May 27, 2017

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उमेश प्रसाद सिंह के सभी पोस्ट

प्रसंग: स्वांग पर्व

अभिनय का आचरण में बदल जाना कितना अद्भुत है। शायद इसका हमें पता नहीं है।

ललित प्रसंग- आंखिन रंग बचाय के डार्यो

एक अदना-सा निवेदन है। निवेदन रागाकुल रमणी का है। निवेदन फागाकुल रमणी का है। मगर है, बड़ा मार्मिक। इतना मार्मिक है कि मन को...

ललित प्रसंगः कौन तुम

मेरे घर में कोई घुस आया है। छिप कर बैठ गया है, कहीं। कहीं है जरूर। यहीं आसपास। मगर पता नहीं, कहां है? किधर...

ललित प्रसंग: जो तमाशा नहीं है

दौलत की भूख, शोहरत की भूख, शान की भूख, सत्ता की भूख, आश्चर्यजनक भूख है।

ललित प्रसंग: अनर्थकारी विद्या का व्यवसाय

परिवार, समाज और राष्ट्र के साथ व्यक्ति के जो पारस्परिकता के संबंध सूत्र हैं, हमारी शिक्षा उसे विच्छिन्न करने वाली है

ललित प्रसंग: प्राणों के दीप जलाएं

मिट्टी के दीये खोजने पर बड़ी मेहनत से मिलते हैं। मिल जाते हैं, कहीं-कहीं।

प्रसंग: राष्ट्रगान से बाहर होता राष्ट्र

खेद की बात है कि हम औपचारिकता के निर्वाह में राष्ट्रगान तो गा लेते हैं, मगर अपने सारे अवयवों और उपादानों के साथ राष्ट्रबोध...

‘साहित्य’ कॉलम में उमेश प्रसाद सिंह का लेख : कविता की चिंता में

कविता हम क्यों लिखते हैं? इस सवाल के सामने हमें अपने को ईमानदारी के साथ खड़ा करना होगा। हमें बिल्कुल एकांत में अपनी अंतश्चेतना...

‘दुनिया मेरे आगे’ कॉलम में उमेश प्रताप सिंह का कॉलम : हंसब ठठाइ फुलाइब गालू

हमारे समाज में धनबल और बाहुबल का सम्मान सबसे ऊंचे आसन पर विराजमान है। हमारे समय की बुद्धिजीविता गरीबों के पक्ष में बोल-लिख कर...

गुमशुदा उम्मीद

अपने जीवन की जड़ों को सींचने को लेकर हमें कोई जरूरत महसूस नहीं होती। हमारे समय में हमारे लोकतंत्र का दीपक अपनी जगह से...

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