ताज़ा खबर
 

नृत्य में कान्हा के दिखे कई रूप

सत्रीय केंद्र और संगीत नाटक अकादमी की ओर से अंकीय भावना समारोह आयोजित की गई।
अंकीय भावना समारोह में पेश कार्यक्रम का एक दृश्य।

असम में लोकनृत्य व शास्त्रीय नृत्य की विशेष शैलियां प्रचलित हैं, जिनकी परिकल्पना लोक और विद्वान साहित्यकारों ने किया। शंकरदेव ने अपनी नाट्य रचनाओं जैसे पत्नी प्रसाद, कालिया दमन, केलि गोपाल आदि की रचना की और इनका नृत्य नाट्य निर्देशन किया। उनकी परंपरा को सत्रीय नृत्य और अंकीय नाट या नृत्य के जरिए उनके मुख्य शिष्य माधवदेव व अन्य शिष्यों ने आगे बढ़ाया। इसी परंपरा की झलक आठवें अंकीय भावना समारोह में दिखी।

सत्रीय केंद्र और संगीत नाटक अकादमी की ओर से अंकीय भावना समारोह आयोजित की गई। इस समारोह का संदेश था-नाटकम मुक्तिसाधकम। मेघदूत थिएटर परिसर में विशेष तौर पर बांस और अन्य सामग्रियों से नाम-घर यानि मंच निर्मित की गई थी। इससे नाम घर के परिवेश का सृजन किया गया था। सत्र परंपरा के अनुरूप मंच पर सात सोपान वाले शिखर आकृति बनाया गया था। इस पर राम-कृष्ण के नाम वाले अंगोछा बिछा था, जिसके ऊपर करीने से घोड़े, हाथी व कछुए की छोटी-छोटी मूर्तियां सजी थीं। वैष्णव संप्रदाय की मान्यता है कि विष्णु के कूर्मावतार पर यह पृथ्वी स्थिर है। इस सज्जा के पीछे यही मान्यता मानी जाती है। इसके सामने बने मंच पर कलाकार आकर अपना नृत्य संगीत पेश करते हैं।

शंकरदेव ने छह नाट्य रचनाएं की थीं, जिसमें चार नाटकों की प्रस्तुति समारोह में हुई। श्रीराम विजय, केलि गोपाल, पारिजात हरण और रूक्मिणी हरण अंकीय भावनाएं पेश की गईं। समारोह की पहली शाम श्रीराम विजय ने प्रस्तुत किया। गुवाहाटी के सत्रीय केंद्र की इस प्रस्तुति का निर्देशन दुलाल रॉय ने किया। इसमें राम और लक्ष्मण की ताड़का व अन्य असुरों से संघर्ष को चित्रित किया गया। श्लोक, पद, भातिमा और संवाद पर आधारित पेशकश में अभिनय और सत्रीय नृत्य का अच्छा संयोजन नजर आया।

की दूसरी शाम केलि गोपाल पेश की गई। इसे शंकरदेव क्रिस्टी संघ के कलाकारों ने पेश किया। इसका निर्देशन भावेन बरबायन ने किया। नर्तकों के समूह स्त्री वेश में इस पेशकश में चांदनी रात में यमुना किनारे श्रीकृष्ण बांसुरी बजाते हैं। उनकी धुन सुनकर गोपियां कृष्ण के पास पहुंच जाती हैं। वह सब मिलकर रसमंडल नृत्य करती हैं। एक रात यक्ष शंखचूड़ एक गोपी से दुराचार करता है। कृष्ण को पता चलता है तो वह उसका वध कर देते हैं। रास के आनंद में डूबी गोपियां देवी कात्यायिनी से वंदना कर कृष्ण को पति रूप में मांगना चाहती हैं। पर कृष्ण उन्हें मोक्ष और स्वार्थरहित भक्ति का संदेश देते हैं। इसका आरंभ पूर्वरंग और गायन-बायन से होता है। सूत्रधार एक ताल में ‘राम हरि से प्राण मन’ व ‘दारिद्र दुख भयहारी सकल अरे’ को गाते हुए नृत्य करता है। इसके बाद प्रवेश नाच, रागोर नाच, तातर नाच व लोकोर नाच कलाकार पेश करते हैं।

