April 27, 2017

ताज़ा खबर

 

दिनेश कुमार के सभी पोस्ट

बीच बाजार में लेखक

हिन्दी साहित्य और हिंदी समाज के बीच का रिश्ता लगातार कमजोर पड़ता जा रहा है। हाल के वर्षों में इन दोनों के बीच अलगाव...

आत्मप्रचार का मुलम्मा

अधिकतर नए रचनाकारों ने अपनी रचना पर भरोसा करने की जगह विज्ञापन के उन सारे औजारों का उपयोग करना शुरू कर दिया, जो उन्हें...

विमर्श: पाठक से दूर होती कविता

हिंदी की विभिन्न साहित्यिक विधाओं में कविता आज सर्वाधिक संकट के दौर में है।

साहित्य की संकीर्णता

हिंदी में प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना के साथ ही साहित्य का राजनीति और समाज से रिश्ता एक नए दौर में प्रवेश करता है।...

पुस्तकायन: यादों की पगडंडियां पकड़े

हिंदी में जिस एक साहित्यकार को सबसे अधिक हमले झेलने पड़े, वे अज्ञेय थे।

रचनाकार के दोहरे मापदंड

आधुनिक लोकतांत्रिक राज्य और उसकी संस्थाओं से साहित्यकारों का क्या संबंध होना चाहिए, इस पर लंबे समय से बहस होती रही है।

साहित्यः कथा- रस के बिना कथा

नए यथार्थ के अनुरूप कहानी के स्वरूप में परिवर्तन स्वाभाविक है। हर दौर में कहानी के स्वरूप में कुछ न कुछ परिवर्तन जरूर हुआ...

दिनेश कुमार का लेख : गोदान की भूल-गलती

‘गो-दान’ के मूल पाठ के सामने आ जाने से पाठकों और अध्येताओं के लिए भिन्न-भिन्न संस्करणों में हो रहे परिवर्तनों को चिह्नित करना आसान...

साहित्य : आलोचना का संकट

आलोचक की प्रतिबद्धता पाठक के प्रति न होकर रचनाकार के प्रति हो गई है। व्यक्तिगत संबंधों पर आधारित आलोचना-कर्म ने आलोचक के चरित्र को...

प्रसंग : साहित्य और प्रासंगिकता का प्रश्न

प्रासंगिकता का सवाल साहित्य और समाज के संबंध का सवाल नहीं है। यह साहित्य की सामाजिक उपयोगिता का सवाल है।

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