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बेबाक बोलः न्याय की नजर- कुबूल नाकुबूल

संविधान, सरकार, हिंदुत्ववादी ताकतें, भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस या मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड क्या कहते हैं, इस बहस को परे रख दें। तो क्या किसी व्यवस्था को महज इसलिए स्वीकार कर लिया जाए कि उस पर धर्म या समाज के खास तबके का ठप्पा है या फिर वह सदियों से चली आ रही है? तीन तलाक का मुद्दा कुछ ऐसा ही है। जिस धार्मिक व्यवस्था पर 22 मुसलिम बहुल देश पाबंदी लगा चुके हैं, क्या उसे ढोना हमारे पिछड़े होने का सबूत नहीं? विकास के अपने सबसे मजबूत पायदान पर खड़े समाज में पितृसत्तात्मक सोच को बनाए रखने की लड़खड़ाती कोशिशों के खिलाफ इस बार का बेबाक बोल।

यह अजीब विडंबना है कि एक ही देश में अलग-अलग धार्मिक पहचान वाले समुदाय के सामाजिक जीवन के लिए अलग-अलग कानूनी व्यवस्था हो। लेकिन हमारे यहां यह विचित्र व्यवस्था देश की आजादी के बाद भी लागू है, जिसमें धार्मिक परंपराओं को निबाहने की आजादी का खयाल रखने के क्रम में कुछ समुदायों को विशेष अधिकार भी हासिल हैं। अगर वे परंपराएं उस संबंधित समुदाय के सभी सदस्यों की बराबरी का अधिकार तय करें, तो लोकतंत्र में भरोसा रखने वाले व्यक्ति को इस पर शायद ही कोई सवाल उठाने का मौका मिले। लेकिन सच यह है कि धर्म और परंपराओं के नाम पर कुछ समुदायों के भीतर जारी रवायतें व्यवहार में जिस शक्ल में जमीन पर उतरती हैं, उसका खमियाजा आम तौर पर स्त्रियों और समाज के कमजोर तबकों को भुगतना पड़ता है। इससे ज्यादा अफसोसनाक और क्या होगा कि पहली नजर में ही अन्याय साबित होने वाले हालात में भी देश का कानून पीड़ित व्यक्तियों या तबकों की मदद नहीं कर पाता, क्योंकि वहां धार्मिक व्यवस्थाएं आड़े आ जाती हैं।

अगर ऐसी स्थिति में एक देश के सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता की मांग की जाती है, तो इससे किसी को उज्र क्यों होना चाहिए! लेकिन इस मामले में हमारा देश थोड़ा अलहदा है! सभी के लिए बराबरी के अधिकार के साथ न्याय तय करने के केंद्रीय-तत्त्व के साथ अगर कोई व्यवस्था लागू करने की पहल हो रही हो तो इसका स्वागत करने के बजाय इसकी मंशा पर सवाल उठाना ज्यादा बड़ी जिम्मेदारी समझ ली जाती है। आखिर इसकी क्या वजह हो सकती है कि देश के सभी नागरिकों पर किसी मामले में एक ही कानून लागू करने से कुछ लोगों को असहमति है! हो सकता है कि अलग-अलग धार्मिक समुदायों की अपनी परंपराएं हों और वे उसमें राज्य का दखल नहीं चाहते हों। यह आस्थाओं को निबाहने के पैमाने पर तो ठीक है। लेकिन अगर किसी प्रथा का असर उसी समुदाय के एक हिस्से के नागरिक और मानवीय अधिकारों पर पड़ रहा हो, तो उसे किस कसौटी पर जायज ठहराया जा सकता है? क्या किसी ऐसी परंपरा को मानवीय और सभ्य माना जा सकता है, जिसमें किसी स्त्री को अपने पति की मौत के बाद उसकी चिता पर बैठ कर जल मरना पड़ता था? निश्चित तौर पर यह सामाजिक जीवन के भीतर किन्हीं परिस्थितियों में घुल-मिल गई ऐसी परंपरा थी, जिसमें अंतिम मकसद एक व्यवस्था के रूप में महिला पर नियंत्रण स्थापित करना था। लेकिन समय के साथ समाज में इसे लेकर मंथन शुरू हुआ, राजा राममोहन राय की ओर से उठाई गई मांग ने जोर पकड़ा और तत्कालीन अंग्रेज सरकार ने कानून बना कर इस पर सख्त पाबंदी लगाई। यह एक ऐसी रवायत थी, जिसे स्त्रियों के खिलाफ एक बेहद क्रूर और अन्यायी चलन के तौर पर दर्ज किया गया।

