April 28, 2017

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अशोक वाजपेयी के सभी पोस्ट

अशोक वाजपेयी: किसी को ये लग सकता है कि दुनिया केवल जानवरों के लिए है, पर यह इंसानों के लिए भी है

हम 'जीवन की लय' की बातें करते हैं और कई बार अफसोस जताते हैं कि हमारे समय में ये खो चुकी है। जीवन की...

कभी- कभारः कविता का दरवाजा

इस सोलह जनवरी को मैं अपनी आयु के पचहत्तर वर्ष पूरे कर गया। संयोगवश इस वर्ष कविता लिखने के साठ वर्ष, आलोचना लिखने के...

हिंदी गजल

हिंदी गजल को हिसाब में न लेने का आरोप जिन लेखकों पर लग सकता है उनमें मैं भी एक हूं।

साहित्य में जगह

प्राचीनों ने जब साहित्य, कलाओं, सौंदर्य आदि के सिलसिले में देश-काल की अवधारणा की थी तो वह कोई ऊपर से लादा गया सिद्धांत नहीं...

कभी-कभार : लेखकों की आवाज़

लेखक, कलाकार, बुद्धिजीवी आदि थोड़ा महीन कातते हैं और उसी के लिए बदनामी भी झेलते हैं: उन पर हमारे तेज भागते और सब कुछ...

कभी-कभार : रुड़की में स्पिकमैके

रुड़की में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान के दीक्षांत सभागार में स्पिकमैके के पहले शिशिर वार्षिक अधिवेशन में देश भर से आए लगभग आठ सौ छात्रों...

साहित्य की नागरिकता

जब अमदाबाद स्थित भारतीय सामुदायिक शिक्षा समिति के निमंत्रण पर रामलाल पारीख स्मृति व्याख्यान ‘साहित्य की नागरिक भूमिका

अशोक वाजपेयी का कॉलम कभी-कभार: ‘फिर मुझे… याद आया’

भारत भवन के पहले दशक में अपने कई मूर्धन्यों पर हमने बड़े आयोजन किए थे, जिनमें मैथिलीशरण गुप्त, जयशंकर प्रसाद, हजारी प्रसाद द्विवेदी आदि...

कभी-कभार : धर्म की अपनी समझ

हाल में एक विश्वविद्यालय ने मुझे एक कवि की दृष्टि से हिंदू धर्म पर विचार व्यक्त करने के लिए आमंत्रित किया। मैंने संकोच किया,...

कभी-कभार : नेहरू-स्मृति

आजकल जवाहरलाल नेहरू को अवमूल्यित करने का एक सुनियोजित अभियान चल रहा है: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सिकुड़ते क्षेत्र पर भी बहस है। इस...

कभी-कभार : ‘बरजहु भय बिसराई’

तुलसीदास ने राम के राज्यारोहण के बाद उनके द्वारा नागरिकों को संबोधन में उनसे यह कहलाया है: जो अनीति कछु भाखों भाई। तो मोहिं...

कभी-कभार : मुखर धार्मिकता

हमारे समाज और समय में अनेक धर्म सक्रिय हैं: एक ही धर्म में कई रूप प्रचलित और लोकप्रिय हैं, जैसे कि हिंदू धर्म में।...

कभी-कभार : बचना और रचना

सभी जानते हैं, साहित्य के लेखक और पाठक दोनों भी, कि काल निर्मम होता है। कालांतर में कौन लेखक या कृति प्रासंगिक और पठनीय...

कभी – कभार : कामना का आघात

जिन दो फिल्मकारों से मेरी कुछ घनिष्ठता हुई, वे हैं मणि कौल और कुमार शहानी- दोनों अपने अंचलों से, कश्मीर और सिंध से विस्थापित।...

कभी-कभार : अथक यायावरी

हिंदी में तीन बड़े यायावर हुए हैं: राहुल सांकृत्यायन, अज्ञेय और कृष्णनाथ। इन घुमक्कड़ों की जानने की जिज्ञासा जितनी नए अनुभवों और प्रश्नों को...

कभी-कभार : घटता-सिकुड़ता हिंसक नेता

इस समय की बड़ी विडंबना यह है कि अगर अच्छे दिन आ नहीं गए हैं तो कम से कम उनका वादा तो है; जिस...

कभी-कभार : ‘आओ उनकी याद करें हम’

यह बात थोड़ी घिसी-पिटी जरूर हो गई है, लेकिन सही है कि हमारा समय बढ़ती विस्मृति का समय है। नितांत समसामयिकता की ऐसी चकाचौंध...

कभी-कभार : अनुकरण की अधीरता

हमारा पढ़ा-लिखा और चिकना-चुपड़ा समाज इस समय अपने को जल्दी से जल्दी अमेरिकी बनाने की हड़बड़ी में है: उनके जैसा भोजन और पहरावे, उनके...

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