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दुनिया मेरे आगेः विचार बनाम बंदिशें

विचार की दुनिया में जब राजनीति का दखल होता है तो अमूमन हर पक्ष के लिए जगह धीरे-धीरे सिकुड़ने लगती है।

दुनिया मेरे आगे: सुविधा की संवेदना

आजकल अक्सर मेरे पैर छिल जाते हैं। दरअसल, मैंने भाई के साथ अपनी स्कूटी से जाना शुरू किया है।

दुनिया मेरे आगेः वंचित सपने

दुनिया में कितना कुछ होता रहता है एक ही समय पर! कितने विचार, कितनी ही निराशा और आशाएं, कितने ही द्वंद्व इस दुनिया में...

दुनिया मेरे आगेः सड़क पर सिमटी स्त्री

अब छह साल हो गए हैं मुझे इस रास्ते से आते-जाते। रास्ता, जो संकरा है बहुत...! रास्ता, जो उम्मीद है बहुत-से लोगों की, उनके...

‘दुनिया मेरे आगे’ कॉलम में रजनी का लेख : छवियों के पार

मैं तब खुद भी नहीं जान पाई कि ऐसा क्या था उनमें जो मेरी दृष्टि रुक गई थी उन पर। खैर, वहां रोज दिन...

परीक्षा के पाठ

आमतौर पर विद्यार्थी उन किताबों या नोट्स की जुगत में लगे रहते हैं जो उस विषय से संबंधित हैं जिसे उन्होंने वर्ष भर नहीं...

दुनिया मेरे आगेः संवाद की संवेदना

पूंजीवादी सिद्धांत का विवेचन करते हुए रामविलास शर्मा ने लिखा है कि ‘कोई भी वाद या व्यवस्था अपने उत्थान में कल्याण को देखती है...

दुनिया मेरे आगेः दमित अस्मिता

‘मुक्ति कभी उपहार में नहीं मिलती, उसके लिए संघर्ष करना पड़ता है।’ पाउलो फ्रेरे की यह उक्ति खासतौर पर महिलाओं के अपने अधिकारों के...

दुनिया मेरे आगेः द्वंद्व की दीवारें

‘अचानक’ एक अजीब शब्द है! अक्सर जो घटनाएं हमें अचानक लग रही होती हैं, कोई और उन घटनाओं को अंजाम देने के लिए पूरी...

मां की जगह

मां कितना कुछ करती है। हमारे लिए लड़ती है, झगड़ती है। अपना सब कुछ हममें देखती है और हमारे इर्द-गिर्द ही अपनी दुनिया गढ़...

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