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रमेश दवे के सभी पोस्ट

शिक्षा का बाजारवाद

शिक्षा को जब हम अपने अतीत से जोड़ते हैं तो संस्कार की ध्वनि सुनाई देती है, लेकिन जब अपने वर्तमान समय से जोड़ते हैं...

समाज-अपशिक्षा से उपजा अपराध तंत्र

यूरोप में शिक्षा का औपचारिक तरीका चर्च में अपनाया गया। वहां बच्चों, किशोरों, युवाओं की धार्मिक शिक्षा-दीक्षा होने लगी।

रचनाकार का विपक्ष

साहित्यकार का विपक्ष क्या है? क्या सत्ता है? क्या कोई विचारधारा है? क्या कोई राजनीति है? क्या किसी भी प्रकार की निरंकुशता या तानाशाही...

उच्च शिक्षण संस्थान और संगोष्ठियां : मकसद से भटका संवाद

सेमिनार से विचार की जो शृंखला बनती है, उसे गंभीरता से न लेने के कारण सेमिनार केवल ग्रांट लेने, नैक आदि से प्रमाणीकरण लेने...

समाज : संदेह में जीता समय

आज कितनी अपराधग्रस्त होती जा रही है। अपराधी देह और निरपराध देह में बंट गया है समाज।

शिक्षाः शिक्षा के सत्तर साल

शिक्षा से वेदना तो पैदा हुई, संवेदना पैदा क्यों नहीं हुई? शिक्षा के प्रति सच्ची भावना और संभावना सत्ता से लेकर समाज तक क्यों...

‘शिक्षा’ कॉलम में रमेश दवे का लेख : अवकाश, अध्यापक और अध्ययन

अवकाश का मतलब अपने काम से छुट्टी नहीं, बल्कि अवकाश में किसी नए काम की खोज करना है, जो अध्यापक को अधिक प्रभावशाली बना...

भाषा संस्कृति : लोकतंत्र में भाषिक मर्यादा

एक सभ्य लोकतंत्र, राजनीति के पक्ष-प्रतिपक्ष, समर्थन-विरोध या प्रकृति-संस्कृति का ही लोकतंत्र नहीं होता। वह भाषा का लोकतंत्र भी होता है।

शिक्षा : संवादहीनता के परिसर

अगर शिक्षा अपने वास्तविक अर्थ में सार्थक होती है तो वह हथियारों और हिंसा से क्रांति नहीं करती, वह तो शांति की क्रांति रचती...

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