ताज़ा खबर
 

अरुणेंद्र नाथ वर्मा के सभी पोस्ट

दुनिया मेरे आगे- रक्त के आंसू

किसी साल उनके अभिसार को प्रतीक्षारत धरती सूनी आंखों से आकाश को निहारती रह जाती है तो किसी साल वे उसकी प्यास पूरी तरह...

ताक पर तहजीब

रोज बदलते समाज के मूल्यों के बीच अच्छे और बुरे की परिभाषा भी तेजी से बदलती जा रही है। शुचिता एक नया अर्थ पा...

दुनिया मेरे आगेः आत्मपीड़न का साहित्य

अगर साहित्य वास्तव में समाज का दर्पण है तो उसे दर्पण का धर्म निभाना चाहिए। यथार्थ का ईमानदारी से बयान करके, समाज के चेहरे...

सेना की परंपरा का प्रश्न

प्रश्न जरूर उठेंगे कि सरकार को वरिष्ठता क्रम में ले. जन. रावत से ऊपर रहे ले. जन. प्रवीन बक्शी और ले. जन. पीएम हैरीज...

दुनिया मेरे आगे: आंसुओं से उभरती मुस्कान

जोहान्सबर्ग के गांधी स्क्वायर को दिखाते हुए हमारी गाड़ी के अश्वेत ड्राइवर की आंखों में अपार श्रद्धा दिखी।

राजनीतिः किसके हित में है यह आत्म बलिदान

आखिर क्यों फौजी अब भी पूरी तरह संतुष्ट नहीं हैं। असहमति के स्वर कहां से उपज रहे हैं? समझने का प्रयत्न करने पर दीखता...

दुनिया मेरे आगे: डिजिटल भक्ति

इस जीवन के लिए शक्ति और अगले के लिए भक्ति का समन्वय हमारी देशज डिजिटल क्रांति की यूएसपी या अनूठी गुणवत्ता है।

दुनिया मेरे आगेः पत्थर पे घिस जाने के बाद

जीवन में विषम परिस्थितियों से जब भी संघर्ष करना पड़ा, बड़े-बुजुर्गों से सुनी हुई इन पंक्तियों ने धीरज बंधाया- ‘रंग लाती है हिना पत्थर...

हंसमुख बेगम

फगुनहटी पवन का स्पर्श उसके अंग-अंग में भी गुदगुदी कर सकता था जैसे केदारनाथ अग्रवाल की ‘बसंती हवा’ कभी गेहूं की बालों को गुदगुदाती...

दुनिया मेरे आगेः मौसम की तरह बदलना

थोड़ी देर भी धूप में बैठने पर शीतल छांव की चाहत जाग उठती है, लेकिन छाया का स्निग्ध शीतल स्पर्श मिलने लगे तो धूप...

शहादत की छवियां

भारतीय वायुसेना में विमान चालकों और मार्ग निर्देशकों यानी ‘नेवीगेटर्स’ के हमारे बैच को 1965 के भारत-पाक युद्ध की पृष्ठभूमि में कमीशन मिला था।...

सबरंग