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कला : चित्रों में विविधता का उत्सव

सतीश चित्रकार, मूर्तिकार, वास्तुकार और भीत्तिचित्रकार भी हैं। इस प्रदर्शनी में उनकी 70 से अधिक मौलिक कलाकृतियां हैं।
Author नई दिल्ली | February 18, 2016 22:33 pm
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र की दीर्घा में प्रदर्शित कृष्ण मेनन का चित्र।

भारत के समकालीन कलाकारों में एक महत्त्वपूर्ण शख्सियत सतीश गुजराल के कलाकृतियों की प्रदर्शनी इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र की दीर्घा में लगी है। सतीश चित्रकार, मूर्तिकार, वास्तुकार और भीत्तिचित्रकार भी हैं। इस प्रदर्शनी में उनकी 70 से अधिक मौलिक कलाकृतियां हैं। इसमें जीवन के कुछ पड़ावों की और वास्तुकला की तस्वीरें भी हैं। हिंदुस्तान के विभाजन के समय की त्रासदी सतीश ने देखी थी। इस विषय पर उन्होंने कई चित्र बनाए थे। विभाजन की स्मृतियां उनके चित्रों में रूपक के रूप में भी प्रस्तुत होती रही हैं। दीर्घा में प्रवेश करते ही बायीं ओर पचास के दशक के जो चित्र हैं उनमें वही प्रतिबिंबित होता है। साल 1953 का 39 गुणा 30 इंच का एक तैलचित्र है ‘विनाश का गीत।’ एक आतंकित पुरुष चेहरे पर भय, क्रोध और पीड़ा का मिलाजुला भाव। उसी की बगल में उसी समय के अन्य चित्रों में भी वही भाव है। इन चित्रों के रंग धूसर, काला और सफेद हैं। कहीं गहरा नीला भी है। तूलिकाधातों में मरोड़दार गति है, जोशीली प्रतिक्रिया जैसी।

साल 1952 का 26 गुणा 23 इंच का, बोर्ड के ऊपर तैलपेंसिल का बनाया हुआ श्वेत-श्याम चित्र ‘स्मृति का फंदा’ अत्यंत प्रभावशाली है। तूलिकाधातों की शैली वही है जो बाद के चित्रों में दिखाई देती है। कला के आलोचक कहते हैं कि यह शैली मैक्सिको यात्रा का प्रभाव है।

पचास के दशक में सतीश ने कई व्यक्ति चित्र भी बनाए हैं। कृष्ण मेनन का, अपने पिताजी का, जवाहरलाल नेहरू का और लाला लाजपतराय का। साठ के दशक के चित्रों में शैली और संरचना बदल गए हैं। ज्यामितिक खंडों की संरचना है, सतह को गले हुए मोम से खुरदुरी बनाई गई है। रोचक कृतियां हैं। हालांकि 1968 का कागज के ऊपर काली स्याही और पेंसिल से बनाया गया श्वेत-श्याम चित्र आकृतिपरक चित्रकारी का उम्दा नमूना है। यही शैली 40-50 साल बाद के उनके चित्रों में झलकती है। शुरुआती दौर के चित्रों से नितांत भिन्न।

सतीश ने दिल्ली हाईकोर्ट, शास्त्री भवन जैसी जगहों पर बनाए भीत्तिचित्र, बेल्जियम दूतावास, गोवा विश्वविद्यालय, लखनऊ का आंबेडकर मेमोरियल इत्यादि की वास्तुकला विशद रेखाचित्रों और तस्वीरों द्वारा प्रदर्शित किए हैं। कांसा, जली हुई लकड़ी, स्टील के पाइप इत्यादि से बनाई गई मूर्तियों का अलग विभाग है। यह प्रदर्शनी गुजराल की सृजनशील विविधता का उत्सव है जो 20 फरवरी तक चलेगी।

साल 1925 में झेलम, पाकिस्तान में जन्म के बाद किसी बीमारी के कारण वह आठ साल की उम्र में सुनने की क्षमता गंवा बैठे। उम्र के उस पड़ाव पर भी वे रेखाएं खींचकर कुछ आकृतियां बनाया करते थे। इसे देखकर उनके पिताजी ने बड़ी मुश्किलों का सामना करके उन्हें लाहौर के मेयो स्कूल आॅफ आटर््स में भर्ती करा दिया। साल 1944 में उन्होंने बंबई के सर जेजे स्कूल आॅफ आर्ट में भी प्रशिक्षण लिया। उनकी पहली चित्र प्रदर्शनी का आयोजन दिल्ली में हुआ। उस प्रदर्शनी के बाद सतीश कला के क्षेत्र में विशेष प्रशिक्षण और अनुभव प्राप्त करने के लिए मैक्सिको चले गए। मैक्सिको के तत्कालीन चित्रकारों व वहां की लोककला का उन पर काफी प्रभाव पड़ा जो सतीश के पचास के दशक के चित्रों में स्पष्ट देखा जाता है।

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