ताज़ा खबर
 

अहमद पटेल: इंदिरा विरोधी लहर में भी जीत गए थे, पर मोदी लहर में हार का संकट

अहमद पटेल कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव हैं। वो 1993 से राज्य सभा सांसद हैं।
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल। (बीच में)

गुजरात की तीन राज्य सभा सीटों के लिए चुनाव हो रहे हैं। ये चुनाव सबसे ज्यादा इस बात के लिए चर्चा में हैं कि क्या वरिष्ठ कांग्रेसी नेता अहमद पटेल लगातार पांचवी बार राज्य सभा सांसद बन पाएंगे? अहमद पटेल चुनाव हार भी सकते हैं इस आशंका से ही कई कांग्रेसी असहज हो चुके हैं। मीडिया रिपोर्ट में अभी से दावा होने लगा है कि अगर अहमद पटेल हारे तो ये कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की हार होगी! आखिर अहमद पटेल का चुनाव कांग्रेस के लिए नाक का लड़ाई क्यों बन गई है? इसकी चर्चा से पहले आइए संक्षेप में गुजरात राज्य सभा चुनाव के जमीनी समीकरण समझ लें। गुजरात विधान सभा में कुल 182 विधायक हैं। राज्य सभा की तीन सीटों के लिए चार उम्मीदवार हैं। तीन बीजेपी के। एक कांग्रेस के अहमद पटेल। बीजेपी ने पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह और केंद्रीय मंत्री स्मृति  ईरानी के अलावा हाल ही में कांग्रेस से बीजेपी में आए बलवंत सिंह राजपूत को उम्मीदवार बनाया है। चुनाव जीतने के लिए एक उम्मीदवार को 45 वोट चाहिए। बीजेपी के पास 122 विधायकों का समर्थन है। पिछले कुछ हफ्तों में छह विधायकों के पार्टी छोड़ देने के बाद कांग्रेस के पास 51 विधायक बचे हैं जिनमें 44 के समर्थन को लेकर ही पार्टी आश्वस्त है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार कई विधायकों ने क्रॉस वोटिंग की है ऐसे में चुनाव के नतीजे आने से पहले कुछ भी अंतिम रूप से कहना संभव नहीं होगा।

21 अगस्त 1949 को अंकलेश्वर (वर्तमान गुजरात) में जन्मे अहमद पटेल की शुरुआती पढ़ाई-लिखाई स्थानीय स्कूलों में हुई। दक्षिण गुजरात यूनिवर्सिटी से उन्होंने बीएससी की। स्कूल की क्रिकेट टीम में वो बतौर बल्लेबाज खेला करते थे। पटेल ने राजनीतिक जीवन की शुरुआत नगरपालिका चुनाव से की थी। उन्होंने पहला बड़ा चुनाव अपना ताल्लुका पंचायत के सभापति का जीता। स्थानीय कांग्रेस से जुड़े अहमद पटेल अपने लगन और मेहनत के दम पर राज्य कांग्रेस के अध्यक्ष पद तक पहुंच गए। इंदिरा गांधी ने जब आपातकाल के बाद 1977 में आम चुनाव कराया तो पूरे देश में जनता पार्टी की लहर थी। कांग्रेस को चुनाव में बुरी तरह हाल मिली थी। खुद इंदिरा गांधी चुनाव हार गई थीं। लेकिन अहमद पटेल कांग्रेस-विरोधी लहर में भी भरूच  से चुनाव जीतकर पहली बार लोक सभा पहुंचे। तब से वो केंद्र की राजनीति में ही हैं।

पढ़ें राज्य सभा चुनाव के लाइव अपडेट्स

पटेल ने तीन बार (1977,1980 और 1984 में) भरूच लोक सभा सीट से चुनाव जीता। पटेल के बाद कोई कांग्रेसी भरूच सीट से चुनाव नहीं जीत सका। 1989 से 2014 के लोक सभा चुनाव तक भरूच सीट पर बीजेपी का कब्जा रहा है। 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद जब कांग्रेस सरकार में उनके बेटे राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने अहमद पटेल को अपना संसदीय सचिव बनाया। अहमद पटेल, दिग्विजय सिंह, तरुण गोगोई, अशोक गहलोत इत्यादि नेताओं को राजीव गांधी ने खुद चुना था और पुराने कांग्रेसियों के बरक्स इन युवा तुर्कों पर ज्यादा भरोसा किया।  1991 में राजीव की हत्या के बाद भी अहमद पटेल गांधी परिवार के करीबी बने रहे। जब 1997 में राजीव गांधी की विधवा सोनिया गांधी ने सक्रिय राजनीति में कदम रखा तो उनके अहमद पटेल उन चुनिंदा कांग्रेसियों में थे जिन्हें सोनिया का भरोसा हासिल था। ये भरोसा आज दो दशक बाद तक बरकरार है।

अहमद पटेल सोनिया के राजनीतिक सचिव हैं। वो एकमात्र कांग्रेसी हैं जिसके पास सोनिया के आधिकारिक आवास 10 जनपथ में एक निजी कार्यालय है। कांग्रेस 2004 से 2014 तक लगातार 10 सालों तक सत्ता में रही लेकिन अहमद पटेल ने कोई पद नहीं लिया जबकि गांधी परिवार में उनका रसूख जगजाहिर है। पटेल को मीडिया की सुर्खियों में रहना पसंद नहीं है। वो चर्चा में आने से बचते हैं। राजनीतिक जानकारों की मानें तो उन्हें बड़बोलापन पसंद नहीं। वो कांग्रेस में चाहे जितने भी ताकतवर हों सार्वजनिक तौर पर सभी से बहुत विनम्रता से पेश आते हैं।

पटेल पहली बार बड़े राजनीतिक विवाद में तब घिरे जब जुलाई 2016 में संसद में अगस्तावेस्टलैंड हेलीकॉप्टर में दलाली के मामले में उनका नाम उछाला गया। इन हेलीकॉप्टर की खरीदारी में बिचौलिए की भूमिका निभाने वाले गुइडो हाशके की डायरी में किसी “एपी” को पैसे देने की बात लिखी थी। बीजेपी नेता सुब्रामण्यम स्वामी ने आरोप लगाया कि “एपी” अहमद पटेल के लिए लिखा गया है। हालांकि पटेल ने सभी आरोपों को पूरी तरह बेबुनियाद बताया। पटेल को हिन्दी फिल्मों के गीत सुनना पसंद है लेकिन वो इसके लिए केवल रविवार को समय निकाल पाते हैं। कॉलेज में क्रिकेटर रहे पटेल आज भारतीय क्रिकेट टीम के सभी खिलाड़ियों के नाम भी नहीं जानते होंगे। उन्हें कांग्रेस का “संकटमोचक” माना जाता  है लेकिन आज वो खुद ही संकट से घिरे नजर आ रहे हैं।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.
सबरंग