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किसी खास परंपरा या चलन से समाज के किसी हिस्से के जीने या सहज जीवन के अधिकारों का हनन होता है तो उसे खत्म करना उस समाज की ही जिम्मेदारी होनी चाहिए। लेकिन अगर उसे परंपरा के नाम पर निबाहा जाता रहता है तो एक सभ्य राज्य-व्यवस्था को कानून बना कर किसी समुदाय के पीड़ित हिस्से या व्यक्ति के मानवाधिकारों की सुरक्षा का इंतजाम करना चाहिए।  समान नागरिक संहिता को लेकर जिस तरह के विरोध सामने आए हैं, वे हैरान करने वाले हैं। अभी तक मुख्य आपत्ति मुसलिम समाज में प्रचलित ‘तीन तलाक’ की परंपरा पर इस कानून के पड़ने वाले असर को लेकर सामने आई है। सवाल है कि आखिर किस आधार पर किसी ऐसी परंपरा को देश के कानून से आजाद माना चाहिए, जो एक झटके में किसी स्त्री के जीवन को त्रासद बना दे, उसे उसके अधिकारों से वंचित कर दे। दलील दी जाती है कि यह परंपरा मुसलिम समाज के ‘पर्सनल लॉ’ यानी आंतरिक नियम-कायदों के मुताबिक कायम है, जिसे नहीं छेड़ा जाना चाहिए, क्योंकि हर समुदाय को देश और संविधान धार्मिक आजादी का अधिकार भी देता है। लेकिन इसी संविधान के अनुच्छेद 44 के तहत देश के सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून पर जोर दिया जा रहा है। धार्मिक आजादी सामाजिक जीवन और परंपराओं के संदर्भ में तो उचित हो सकती है। लेकिन सवाल है कि क्या धार्मिक आजादी में यह बात भी निहित है कि इसके नाम पर किसी व्यक्ति के साथ अन्याय या उसके खिलाफ अपराध को उचित माना जाए? क्या इस तथ्य की अनदेखी की जा सकती है कि इस ‘तीन तलाक’ की प्रथा के चलते एक मुसलिम महिला का जीवन अचानक ही कई तरह के सामाजिक और निजी संकटों से घिर जाता है?

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यह दलील दी जाती है कि यह आम नहीं है और ऐसे मामले बहुत कम पाए जाते हैं और वास्तव में मजहबी कानूनों के तहत ‘तीन तलाक’ की प्रक्रिया को बहुत जटिल बनाया गया है, जो तलाक को मुश्किल बनाता है। हो सकता है कि यह सही हो। लेकिन आए दिन जो खबरें निकल कर सामने आती हैं, उनमें कई ऐसे मामले सामने आ चुके हैं जिसमें किसी पुरुष ने बहुत मामूली बात पर आवेश में आकर फोन पर या मेसेज में ‘तीन तलाक’ के हथियार का इस्तेमाल किया और एक पल में उसकी पत्नी का जीवन अंधेरे में डूब गया। अगर ऐसे मामले बहुतायत में नहीं भी हों तो कानून और एक सभ्य समाज की नजर में कोई एक घटना भी ऐसी हो, जो अन्याय या अन्याय को बढ़ावा देती हो तो क्या उसे खत्म करने की कोशिश नहीं होनी चाहिए?

