस्जिद में बंट गयी। बोफोर्स दलाली में अंततः कुछ साबित नहीं हो सका।

एक लंबे गैप के बाद वर्ष 2011 में अन्ना हजारे को मुखौटा बना कर केजरीवाल ने भ्रष्टाचार के खिलाफ बड़ा आंदोलन खड़ा किया। लगा सारा देश उसके सात है। उसी के नतीजतन ‘आप’ बनी और दिल्ली में सत्तारूढ़ भी हुई। अंततः क्या हुआ?

2014 में भाजपा और नरेंद्र मोदी की ताजपोशी का भी एक कारण यूपीए के दस साल के शासन के खिलाफ भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी के अनेक आरोप और उसका निकम्मापन भी था। लोगों को मोदी की ईमानदारी और शासन करने की क्षमता पर भी कुछ भरोसा था। पर मूल वजह संकीर्ण हिन्दूवाद का प्रसार था, ‘गुजरात दंगों’ का बाद मोदी जिसके प्रतीक बन गये। मगर उसके आलावा भी उनके बडबोले दावों और चमकदार प्रचार से लोगों को लगा कि सचमुच कुछ अच्छा होनेवाला है। वह उम्मीद अब भी ख़त्म नहीं हुई है। लेकिन मौजूदा सत्तारूढ़ जमात जिस तरह विरोध और आलोचना के प्रत्येक स्वर को देशद्रोह बताने की राह पर चल रहा है, वह काफी खतरनाक है।

इस नोटबंदी का दूरगामी असर क्या होगा, यह तो बाद में पता चलेगा, पर इसके कारण आम लोगों को हो रही तकलीफ का जिस तरह खुद मोदी ने मजाक उड़ाया, वह भी विदेश में जाकर, उससे इसके पीछे की राजनीतिक मंशा और आम आदमी के प्रति सरकार की संवेदनहीनता ही उजागर हुई है। इस कदम से जली नोटों के कारोबार पर तो बेशक भारी चोट पड़ी है, लेकिन इससे काले धन के सफाये का जो दावा किया जा रहा है, वह संदिग्ध ही है। यह दावा तो और भी कि सारा देश काले धन और भ्रष्टाचार के खिलाफ एकजुट हो गया है। मैं मानना चाहता हूँ कि देश सचमुच अचानक देशहित में कुर्बान होने को तैयार हो गया है, कि समस्त देशवासी घूसखोरी, कालाबाजारी, करचोरी आदि से तौबा कर चुके हैं। मगर कैसे मान लें कि जदयू, राजद, तृणमूल, सपा, बसपा, शिवसेना, द्रमुक, कांग्रेस या वाम दलों का कोई समर्थन आधार नहीं है, जो इस नोटबंदी के खिलाफ हैं या इसे लागू करने के तरीके को गलत बता रहे हैं। यह भी मानना चाहता हूं कि कम से कम सारे मोदी भक्त तो जरूर हर तरह के दो नंबर का काम छोड़ चुके हैं। मगर क्या करें कि मैं इनमें से अनेक को निजी तौर पर जानता हूं। वे मेरे परिवार में, गाँव-मोहल्ले में, अपनी पत्रकार बिरादरी में भी हैं। उनके आचरण को करीब से देखता रहा हूं। इसलिए इस दावे पर फिलहाल तो यकीन करना कठिन ही है।

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First Published on November 18, 2016 6:41 pm

  1. B
    Binay
    Nov 19, 2016 at 4:44 am
    AGER DIL SE AAP KALA DHAN KE KHILAF HAI THO MONEY KO CASHLESS KER DO SHRIF CASH Rs 2000/- ISKE UPER CASHLESS, APNE AAP KALA DHAN BEND HO JAYAGA
    Reply
    1. दिनेश
      Nov 19, 2016 at 5:46 pm
      आज हालात यह हो गयी है कि अगर आप भाजपाई या संघी नहीं हैं तो आप राष्ट्रवादी नहीं हैं . ऐसा बिलकुल भी नहीं है. यह संकीर्ण राष्ट्रवाद हमें संकुचित करके वोटिंग रोबोट में तो बदल सकता है किन्तु सच्चा भारतीय या उदार राष्ट्रवादी नहीं बना सकता. इस बहुमत का सदुपयोग किया जा सकता था जनसंख्या को सीमित करने में. एक सामान नागरिक संहिता लाने में तथा अमीर गरीब की खाई पाटने में. . लेकिन ऐसा हो नहीं रहा. ऐसी धारणा बनाई जा रही है कि सच्चा देश भक्त सिर्फ बीजेपी वाला या संघ वाला ही हो सकता है. ,
      Reply
      1. J
        jkkalla
        Nov 19, 2016 at 5:51 am
        I agree with you. What we have done in the last 50 years that we think every means thru which we can earn money is valid. I have seen around me these types of persons mentioned in your blog, also it is correct that BJP Supporters are also one of them, they are not clean but become honest due to announcement.My request to all that one person has taken this decision please support him with cast, creed, party, personal hate etc. Come forward to make it a success war against menace of Black Money
        Reply
        सबरंग