कृष्ण और गोपियों का नृत्य कई गीतों व पदों पर आधारित होता है। इसमें शामिल रचनाएं थीं-‘प्रवेश कृष्ण कंदर्प दर्प’, ‘विश्वंभर पल्लवम लक्ष्मी पल्लवम’, ‘गोपिनी सखेन माया’, ‘आमारे काहे गो’, ‘माधव बांधव मोरू गोपिनी’, ‘सखी बृज पंकज हेर मोर’, ‘जीवन रे ओकर गति लाई’, ‘अरे बृजरमणी गोपाल नाचत’ आदि। असम के ब्रजवाली भाषा की ये रचनाएं एक, पूरी, घोटी व खोरमान ताल में निबद्ध थीं। प्रस्तुति में कलाकारों ने दशावतार, कृष्ण की लीलाएं, पूतना वध, माखनचोरी, कालियादमन, गोवर्धन पर्वत प्रसंग आदि को अपने नृत्य के अभिनय के जरिए निरूपित किया। भक्ति रस से ओत-प्रोत प्रस्तुति में कलाकार बीच-बीच में ‘हरि बोल’ का सस्वर उच्चारण करते हैं।

अगली संध्या दारंग के कला कृष्टि बिलाश केंद्र के कलाकारों ने पारिजात हरणम पेश किया। शंकरदेव की इस नाच का निर्देशन पबित्र प्राण बोरा ने किया था। प्रस्तुति का आरंभ पूर्वरंग धेमानी से होता है। गायन-बायन कलाकार पेश करते हैं। सूत्रधार ‘कृष्ण शंकर गुरु हरि प्रणाम’ निवेदन करता है। सूत्रधार नांदी और भातिमा के जरिए भावना की कथासार को प्रस्तुत करता है। यह पेशकश कृष्ण, रूक्मिणी, सत्यभामा, नारद और इंद्र के संवादों और पदों पर आधारित थी। नारद कृष्ण की स्तुति रचना ‘जय देव देवकीनंद’ में पेश करते हैं। नारद पारिजात का फूल कृष्ण को लाकर देते हैं। इसे वह रूक्मिणी को देते हैं। जब सत्यभामा को इस बात का पता चलता है, तो वह भी इसकी जिद्द करती है। इस पेशकश को रचना ‘अब प्राणनाथ मोहे पारिजात’, हे परमेश्वर जगन्निवास’, ‘जय जय यादव देव’, ‘मानिनी मय नयन’, ‘प्रिय का दुख देखी’, ‘हे प्राणप्रिया कौन बात’ में पिरोया गया था। इस प्रस्तुति में स्त्री पात्र सत्यभामा को शिल्पीशिखा देवी और रूक्मिणी को उत्पला हुकाई ने निभाया था। दोनों नृत्यांगनाओं का नृत्याभिनय काफी परिपक्व और प्रसंग के अनुकूल था।

समारोह का समापन रूक्मिणी हरण अंकिया भावना की प्रस्तुति से हुआ। इसे धुनियाजान से आए ‘पाथर’ के कलाकारों ने प्रस्तुत किया। इसका निर्देशन हरिचरण भूयन बरबायन और प्रबित्र सेतिया ने किया। इस नाच की रचना शंकरदेव ने राम राय के आग्रह पर की थी। रूक्मिणी और कृष्ण के प्रेम का सुंदर विवेचन इस प्रस्तुति में नजर आया। इस प्रस्तुति में सूत्रधार की भूमिका में माणिकचंद्र बोरा ने निभाया। ब्रजवली में प्रस्तुति का समापन मुक्ति मंगला भातिमा से हुआ।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.
सबरंग