पर्सनल लॉ की हिमायत करने वाले लोगों की यह दलील भी अजीब है कि ‘तीन तलाक’ की व्यवस्था महिलाओं की हत्या होने से रोकती है। अगर इशारा दहेज या घरेलू हिंसा की वजहों से होने वाली हत्याओं की ओर है, तो इस कुरीति से मुसलिम समाज भी दूर नहीं है। लेकिन एक कुरीति के तहत होने वाले अन्याय का बचाव दूसरी कुरीति का समर्थन करके कैसे किया जा सकता है? भारत में जिस ‘तीन तलाक’ के संदर्भ से समान नागरिक संहिता का विरोध किया जा रहा है, दुनिया के 22 देश उसे कब का त्याग चुके हैं। खुद भारत के प्रतिद्वंद्वी पड़ोसी पाकिस्तान और बांग्लादेश ने भी इस रवायत को स्त्रियों के अधिकारों का हनन मानते हुए काफी पहले खारिज कर दिया था।

ऐसा नहीं है कि समूचा मुसलिम समाज ‘तीन तलाक’ को सही मानता है। पिछले कुछ समय से अखिल भारतीय मुसलिम महिला पर्सनल लॉ बोर्ड और मुसलिम महिला संगठनों की ओर से ‘तीन तलाक’ और बहु-विवाह की प्रथा के खिलाफ जोरदार आवाज उठाई गई है। मुसलिम समाज की आधुनिक पीढ़ी भी इसे अन्यायपूर्ण मानती है और सोशल मीडिया से लेकर दूसरे तमाम मंचों पर ‘तीन तलाक’ खत्म करने को लेकर उनकी मुखर राय सामने आई है। यह अच्छा संकेत है कि खुद मुसलिम समाज के भीतर इस प्रथा के खिलाफ आवाज उठ रही है। इस मांग से दिक्कत केवल कुछ मुसलिम धर्मगुुरुओं और उनके तुष्टीकरण में जुटे राजनीतिक संगठनों को है। उनका खौफ यही है कि इस यथास्थिति में बदलाव से समाज पर उनका नियंत्रण कमजोर पड़ जाएगा।
वक्त की जरूरत यह भी है कि इस पर जारी तुष्टीकरण की राजनीति को भी तलाक दिया जाए। फिर चाहे कांग्रेस हो या चुनावी मुहाने पर खड़ी समाजवादी पार्टी – गोलमोल कहने के बजाय सीधे कहें कि वे इस व्यवस्था के साथ हैं या खिलाफ। इन्हें डर है कि साफ बोलने से वोटों का एक बड़ा हिस्सा साथ छोड़ देगा। यह भी सच है कि मुसलिम समाज भी तीन तलाक पर दो-फाड़ है। और उत्तर प्रदेश में इस बार जैसे हालात हैं उसमें एक-एक वोट कीमती है। लिहाजा इस मामले में राजनीति को ही तरजीह दी जा रही है।

असल मुद्दा यही है कि नई राजनीति कभी धर्म, कभी पितृसत्तात्मक सोच और कभी सामाजिक असुरक्षा के बीच अपनी सर्वोच्चता को बचाए रखने को संघर्षरत है। लेकिन यह इल्जाम बेबुनियाद है कि यह एक समुदाय विशेष को निशाना बनाने की कवायद भर है। वक्त के साथ बदलना ही किसी प्रगतिशील समाज की पहचान है। समय आ गया है कि मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड भी इस सच को सुने। लेकिन, वह बहरा बना रहना चाहता है तो तरक्कीपसंद मुसलिम समाज और अन्य लोग मिल कर विकास के अपने सबसे मजबूत पायदान पर खड़े समाज में पितृसत्तात्मक सोच को बनाए रखने की इस लड़खड़ाती कोशिश को नाकाम करें।

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